Essay on Lohri in Hindi- लोहड़ी पर निबंध

इस निबंध में आपको पता लगेगा की हम लोहड़ी त्यौहार कब, क्यों और कैसे मानते है। इस त्यौहार को पंजाब, हरियाणा और हिमाचल में बड़ी धूम धाम से मनाया जाता है। In this article we are providing essay on Lohri in Hindi. In this essay, you get to know- why we celebrate lohri and history of Lohri in Hindi.

लोहड़ी पर निबंध- Essay on Lohri in Hindi

भूमिका- पंजाब की धरती और जीवन सभ्यता और संस्कृति अनेक विशेषताओं से विभूषित है। इन्द्रधनुष के सात रंगों के समान पंजाब की संस्कृति भी अनेक रंगी है। एक ओर धन-धान्य से सम्पूर्ण धरा तो दूसरी ओर गुरुओं के त्याग, आदर्श और शिक्षाओं की गाथाएँ। एक ओर नदियों की पवित्र धाराएँ तो दूसरी ओर लहलहाती फसलों से भरे खेत। एक ओर त्यौहारों और मेलों की धूम तो दूसरी ओर नाच और नृत्य तथा गीतों के मधुर स्वर। लोहड़ी पंजाब का एक विशेष त्यौहार है यद्यपि यह सारे देश में धूमधाम से मनाया जाता है, परन्तु पंजाब में इसके अपने ही स्वर और अपने ही रंग हैं।

पृष्ठभूमि ( Why we celebrate Lohri festival )-

लोहड़ी शब्द का मूल ‘तिल+रोड़ी” है जिससे तिलौड़ी बना है और आगे चलकर इसका रूप लोहड़ी बन गया। कई स्थानों पर लोहड़ी को लोही या लोई भी कहा जाता है। लोग इस त्यौहार को बड़ी धूम धाम से मानते है।

लोहड़ी का धार्मिक व पौराणिक महत्व- ( Religious and mythological significance of Lohri )

लोहड़ी का पर्व मनाने की परम्परा वैदिक काल में भी दिखाई पड़ती है। प्राचीन काल में ऋषि देवताओं को प्रसन्न करने के लिए हवन करते थे। यह एक ऐसा धार्मिक कार्य था, जिसमें परिवार के लोग परस्पर मिलकर एक-दूसरे का सुख-दु:ख बांटते थे। घी, शहद, तिल, गुड़ आदि डाल कर हवन करने से उठता हुआ धुआँ सारे वातावरण को कीटाणु रहित और शुद्ध करता था। यह वर्षा करने में भी सहयोग देता था।

लोहड़ी त्यौहार मनाने की कहानियां -( Story behind celebration of lohri in Hindi )

इस त्यौहार से सम्बन्धित कथाएं प्रचलित हैं। कहा जाता है कि इस दिन लोहनी देवी ने एक क्रूर दैत्य को जला कर राख कर दिया था। उस दिन की याद को ताज़ा करने के लिए हर साल आग जला कर खुशियां मनाई जाती हैं।

इस त्यौहार का सम्बन्ध एक पौराणिक कथा ‘सती दहन’ से भी जोड़ा जाता है। भगवान शंकर की पहली पत्नी सती दक्ष प्रजापति की कन्या थी। एक बार प्रजापति दक्ष देवताओं के सम्मेलन में भाग लेने गए। वहाँ पहुँचने पर सभी देवताओं ने खड़े होकर उनका स्वागत किया, परन्तु शिव जी बैठे रहे। प्रजापति दक्ष ने इसे अपना अपमान समझा। रुष्ट होकर उन्होंने शिव को खूब जली कटी सुनाई। अपमान का बदला लेने के लिए उन्होंने एक महान् यज्ञ का आयोजन किया। यज्ञ में भगवान शंकर को छोड़कर सब देवताओं को बुलाया गया। अपने पिता के घर हो रहे यज्ञ का समाचार सुनकर सती ने वहाँ जाने की जिद्द की। भगवान शंकर के बहुत समझाने पर भी वह न मानी। विवश होकर उन्होंने अपने गणों के साथ सती को यज्ञ में जाने की अनुमति दे दी।

सती जब अपने पिता दक्ष के यहाँ पहुँची तो प्रजापति दक्ष ने उससे बात तक न की। उल्टे उसका तिरस्कार किया और शिव जी को भी बुरा-भला कहा। सती इस अपमान को सहन न कर सकी और यज्ञ की अग्नि में ही छलाँग लगाकर भस्म हो गई। भगवान शंकर को जब वह समाचार मिला तो उनके क्रोध का ठिकाना न रहा। प्रजापति उनके चरणों में गिर पड़ा। देवताओं ने भी उनकी स्तुति की। भगवान शंकर का क्रोध शान्त हो गया और उन्होंने दक्ष को क्षमा कर दिया। दक्ष ने पूर्ण-आहुति डालकर यज्ञ को पूरा किया।

इस पर्व का सम्बन्ध लोक गीत के आधार पर भी माना जाता है। लड़के घर-घर जा कर यह पंजाबी लोक गीत गाते हैं- ( Lohri Song lines in Hindi )

सुन्दर मुन्दरीये, हो; तेरा कौन बचारा, हो;

दुल्ला भट्टी वाला, हो; दुल्ले धी व्याही, हो;

सेर शक्कर पाई, हो; कुड़ी दा सालू पाटा, हो;

कुड्री दा जीवे चाचा, हो; चाचा चूरी कुट्टे, हो;

नंबरदारा लुट्टी, हो; गिन-गिन भाल्ले लाए, हो;

इक भाला रह गया, हो; सिपाही फड़ के ले गया, हो;

इस लोक गीत के आधार पर घटना इस प्रकार है- ( Dulla Bhatti Story Legend of Lohri in Hindi )

एक गरीब ब्राह्मण था। उसकी सुन्दरी और मुन्दरी नाम की दो लड़कियाँ थीं। उनकी सगाई पास के गाँव में पक्की हो गई, दोनों लड़कियाँ सुन्दर थीं। उस इलाके के हाकिम को जब उन लड़कियों की सुन्दरता का समाचार मिला तो उसने उन्हें प्राप्त करना चाहा। वह गरीब ब्राह्मण लड़के वालों के यहाँ गया। उसने प्रार्थना की कि आप विवाह से पहले ही इन लड़कियों को अपने घर ले आओ, नहीं तो दुष्ट हाकिम इन्हें न छोड़ेगा। परन्तु वे भी हाकिम से डरते थे। उन्होंने ऐसा करने से साफ इन्कार कर दिया।

निराशा में डूबा ब्राह्मण जंगल से गुज़रता हुआ अपने घर की ओर लौट रहा था। रास्ते में उसे दुल्ला भट्टी मिला। दुल्ला डाकू होते हुए भी दीन दुखियों का सहायक था, अमीरों के प्रति वह जितना क्रूर था, गरीबों के प्रति वह उतना ही दयालु था। ब्राह्मण ने जब अपनी राम कहानी सुनाई तो दुल्ला पसीज गया। उसने उसे सांत्वना दी और सहायता का वचन देते हुए कहा, “ब्राह्मण देवता आप निश्चिन्त रहे। गांव की बेटी मेरी बेटी है, उनकी शादी मैं करूंगा। इसके लिए भले ही मुझे अपनी जान की बाज़ी क्यों न लगानी पड़े।”

दुल्ला स्वयं लड़के वालों के यहां गया, उनको तसल्ली देकर विवाह की तिथि पक्की कर दी। इलाके के हाकिम के भय से जंगल में ही रात के उस घटाटोप अंधेरे में भी आग जलाई गई। गाँव के सब लोग इकट्ठे हो गये। दुल्ला भट्टी ने स्वयं धर्म पिता बनकर सुन्दरी और मुन्दरी का कन्या दान किया। गरीब ब्राह्मण दहेज में कुछ न दे सका। यहां तक की भाँवरों के समय उन लड़कियों द्वारा ओढ़े हुए सालू भी फटे हुए थे। गाँव बालों ने उसकी भरपूर सहायता की। जिनके यहां पुत्र का विवाह या पुत्र पैदा हुआ था, उन्होंने ने इन कन्याओं का विशेष उपहार दिए। दुल्ला भट्टी के पास उस समय और कुछ न था, केवल शक्कर थी। उसने वही कन्याओं को शगन के रूप में दी।

इस घटना के बाद हर साल लोहड़ी का त्यौहार आग जलाकर इसी रूप में मनाया जाने लगा। यह त्यौहार हिन्दु-मुस्लिम का भेद मिटा कर एकता और दया का संचार करने लगा।

कृषि और ऋतु से सम्बन्ध- भारतीय जन-जीवन कृषि पर आश्रित है। इन दिनों मकई, तिलहन, दाले, मूंगफली, बाजरा आदि फसलें घर में आ जाती हैं। पिछले छ: महीनों का हिसाब उस आग के पास बैठकर किया जाता है। नाई, धोबी, माली, ग्वाला आदि सेवकों और गरीबों को दान दिया जाता है। उस फसल के कुछ अंश उस जलती हुई आग में डाल कर दान किया जाता है। इस त्यौहार का सम्बन्ध ऋतु से भी है। माघ के महीने में सर्दी ज़ोरों पर होती है। हवा के ठण्डे झोंके सारे वातावरण को शीतल कर देते हैं। यहां तक कि पानी भी जम जाता है। सर्दी से बचने के लिए इन दिनों तिल-गुड़ खाना अनिवार्य माना गया है। इस दिन गरीब से गरीब भी गुड़-तिल से बनी रेवड़ियां खाता है।

मनाने का ढंग ( How we celebrate Lohri )- यह त्यौहार माघ मास की मकर संक्रान्ति (माघी) से एक दिन पहले रात के समय मनाया जाता है। लड़के-लड़कियां, चाहे वे गरीब के हों या धनी परिवार के, कई दिन पहले से ही इसको मनाने की तैयारियां शुरु कर देते हैं। वे अपनी-अपनी टोलियां बना कर लोक-गीत गाते हुए घर-घर जाते हैं। वे लकड़ी और गोबर के उपले मांग कर लाते है। उन्हे एक स्थान पर इकट्ठा कर लेते हैं। लोहड़ी के दिन, जिनके यहां लड़के की नई शादी होती है या लड़का पैदा हुआ होता है, वे उनके घर जाकर लोक-गीत गाकर बधाई देते हैं। घर वाले उन्हें रेवड़ियां, गजक आदि देते हैं। इन्हें वे इकट्ठा बैठ कर खाते हैं। सायंकाल होने पर गोलाकार में लकड़ियां तथा गोबर के उपले चिन कर उस पर झण्डा लगा देते हैं। आग लगाने से पहले ढोल ढमाके बजते हैं। मुहल्ले के सभी लोग इकट्ठे रेवड़ियां आदि डाल कर हवन किया जाता है। कुछ लोग गायत्री मंत्र पढ़ कर आग में आहुतियां डालते हैं। फिर वे अग्नि की परिक्रमा करते हैं और आग के चारो ओर बैठकर रेवड़ियां खाते है।

त्योहार के अन्य पक्ष- बच्चों पर वायु का प्रकोप अधिक होता है। कफ से उनकी छाती जम जाती है। इससे उन पर औषधि का भी कम प्रभाव होता है। यदि वे ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाएंगे तो उनकी छाती गर्म होगी। उससे ठण्ड का प्रभाव कम हो जाएगा। यही कारण है कि इन दिनों बच्चों को शोर मचाने की खुली छूट दे दी जाती है।

उपसंहार- इस त्यौहार के दिन हम हवन करके देवताओं को खुश करते है। सती के अपने पति के लिए महान् बलिदान और पंजाब के वीर सपूत दुल्ला भट्टी को याद करते हैं। यह त्यौहार एकता का प्रतीक है। क्या छोटा, क्या बड़ा, क्या अमीर, क्या गरीब सब इकट्ठे बैठकर खाते हैं, आनन्द मनाते हैं। जलती हुई आग की शिखा ऊपर उठने का संदेश देती है। राष्ट्र और समाज के लिये बड़े से बड़ा बलिदान देने के लिये हमें प्रेरित करती है।

हिंदी में लोहड़ी त्यौहार पर निबंध- Long essay on Lohri festival in Hindi

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