Essay on Kabir Das in Hindi- कबीरदास पर निबन्ध

In this article, we are providing information about Kabir Das in Hindi or Essay on Kabir Das in Hindi- कबीरदास पर निबन्ध- कबीर का जीवन एवं साहित्यिक-परिचय का मूल्यांकन, कबीर का काव्य का भाव पक्ष 

Essay on Kabir Das in Hindi- कबीरदास पर निबन्ध

भूमिका- विश्व एक ऐसा रंगस्थल है जहाँ अनेक जीवधारी अपने जीवन का अघि करते है और अन्तत: मृत्यु के बाद जीवन-यात्रा का विश्राम प्राप्त कर लेते हैं। लेकिन कुछ ऐसे भी व्यक्ति होते हैं जो अपने महत् कर्मों से अपने शरीर के नष्ट हो जाने पर भी अमर रहते हैं। विश्व उन्हें स्मरण करता है। हिन्दी साहित्य में कबीर ऐसे ही अद्भुत व्यक्तित्व सम्पन्न कवि हुए हैं जिन्होंने अपनी साहित्य-साधना के माध्यम से अमरत्व प्राप्त कर लिया है। उनके जीवन, जाति और धर्म के संबंध में यद्यपि विवाद है पर कबीर अपने कार्यों से एक जाति के नहीं, एक धर्म के नहीं सभी जाति और धर्म के मार्ग दर्शक बने हैं।

कबीर का जीवन एवं साहित्यिक परिचय- कबीर का जन्म संवत् 1456 वि. (1399 ई.) में माना जाता है-

चौदह सौ छप्पन साल गए, चन्द्रवार एक ठाठ भए।

जेठसुदी बरसाइत को, पूरनमासी प्रकट भए॥ |

कबीर के जन्म के सम्बन्ध में एक किवंदती प्रचलति है। कहा जाता है कि एक विधवा ब्राह्मणी के गर्भ से कबीर का जन्म हुआ। वह विधवा ब्राह्मणी गुरू रामानन्द जी के पास गई और उन्होंने उसे अन्जाने में ही पुत्रवती होने का आर्शीवाद दिया। शिशु का जन्म हो जाने पर वह ब्राह्मणी उसे लोक-लाज के कारण लहरतारा तालाब के किनारे छेड़ आई। यह शिशु नीमा और नीरु नामक जुलाहा दम्पति को मिला और वे उसे अपने घर ले आए। इन्होंने ही कबीर का पालन-पोषण किया। कबीर की शिक्षा-दीक्षा का कोई विशेष प्रबन्ध नहीं था। उन्होंने स्वयं भी लिखा है- 

मसि कागद कुओ नहीं, कलम गही नहिं हाथ।।

कबीर के गुरु के सम्बन्ध में भी निश्चय रूप में कुछ नहीं कहा जा सकता है। रामानन्द तथा शेखतकी को इनके गुरु के रूप में माना जाता है ? कबीर ने लिखा है-

काशी में हम प्रकट भए, रामानन्द चेताए।

रामानन्द से उनकी दीक्षा ग्रहण करने के सम्बन्ध में भी एक किवदंती प्रसिद्ध है। अंधेरे में जब रामानन्द नहाने के लिए गए तो मार्ग में कबीर लेट गए और रामानन्द का पांव उनके ऊपर पड़ गया। उनके मुख से ‘राम-राम’ निकाला और कबीर ने इसे गुरु मन्त्र मान लिया। कुछ विद्वानों का विचार है कि लोई नामक स्त्री से कबीर की शादी हुई थी तथा उनके कमाल और कमाली नामक पुत्र और पुत्री भी पैदा हुई। कबीर जुलाहे का कार्य करते और प्रभु की । भक्ति में भी लीन रहते थे। उनका जीवन सादा, सच्चा और भक्तिमय था। मृत्यु के समय

कबीर अन्ध्विश्वासों पर कड़ा प्रहार करने के लिए स्वयं ही मगहर में चले गए जहांउन्होंने अपना शरीर त्याग दिया।

मरति बार मगहर उठि धाया।

कबीर की मृत्यु के सम्बन्ध में यह दोहा भी प्रसिद्ध है-

संवत पन्द्रह सौ पछतर, कियो मगहर को मौन।

माघ सुदी एकादशी, रलों पौन में पौन॥

कबीर की सभी रचनाएं ‘बीजक’ में संगृहीत है। बीजक के तीन भाग हैं- साखी, सबद, तथा रमैणी। साखी दोहा छन्द में लिखी गई हैं।

कबीर का जन्म ऐसे समय में हुआ था जब समाज अज्ञान, अन्धकार, अविश्वास अन्धविश्वास, आडम्बर, जाति-पांति, रूढ़ियों के कीचड़ में धंसा हुआ था। राजनीतिक तथा धार्मिक दृष्टि से यह युग अशान्ति का युग था, पतन का युग था। कबीर ने अपने युग को देखा, परखा और तब उसके मार्ग-दर्शक करने का प्रयास किया।

कबीर के काव्य का भाव पक्ष- वास्तव में कबीर का लक्ष्य कविता करना नहीं था अपितु अपनी आत्मा की आवाज़ को वे समाज तक पहुंचाना चाहते थे। दीपक की भान्ति जलकर वे समाज को प्रकाश देना चाहते थे। कबीर का व्यक्तित्व क्रान्तिकारी था। वे एक ओर बहुत ही कठोर प्रकृति के थे, तर्कशील थे दूसरी ओर अत्यंत कोमल और भावुक थे। वे निडर तथा निर्भीक थे और जो कुछ वे कहना चाहते उसे सीधे शब्दों में प्रकट कर देते थे। कबीर के काव्य का विश्लेषण करने पर ज्ञात होता है उसका विषय मूल रूप से भक्ति

और सामाजिक चिंतन है। उनके भक्ति चिंतन में ही उनके दार्शनिक विचार उपलब्ध होते हैं। उनका सामाजिक चिंतन अनेक मुखी है और अपने समाज में व्याप्त अनेक सामाजिक समस्याओं का उन्होंने विरोध किया है। इसके लिए उन्होंने हिन्दु और मुसलमान दोनों को ही फटकारा और दोनों की कुप्रथाओं पर कुठाराघात किया। हिन्दुओं में व्याप्त मूर्ति-पूजा, तत्र-मंत्र, माला, जप, छापा-तिलक, व्रत तीर्थ आदि को उन्होंने व्यर्थ बताया है।

जन्त्र मन्त्र सब झूठ है, मत भरमा जग कोय।

सार शब्द जाने बिना, कागा हंस न होई ॥

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जप माला छापा तिलक सरै न एको काम।

मन कांचे नाचे वृथा, सांचे रांचे राम ॥

 

पाहन पूजे हरि मिले, तो मैं पूजू पहार।

ताते यह चाकी भली, पीसी खाय संसार॥

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माला फेरत युग भया, मिटा न मनका फेर।

करका मनका हारि दे, मन को मनको फेर ॥

 

हिन्दुओं की भांति उन्होंने मुसलमानों को भी डांटा-फटकारा और उनमें व्याप्त रूढ़ियों का पर्दाफाश किया। मस्जिद की अजां. रोजा, नमाज, खतना, मांस-भक्षण ६ का विरोध उन्होंने स्पष्ट रूप में किया। उनकी तीखी वाणी पर सत्य कथन के विरोध में किसी की तक करने की शक्ति नहीं थी।

कांकरि पाथरि जोरि के, मस्जिद लई बनाय।

ता चढ़ि मुल्ला बांग दे, क्या बहिरा हुआ खदाय॥

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दिन भर रोजा रखत हैं, रात हुनत है गाय।

यह खून, वह बन्दगी, कैसे खुशी खुदाय ॥

मुसलमानों की हिंसा, हिन्दुओं की छुआछूत और सांप्रदायिक भावना का विरोध वे प्रखर स्वर में करते हैं और दोनों को सही मार्ग दिखाने का प्रयास करते हैं

एक बून्द एकै मलमूतर, एक चाम एक गूदा।

एक जाति है सब उपजाना, को बामन को सूदा ॥

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अरे इन दोऊन राह न पाई।

हिन्दुअन की हिन्दुआई देखी, तुरकन की तुरकाई।।

इस प्रकार कबीर का सामाजिक पक्ष मानव मात्र के कल्याण की भावना से युक्त है। वास्तव में कबीर क्रान्तिकारी और निर्मीक व्यक्तित्व के चिंतक थे। उनका चिंतन सुधारवादी तथा मानवतावादी था इसलिए उनका स्वर अत्यंत प्रखर हो गया था। उनके काव्य का दूसरा । पक्ष अत्यंत कोमल तथा प्रेम रस से भीगा हुआ है। उनकी भावनाओं का आवेग, वाणी की कातरता, दीन-हीन पुकार निरीहता उनके प्रभु को भी करुणा से भर देती है। विरहिणी के रूप में अपने प्रियतम से बिछुड़ने पर उनकी विरह-भावना अत्यंत करुणा जनक बनती है तथा उसमें वेदना के स्वर अत्यंत प्रबल हो जाते हैं। ऐसे स्थलों पर कबीर का रहस्यवाद अत्यन्त भावात्मक हो उठता है।

कै बिरहन को मीच दे, के आपा दिखराए ।

आठ पहर का दानां, मो पै सहो न जाए।

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आई सकें न तुझ पे, सकू न तुझे बुलाय।

जियरा यों ही लेगे, विरह तपाई तपाई ॥

ईश्वर के सम्बन्ध में उनकी स्पष्ट धारणा है कि वह संसार में सर्वत्र व्याप्त है तथा कण-कण में विद्यमान है। माया के कारण ही वह हमें नज़र नहीं आता है। उनका चिंतन, जीव, जगत, माया, ब्रह्म आदि दार्शनिक तत्त्वों को सरल और सीधी भाषा में स्पष्ट करता है। ईश्वर की उपस्थिति उनके ही शब्दों में इस प्रकार समझी जा सकती है

ज्यों तिल मांहि तेल है, ज्यों चकमक में आगि।।

तेरा साई तुझ में, जागि सके तो जागि ॥

आत्मा और परमात्मा के मिलन की स्थिति उसी स्थिति में संभव है जबकि अज्ञान और या का परदा उठ जाता है। कुंभ और तालाब के जल के बीच में जब तक मिट्टी की दीवार है तब तक उनका मिलना संभव ही नहीं है। घड़े की दीवार टूटते ही दोनों में अभेद की

अति उत्पन्न हो जाती है। कबीर ने आत्मा को पत्नी तथा परमात्मा को पति का रूप देकर अत्यंत समर्थ प्रतीकों के द्वारा दोनों के मधुर मिलन का रूपक खींचा है।

दुलहनि गाबहु मंगलाचार।

हम घर आयडु राजा राम भरतार॥

निगुर्ण के उपासक कबीर के राम दशरथ के पुत्र राम न होकर उस ब्रह्म के प्रतीक है। जिसके लिए उन्होंने अनेक शब्दों का और प्रतीकों का प्रयोग किया है।

कबीर के काव्य का मूल्यांकन–महात्मा कबीर की सरल और पवित्र, जनहित कामना से प्रेरित वाणी जो काव्य रूप में प्रस्फुटित हुई है का मूल्यांकन कलावादी दृष्टि से करना सर्वथा ही असंगत है। कबीर मूल रूप से भक्त और सरल हृदय मानव मात्र के प्रेमी थे अतः उन्हें मनुष्य को गुमराह करने वाले अन्धकार में भटकाने वाले धर्म से घृणा थी। यही उनके काव्य की सबसे बड़ी विशेषता है। उनकी भाषा सधुक्कड़ी पंचमेल खिचड़ी थी। जिस प्रदेश में, स्थान में वे भ्रमण करते थे वहां के ही लोक प्रचलित शब्दों को अपने भावों के अनुकूल वे स्वयं बना लेते थे। इसीलिए उन्होंने शब्दों को तोड़ा-मरोड़ा है। ब्रज, अवधी, राजस्थानी, भोजपुरी, पंजाबी, खड़ी बोली, संस्कृत आदि भाषाओं के शब्दों का उन्होंने प्रयोग किया है। कबीर की अनुभूति को प्रकट करने के लिए जो प्रतीक उनके काव्य में प्रयोग हुए हैं वे निश्चय ही अत्यन्त सजीव एवं मार्मिक है। उनके ये प्रतीक दैनिक जीवन से ही लिए गए हैं। अलंकारों के प्रति उनका कोई आकर्षण नहीं था लेकिन अलंकार उनकी कविता में स्वयं ही आ गए है और वे आरोपित नहीं लगते हैं। रस की दृष्टि से श्रृंगार और शान्त रस ही उनके काव्य के प्रधान रस हैं। कबीर काव्य का मूल्यांकन वस्तुत: उसके भाववादी दृष्टिकोण से मानवतावादी दृष्टिकोण से ही किया जा सकता है।

उपसंहार-मध्यकालीन संत और भक्त कवियों में महात्मा कबीर की अपनी ही पहचान है और उनकी कविता की गंगा मानव के हित के लिए ही प्रवाहित हुई है। उनकी भक्ति एकांतिक भक्ति नहीं है। उनकी भक्ति में भी सरलता और पवित्रता है। उनका काव्य प्रेम और ज्ञान का दीपक है, उसमें विश्वबन्धुत्व की भावना है, तथा मानवतावाद का पोषण है। समन्वयवादी कबीर का हृदय संत हृदय था जो नवनीत से भी कोमल था।

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