लड़का लड़की एक समान पर निबंध- Ladka Ladki Ek Saman Essay in Hindi

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Ladka Ladki Ek Saman Essay in Hindi

लड़का लड़की एक समान पर निबंध- Ladka Ladki Ek Saman Essay in Hindi

( Essay-1 ) Ladka Ladki Ek Saman Anuched | Paragraph | Short Essay

लड़का-लड़की समाज के पूरक हैं। एक के अभाव में भी समाज की कल्पना नहीं की जा सकती। वैदिक युग में लड़का-लड़की के बीच कोई भेद नहीं था किंतु अपनी शक्ति और सामर्थ्य के कारण धीरे-धीरे समाज पर पुरुषों का एकाधिकार हो गया। समाज पुरुष प्रधान बन गया और नारी की स्थिति बद से बदतर होती गई। नारी के स्वाभाविक गुणों-ममता, प्रेम, स्नेह, धैर्य, सहनशीलता के कारण उसे ‘अबला’, ‘नरक का द्वार’, ‘मायाविनी’, ‘पैर की जूती’, ‘पराया धन’ आदि विशेषणों से नवाजा गया जबकि लड़के को ‘कुल भूषण’, ‘बुढ़ापे का सहारा’, ‘खानदान बढ़ाने वाला’, आदि बताया गया। ऐसे रीति-रिवाज़ बनाए गए जिनसे लड़की की दशा और भी शोचनीय हो गई। दहेज का बोझ कन्या पक्ष पर होने के कारण लड़की के जन्म को ही हेय माना जाने लगा। स्थिति यहाँ तक आ पहुँची कि जन्म से पहले अथवा जन्म के बाद कन्या – शिशु की हत्या की जाने लगी। इसके कारण लड़का-लड़की की औसत जन्म- दर में कमी आने लगी। स्वामी दयानंद सरस्वती, राजा राममोहन राय, ईश्वरचंद्र विद्यासागर, गाँधीजी जैसे महान लोगों के प्रयास से नारी स्थिति में सुधार आया। शिक्षा ने लोगों और स्वयं लड़कियों की सोच बदली । लड़कियाँ एवरेस्ट से अंतरिक्ष तक नज़र आने लगीं। लड़कियों की आर्थिक स्वतंत्रता ने उनके प्रत्येक कदम को मजबूत बनाया। आज स्थिति यह है कि लड़की को ‘पराया धन’ कहने के बदले ‘लक्ष्मी’ कहकर स्वीकारा जाने लगा है।

 

( Essay-2 ) Ladka Ladki Ek Saman Essay in Hindi

प्रस्तावना

मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है जो कि समाज में रहता है। इसकी दो जातियाँ पाई जाती है लड़का और लड़की और समाज को सुचारू रूप से चलाने के लिए दोनों की ही समान रूप से आवश्यकता है। लड़का और लड़की एक वाहन के दो पहिए है दो साथ मिलकर जीवन रूपी वाहन को चलाते हैं। यह दोनों ही एक समान है दोनों की अपनी अपनी अहमियत है। इसके लिए सबसे ज्यादा जरूरी है लोगों की सोच जो कि उन्हें समानता की दर्जा दे सकती है। इतिहास गवाह है कि प्राचीन काल से ही लड़कियाँ अपनी सुझ बुझ और शक्ति का परीचय देती आई है। वह किसी भी तरह लड़को से कम नहीं है। लोगों की संकुचित सोच ने ही लड़कियों को लड़को से पीछे समझा हुआ हैं। जहाँ लड़की को देवी के रूप में मंदिर में पूजा जाता है वहीं घर और समाज में उसपर शारीरिक और मानसिक रूप से अत्याचार भी किए जाते हैं। मध्य काव में पुरूषों को पूर्ण रूप से स्वतंत्रता थी जबकि लड़की सिर्फ घर में कैद होकर रहती थी।

आधुनिक युग में लड़कियों ने अपने हक फिर से प्राप्त कर लिए हैं। वह हर क्षेत्र में लड़कों से भी आगे है। वह घर समाज और देश का नाम रोशन कर रही है। लड़कियों को किसी भी रूप में लड़को से कमजोर नहीं समझा जा सकता है।

लड़कियों को भी बाहर निकलकर लड़को से मुकाबला करना चाहिए और उनसे आगे निकलकर लोगो कि मानसिकता को बदलना चाहिए। लोगों को लड़कियों को कमजोर नहीं समझना चाहिए क्योंकि लड़कियों के बिना मनुष्य जीवन आगे नहीं बढ़ सकता। अगर परिवार चलाने के लिए लड़का जरूरी है तो परिवार को आगे बढ़ाने के लिए लड़की जरूरी है। लड़कियों को उनकी सोच और उनके सपने सामने रखने का अधिकार मिलना चाहिए। उन्हें उनकी जिंदगी उनके हिसाब से जीने देना चाहिए। लड़कियों को लड़के जितनी समानता देने की शुरूआत घर से ही करनी चाहिए। उन्हें घर के हर निर्णय में भागीदारी दी जानी चाहिए। उन्हें लोगों की संकुचित सोच से लड़ने के लिए तैयार करना चाहिए और उन्हें ऐसे पथ पर अगरसर करना चाहिए कि वो लोगों की सोच को बदल सके और लड़का लड़की का भेदभाव खत्म कर सके।

निष्कर्ष

स्कूलों में भी बच्चों को लड़का लड़की की समानता के बारे में पढ़ाया जाना चाहिए। घरों में भी लड़कियों को पूरा सम्मान मिलना चाहिए और लड़को की तरह उनके जन्म पर भी खुशियाँ मनाई जानी चाहिए। लड़की लड़को जितनी ही जरूरी है और लड़किया अच्छी मार्गदर्शक भी होती है।

 

( Essay-3 ) Ladka Ladki Ek Saman Nibandh

प्रस्तावना

सृष्टि-रचना नर और मादा, स्त्री और पुरुष के सहयोग और संयोग से होती है, दोनों ही एक दूसरे के पूरक हैं। प्राणी जगत् में लिंग-भेद प्राकृतिक है, वह उसके अपने वश की बात नहीं है। इसी तरह मनुष्य जाति में लड़का या लड़की पति-पत्नी की लालसा की सन्तान हैं, दो आत्माओं की संधि की उपज है। अतः उनमें किसी प्रकार का विभेद, अप्राकृतिक अनाधिकार और अमानवीय चेष्ठा है।

दुर्भाग्य से ‘पुत्रिति जाता महतीत चिन्ता’ या ‘जब ते दुर्हिता उपजी, सततहिय उपतात’ कह कर भारतीय परिवार और समाज-व्यवस्था में पुत्र और पुत्री में अन्तर किया है। पुत्री को पराया धन और पुत्र को वंश बेल को बढ़ाने वाला कुलदीपक कहा जाता रहा है, परन्तु इस प्रकार का अवैज्ञानिक और विषमतापूर्ण दृष्टिकोण अपनाकर लड़के और लड़की में अन्तर करना अनुचित और अविवेकपूर्ण है।

भारतीय जन-मानस में रूढ़ि-बद्ध इस दृष्टिकोण के कारण स्त्रीजाति को अमानवीय यातनाएँ सहन करनी पड़ी हैं। सती प्रथा के अन्तर्गत उसे मृत पति के साथ जीवित चिता में प्रवेश करना पड़ा है, मध्य युग में कन्या के जन्म के साथ ही उसकी हत्या कर देने जैसे जघन्य अपराध होते रहे हैं। इस प्रकार के अपराध एक ओर पुरुष समाज की अपनी दुर्बलता और कायरता की ओर संकेत करते हैं और दूसरी ओर उसकी स्वार्थ-वृत्ति की ओर ।

पुरुष प्रधान समाज में इस स्वार्थन्धता के कारण ही पुत्री का जन्म अशुभ और चिन्ता का कारण माना जा रहा है। उसके पालन-पोषण में विषमता बरती जा रही है, उसे शिक्षा से वंचित किया जाता रहा है, व्यक्तित्व-विकास के अवसरों से वंचित रखा जाता रहा है। पुत्र चाहे कितना ही कुपुत्र क्यों न हो, उसे समय पर काम आने वाला खोटा सिक्का कहकर परिस्थिति में पुत्री से श्रेष्ठ माना जाता रहा है। फलतः लड़की आत्महीनता के अन्धेरे कुएँ में पड़ी रही है ।

उपर्युक्त विषमतापूर्ण दृष्टिकोण का मूल कारण यह रहा है कि लड़की कुछ लेकर जाएगी और लड़का कमा कर लाएगा, लड़की दूसरे घर चली जाएगी और लड़का बुढ़ापे में माँ-बाप के बुढ़ापे की लकड़ी बनेगा ।

अज्ञानवश यह भी माना जाता रहा है कि लड़कियाँ शारीरिक दृष्टि से तो कमजोर होती हैं, वे स्वभाव से भीरू, बौद्धिक प्रतिभा और मानसिक दृष्टि से भी दुर्बल होती हैं, परन्तु ये सब मान्यताएँ असह हैं । अनुभव और इतिहास इससे उल्टा है, प्राप्ति के बाद उपेक्षा होती है— कथन के अनुसार उत्तराधिकार और पैतृक सम्पत्ति के रूप में सब कुछ पा लेने के बाद क्या पुत्र माता-पिता की उपेक्षा नहीं करने लगता, जबकि पुत्री दूसरे घर जा कर भी माता-पिता के प्रति अधिक संवेदनशील रहती है ।

‘कुछ लेकर जाएगी’ मान्यता के पीछे पुरुष समाज की अपनी दुर्बलता और स्वार्थ के साथ-साथ समाज-व्यवस्था दोषी है, न कि लड़की । कम दहेज लाने या दहेज में कुछ न लाने के कारण युवतियों पर होने वाले अत्याचार क्या उसके पति तथा परिवार के पुरुष वर्ग के सहयोग के बिना सम्भव हो सकता है ?

उपर्युक्त विवेचन बताता है कि लड़कियों के प्रति विषमतापूर्ण दृष्टिकोण सर्वथा अनुचित है। अनुभव यह बताता है कि अनेक क्षेत्रों और अंशों में लड़कियाँ लड़कों की अपेक्षा अधिक प्रतिभा-सम्पन्न, योग्य, संवेदनशील ईमानदार और विश्वसनीय होती हैं।

भारत के मैत्रीय, गार्गी तथा विद्योत्तमा ने ऋषि और विदुषी पद प्राप्त किया है। मध्ययुग में भी महारानी दुर्गाबाई और अहल्या बाई जैसी वीरांगनाओं ने अपने शौर्य से चकित किया है। आधुनिक स्वतंत्रता संग्राम में ‘खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी’ के योगदान से कौन परिचित नहीं है ? दुर्गा भाभी जैसी देवियों को मूक देशभक्ति, अरूणा आसफअली और सत्यवती के क्रांतिकारी व्यक्तित्व क्या कम महत्वपूर्ण हैं ? श्रीमती सरोजनी नायडू, महादेवी वर्मा तथा सुभद्रा कुमारी चौहान ने अपनी प्रतिभा का परिचय दिया है । श्रीमती विजय लक्ष्मी पंडित ने संयुक्त राष्ट्र संघ जैसी संस्था की प्रथम महिला अध्यक्ष होने का गौरव प्राप्त किया है तो विश्व के सबसे बड़े प्रजातंत्र को प्रधानमंत्री के रूप में अपने सुदृढ़ तथा शक्तिशाली व्यक्तित्व से इन्दिरा गांधी ने विश्व की महानतम् शक्तियों को स्तंभित कर दिया था । कीड़ा जगत् में पी. टी. ऊषा, बचेन्द्रीपाल मार्लेश्वरी, पीवी सिंधु, साक्षी मलिक, मीराबाई चानू, मैरी कॉम, साइना नेहवाल ने कीर्तिमान स्थापित किए हैं। कला और अभिनय आदि के क्षेत्र में अनेक प्रतिभाओं के नाम लिए जा सकते हैं।

निष्कर्ष

आज लाखों लड़कियाँ मेडीकल, इंजीनियरिंग, अध्ययापन, पुलिस, सैन्य एवं पुलिस सेवा तथा वायुयान संचालन आदि विभिन्न क्षेत्रों में अपनी योग्यता, दक्षता का परिचय दे रही हैं । कहना न होगा कि ये प्रतिभा अपनी पारिवारिक तथा गृहस्थ पालन के क्षेत्र में अतिरिक्त सेवाएँ भी करती रहती हैं। अतः लड़की को किसी प्रकार से हीन समझना सर्वथा अनुचित है, बल्कि लड़का-लड़की को एक समान मान कर दोनों को समान अवसर प्रदान करना समाज और राष्ट्र के हित में है ।

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3 thoughts on “लड़का लड़की एक समान पर निबंध- Ladka Ladki Ek Saman Essay in Hindi”

  1. Pooja R.K.Nair

    धन्यवाद । मुझे यह उत्तर अच्छा लगा ।??☺??

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