Essay on Rabindranath Tagore in Hindi- रवीन्द्रनाथ टैगोर पर निबंध

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Essay on Rabindranath Tagore in Hindi- रवीन्द्रनाथ टैगोर पर निबंध

भूमिका- किसी भी देश की संस्कृति और सभ्यता मात्र घटनाओं और तिथियों, सिद्धान्तों और नियमों की स्थापना से रूप नहीं लेती हैं, अपितु उसका सत्य और यथार्थ उन मनीषियों के जीवन और कार्य से रुपायित होते हैं जो मानवता का मार्ग-दर्शन करते हैं। वे देश और काल की परिधि से भी घिरे नहीं रहते है। समस्त मानव-जाति और प्राणी मात्र के हित की कामना ही उनका ध्येय होता है। वे क्षुद्र बंधनों में नहीं बंधे होते हैं। उनकी चेतना एक विशेष काल और देश, समाज आदि जाति के लिए नहीं होती है। हमारे देश की पुण्य धरा का यह सौभाग्य रहा है कि यहाँ एक नहीं अनेक ऐतिहासिक पुरुष इसी रूप में अवतरित हुए हैं जो विश्व-मानव के कल्याण की कामना करते थे। जिनका जीवन भी इसी लक्ष्य की पूर्ति के लिए समर्पित रहा। विश्व-कवि, गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर इसी प्रकार के सृजक-साधक सन्त हुए हैं। मानवता के पोषक साहित्य के माध्यम से अपनी संवेदना को जन-जन तक पहुंचाने का संकल्प लेते हैं। गुरुदेव भी इसी माध्यम से जन-मन तक पहुंचे थे।

जीवन परिचय- गुरुदेव का जन्म पुराने कलकत्ते में महर्षि देवेन्द्रनाथ ठाकुर के घर में 7 मई सन् 1861 ई. में हुआ था। यह परिवार विख्यात परिवार था तथा धार्मिक और सामाजिक क्षेत्र में प्रसिद्धि के अतिरिक्त लक्ष्मी की कृपा भी इस परिवार पर थी। बालक रवीन्द्र के दादा को तो राजा की उपाधि प्राप्त थी। इनके घर में नौकर चाकरों का जमघट लगा होता था। उन्हीं के शब्दों में उन दिनों हमारा घर आदमियों से भरा था। कितने अपने कितने पराए, कुछ ठीक याद नहीं। परिवार के अलग-अलग महकमों के दास-दासियों का शोरगुल बराबर मचा रहता था।

आरम्भिक शिक्षा के लिए जब बालक रवीन्द्र को स्कूल भेजा गया तो यह पढ़ाई इन्हें पसंद नहीं आई और दो-तीन स्कूल बदलने के बाद उन्हें ‘नालायक’ मानकर स्कूल भेजना बन्द कर दिया गया। घर में पढ़ाई को व्यवस्था की गई। इस सम्बन्ध में उनका कथन हैमास्टर साहिब टिमटिमाते प्रकाश में प्यारी सरकार की फस्ट बुक पढ़ाया करते। मुझे पहले जंभाई आती, फिर नींद, फिर आँखें मलना शुरु कर देता।” लेकिन अपने साथियों पर ये स्वयं ही मास्टरी चलाया करते थे और बच्चे इनसे भयभीत भी रहा करते थे। बाल रवीन्द्र घर पर पढ़ते थे और स्वाध्याय में उनका मन लगता था। अपने पिता के सा। वे हिमालय के पर्वतीय क्षेत्रों का प्रमण करने के लिए निकले तो यात्रा के दौरान ही उन्हो) पिता जी से गणित, संस्कृत एवं ज्योतिष का अध्ययन किया। इससे रवीन्द्र प्रकृति के संपर्क में आ गए, तथा इनकी बुद्धि का स्वाभाविक विस्तार होने लगा। प्रकृति के सौंदर्य को देखकर ये मुग्ध हो उठते थे। सत्रह वर्ष की आयु में रवीन्द्र को विशेष अध्ययन के लिए इंग्लैण्ड भेजा गया। यहाँ उन्होंने अंग्रेजी साहित्य का रुचिपूर्वक गंभीर अध्ययन किया। इसी दौर में। इनकी मित्रता यीट्स जैसे कवि से तथा रोनेन्सान जैसे कलाकार से हुई। सन् 1880 में वे विदेश से वापिस आ गए। 22 वर्ष की आयु में सन् 1883 ई. में रवीन्द्र का विवाह मृणलिनी। से हुआ। सन् 1902 में पत्नी का देहावसान हो गया। लेकिन यह आघात रुका नहीं। पिता, एक बेटी और एक पुत्र की मृत्यु ने अपार पीड़ा दी। इस पीड़ा से रवीन्द्र व्यथित हो उठे। अब उनका जीवन साहित्य-सृजन के लिए ही समर्पित हो गया। गीतांजली के अंग्रेज़ी संस्करण पर इन्हें सन् 1913 ई. में विश्व का सर्वोच्च पुरस्कार ‘नोबेल पुरस्कार मिला। 7 अगस्त सन् 1941 ई. को रवीन्द्र इस विश्व से महाप्रयाण कर गए।

सृजन- सृजन के क्षेत्र में यद्यपि रवीन्द्र की प्रतिभा का विकास पन्द्रह वर्ष की अवस्था से आरम्भ हुआ लेकिन वे वस्तुत: जन्मजात कवि थे। बचपन में ही प्रसिद्ध ब्रह्म-संगीत-नयन तोमरे, पाया ना देखिते रयेछ नयने-नयने’ की रचना कर इन्होंने अपने पिता को आश्चर्य चकित कर डाला। पन्द्रह वर्ष की अवस्था में रवीन्द्र ने एक सभा में अपनी काव्य रचना का पाठ कर सभी को प्रभावित कर दिया। इसके पश्चात् धीरे-धीरे काव्य-प्रतिभा विकसित होती चली गई।

इस सृजन-कर्म में उन्होंने–वनफूल, संध्या संगीत, कथाओ काहिनी, छवि ओगान, कड़िओ कोमल प्रभात संगीत, पलातका, चित्रा, मानसी, प्रवाहिनी, गीतांजली, महुआ, शेषलेखा, अरोग्य, पुनश्य, पूरबी, वीथिया पत्रपुट आदि काव्य ग्रंथों की रचना की। गीतांजली के आध्यात्मिक गीत तो उत्कृष्ट काव्य-रचना है जिसने विश्व के बौद्धिक-वर्ग को प्रभावित किया है।

पद्य के साथ-साथ गद्य- लेखन में भी रवीन्द्र की प्रतिभा मुखरित हुई। नाटकों के क्षेत्र में ‘चित्रांगदा’, विसर्जन, ‘राजा और रानी’ गीति नाट्य में ‘मायेर खेला’ बाल्मीकि-प्रतिभा, चर्चित नाटक है। नृत्य पर आधारित नाटकों की भी उन्होंने रचना की है। इनमें ‘श्यामा’ और । नटीरपूजा’ विशेष प्रसिद्ध है। ऋतुओं के प्रभाव की अभिव्यक्ति की चतुर-चितरे कवि हैं। ‘शारदोत्सव’ ‘फाल्गुनी’ तथा ‘राजा अचलायतन’ नृत्य-नाटकों की रचना के माध्यम से की।।

कवि की प्रतिभा उपन्यास-लेखन में भी मानदण्ड निर्धारित करती है। उनके उपन्यासों में ‘करुणा’, ‘गोरा’ ‘चार अध्याय’ ‘उजाड़ा घर’ ‘बहुरानी दो बहनें, नौका डूबी ‘चोखरे वाली । तथा आँख की किरकिरी प्रसिद्ध है। संस्मरणात्मक ग्रंथ-‘जीवन स्मृति’ प्रसिद्ध है। कहानी-लेखन में भी गुरुदेव ने सफल-सृजन की। ‘गल्प गुच्छ’ और गल्पसमूह’ में उनकी सभी कहानिया संकलित हैं।

लेखनी के साथ-साथ उनकी दिव्य प्रतिभा तूलिका के रूप में भी चित्रांकन करती रही। नवीय मानसिक दशा में भी अत्यंत सूक्ष्मता से निराशा, युग संशय, मोह, क्लांति इत्यादि के माध्यम से निरूपति किया।

गुरुदेव का ‘रवीन्द्रसंगीत’ आज भी संगीत प्रेमियों को लुभाता है। उनकी प्रतिभा बहुआयामी थी, उनकी दृष्टि बहुत व्यापक और हृदय उदार था। उनका चिंतन विश्वव्यापी चिंतन था।

व्यक्तित्व- बहुमुखी प्रतिभा-संपन्न विश्व कवि का व्यक्तित्व आकर्षक एवं करूणा से ओत-प्रोत था। देश प्रेम, जन प्रेम और संस्कृति प्रेम उनके व्यक्तित्व का निर्माण करते हैं। उनकी आध्यात्मिक भावना अत्यंत गहरी और व्यापक थी तथा उनकी मानवीय दृष्टि अत्यंत उदार थी। उन्हीं के शब्दों में-

सभी कहीं मेरा घर हैं, मैं खोज वही घर लूंगा।

देश देश में देश है अपना, उसको लड़कर लंगा॥

देश की माटी से उन्हें प्यार था और वे उसे माथे पर पवित्र तिलक करने के योग्य मानते हैं, इस धरती पर वे शीश झुकाते हैं :-

ओ मेरे देश की माटी तुझ पर सिर टेकता मैं।

उनका देश-भक्ति से प्रेरित और रचित गान आज देश के राष्ट्रगान के रूप में अमर है।

भारतीय संतान को भारतीय संस्कृति की शिक्षा देने, उससे जोड़ने तथा उसे ही जीवन का आधार बनाने की इच्छा को लेकर उन्होंने ‘शान्तिनिकेतन’ की स्थापना की।

शान्तिनिकेतन घने वृक्षों की छाया में प्राचीन ऋषि कुल की व्यवस्था की याद दिलाता है। इसी के पास सहृदय कवि ने एक ग्रामीण सहकारी बैंक की स्थापना इसलिए करवाई थी कि किसानों को महाजनी शोषण से बचाया जाए तथा सस्ती व्याज की दर पर उन्हें ऋण उपलब्ध हो सके, ताकि वे अपने जीवन स्तर को ऊंचा उठा सकें। यही शान्ति निकेतन आज-विश्व भारती विश्वविद्यालय के रूप में विकसित हो गया है।

देश प्रेमी कवि ने वंग-भंग आन्दोलन, स्वदेशी-आंदोलन में भी भाग लिया। तत्कालीन अंग्रेजी सरकार द्वारा प्रदत्त ‘सर’ की उपाधि उन्होंने जलियांवाले बाग के अमानुषिक हत्याकाण्ड के विरोध में लौटा दी थी तथा साथ ही कड़े शब्दों में अंग्रेज़ी सरकार को विरोध पत्र भी लिखा था। उनका संपूर्ण व्यक्तित्व ‘सन्त हृदय नवनीत समाना’ जैसा था।

उपसंहार-महान् व्यक्तित्व केवल अपनी प्रगति तक सीमित और संतुष्ट नहीं रहते हैं। उनका ध्येय तो संपूर्ण मानव जाति के कल्याण से होता है। यही ध्येय रवीन्द्र बाबू का भी था। उन्होंने सामाजिक और सांस्कृतिक धरातल पर जन-जागरण और सेवा का क्षेत्र अपनाया तथा साहित्य-सृजन के माध्यम से इस भाव की कलात्मक अभिव्यक्ति की। मानवता के कल्याण के समर्थक रवीन्द्र बाबू विश्व-कवि और विश्व-मानव बने हैं तथा शोषण मुक्त । समाज की रचना के पक्षपाती रहे हैं। दलितों और अछूतों के प्रति उनमें करुणा थी। संकल्प-शक्ति के साथ वे सदैव मानव को प्रगति पथ दिखाते रहे हैं और आज भी उनका साहित्य संदेश देता है-‘एकला चलो रे।’ 

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