आमेर किले का इतिहास- History of Amer Fort in Hindi

In this article, we are providing information about Amer Fort in Hindi- History of Amer Fort in Hindi Language. हिस्ट्री ऑफ आमेर किले | आमेर किले का इतिहास

आमेर किले का इतिहास- History of Amer Fort in Hindi

आमेर दुर्ग राज्यस्थान की राजधानी जयपुर में आमेर क्षेत्र में पहाड़ी पर स्थित एक पर्वतीय दुर्ग है। इसे आमेर किला और आंबेर के किले के नाम से भी जाना जाता है। 2013 में इसे विश्व धरोहर घोषित किया गया था।

History of Amer Fort in Hindi

Amer kila ka itihas- आमेर का दुर्ग मूल रूप से मीणाओं का था। इसका निर्माण 967 में मीणाओं के चंदा वंश के राजा ऐलान सिंह ने करवाया था। कछवाहा राजपुतों ने मीणा राजाओं की कायरता से हत्या तर आमेर पर कब्जा कर लिया था। अगले 950 वर्ष तक काछवहा राजपुत मान सिंह प्रथम ने दुर्ग पर राज किया और उनके शासन में ही किले की बहुत सी ईमारतों का निर्माण हुआ था। किले पर अनेक कार्यों का विकास मान सिंह प्रथम के उतराधिकारी जयसिंह ने करवाया था।

आमेर किले की वस्तु कला- Architecture Information about Amer Fort in Hindi

आमेर दुर्ग विशुद्ध हिन्दु शैली में बना है। यह दुर्ग पहाड़ी के नीचे मवाठा सरोवर को देखता हुआ प्रतीत होता है। यह लाल बलुआ पत्थर और संगमरमर से बना हुआ दुर्ग है जो कि पहाड़ी के चार स्तरों पर बना हुआ है जिसमें से हर एक में विशाल प्रांगण है। आमेर का किला और जयगढ़ किला अरावली पर्वतमाला के एक ही पहाड़ पर स्थित है और दोनों किले सुरंग के माध्यम से जुड़े हुए है। आमेर दुर्ग को चार भागों में बाँटा गया है जिसमें चार मुख्य द्वार और चार प्रांगण है।

1. प्रवेश द्वार- किले में प्रवेश करने का सबसे मुख्य द्वार सूरज पोल है जिससे सूर्य कि किरणें महल में प्रवेश करती है। इसमें प्रवेश करते ही मुख्य प्रांगण है जिसे जलेब चौंक के नाम से जाना जाता है।

2. प्रथम प्रांगण- प्रथम प्रांगण जलेब चौंक बहुत ही बड़ा है। इसका विस्तार लगभग 100 मीटर लंबा और 65 मीटर चौड़ा है। यह सेनाओं के एकत्रित होने का स्थान है और यहाँ पर विजय के बाद सेना का जुलुस निकाला जाता था। जलेबी चौक से शानदार सीढ़ीनुमा रास्ता महल के मुख्य प्रांगण तक जाता है।

3. द्वितीय द्वार- सूरज पोल के बाद अगला द्वार गणेश पोल है। महाराज के महल से पहले द्वार पर गणेश जी की मूर्ति है जिसके उपर सुहाग मंदिर है जहाँ से राजवंश की महिलाएँ दीवन ए आम के समारोह देखती थी। गणेश पोल एक त्रि- स्तरीय मूर्ति है जिसको मिर्जा राजा जय सिंह ने बनवाया था। इस
द्वार पर बहुत से कलात्मक चित्र अलंकृत है।

4. शिला देवी मंदिर- जलेबी चौंक के दाई और एक छोटा सा भव्य मंदिर है जिसे शीला माता का मंदिर कहा जाता है। शीला माता काली माता और दुर्गा माता का ही रूप है। इस मंदिर के द्वार चाँदी पत्र से बने हुए है और उन पर नव दुर्गा के नौ रूप और दस महाविद्याओं की मूर्ति बनी हुई हैं। मंदिर के अंदर दोनों तरफ चाँदी के सिंह है और बीच में माता की मूर्ति है।

5. द्वितीय प्रांगण- द्वितीय प्रांगण में प्रथम प्रांगण की मुख्य सीढ़ी से प्रवेश किया जा सकता है। यहाँ पर दीवान ए आम है जो कि जनसाधारण का दरबार था जहाँ पर महाराजा सारी समस्याएँ सुलझाते थे। दीवाने ए आम संगमरमर के चबूतरे पर लाल बलुआ पत्थरों से बना 27 स्तंभो का हॉल है। यह स्तंभो की दोहरी कतारों से घिरा हुआ है।

6. तृतीय प्रांगण- तृतीय प्रांगण में प्रवेश गणेश पोल से ही मिलता है। इस प्रांगण में राजा और उनके परिवार के सदस्यों के लिए नीजी कक्ष है। इस प्रांगण में दो ईमारते एक दुसरे के आमने सामने बनी हुई है और उनके बीच में एक सुंदर उद्यान है।

7. जय मंदिर- इस प्रांगण में प्रवेश करती ही बाईं ओर एक ईमारत है जिसे जय मंदिर कहते हैं। इस महल को दर्पण जड़े फलकों से बनाया गया है और इसकी छत पर भी रंग बिरंगे शीशों का उतकृष्ट काम किया गया है और यह शीशे मोमबती की रोशनी में झीलमिलाते और चमकते हुए नजर आते हैं जिस कारण इसे शीश महल के नाम से भी जाना जाता है। इसका निर्माण राजा मान सिंह ने 16वीं शताब्दी में करवाया था। इसको कक्ष की दिवारे संगमरमर की बनी हुई है। यहाँ से माठवा झील का दृश्य बहुत सुंदर दिखाई देता है।

8. सूख महल- जय मंदिर के सामने दुसरी ईमारत सुख महल है जिसका मुख्य द्वार चंदन की लकड़ी का बना हुआ है और जालीदार संगमरमर का प्रयोग किया गया है। इस महल में एक डोली महल है जो कि डोली की भाँति बना हुआ है। डॉली महल से पहले एक भूल भैलेया है जहाँ राजा अपनी रानियों के साथ हँसी ठठोलि किया करते थे। इस महल का वातावरण ठंडा रखने के लिए पाईपों के माध्यम से पानी लाया जाता है जो बाद में उद्यान में चला जाता है।

9. जादुई पुष्प- शीश महल के एक आधार पर जादुई पुष्प की नक्काशी की गई है। इस स्तंभ के आधार पर तितली का जोड़ा फूलो के सात अनोखे डिजाईन, साँप के फन, मछली की पूँछ, कमल, सिँह की पूँछ, हाथी की सूंड के रूपांकण है। एक तरीके से हाथ रखने पर एक वस्तु दिखाई देती है और दुसरे तरीके से हाथ रखने पर दुसरी वस्तु दिखाई देती है।

10. मान सिंह महल- इस प्रांगण के दक्षिण में सबसे पुराना मान सिंह का महल है जिसे बनने में 25 वर्ष लगे थे और वह 1599 में बनकर तैयार हुआ था। इसके अंदर स्तंभो की बारादरी है जिनका उपर और नीचे रंगीन टाईलों से अलंकरण किया गया है।

11. उद्यान- इस प्रांगण में मुगल शैली वाली चारवाग शैली वाला बाग है जिसके पूर्व में चबुतरे पर जय मंदिर और पश्चिम चबुतरे पर सुख महल है। यह तारे के आकार में लगे फव्वारों को घेरै हुए धरती से कुछ नीचे धँसा हुआ षष्टकोणीय आकार का है। इसको पानी सुख महल की पाईपों से मिलता है।

12. त्रिपोलिया द्वार- किले के पश्चिम में एक त्रिपोलिया द्वार है जिसमें तीन दरवाजे हैं और तीनों दरवाजों में से एक जलेब चौंक की तरफ जाता है, दुसरा मान सिंह महल और तीसरा जनाना डढ्योडी की तरफ जाता है।

13. सिंह द्वार- यह एक विशिष्ट द्वार है जिससे निजी भवनों में प्रवेश मिलता है। इसकी सुरक्षा सख्त और सशक्त होती थी जहाँ पर संतरी तैनात रहते थे। इसका डिजाईन भी बहुत ही टेढ़ा मेढ़ा है। जय सिंह के काल 1699-1743 में इसका निर्माण हुआ था।

14. चतुर्थ प्रांगण- इस प्रांगण में रानियों का निवास स्थान था। उनकी दासियाँ भी यही रहाँ करती थी। यहाँ के सारे कक्ष एक ही गलियारे में खुलते हैं। यहाँ पर एक जस मंदिर नामक निजी कक्ष भी है जिसमें काँच के फूलों की महीन कारीगरी की गई है और सिलखड़ी की उत्कृष्ट कलाकारी की गई है।

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