Kisi Yatra Ka Varnan in Hindi Essay- किसी यात्रा का वर्णन पर निबंध

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Kisi Yatra Ka Varnan in Hindi Essay- किसी यात्रा का वर्णन पर निबंध

Hindi Essay on Kisi Yatra ka Varnan in 400 words

यात्रा यानि की अपनी जगह से कई दूर घुमने फिरने के लिए जाना ताकि हम अपनी रोज की भाग दौड़ भरी जिंदगी से कुछ समय के लिए निजात पा सके और अपने परिवार और दोस्तों को समय दे सके। यात्रा से व्यक्ति को बहुत अच्छा महसूस होता है और सभी के साथ मिल जुलकर रहने का अच्छा समय भी मिलता है। यात्रा के कई साधन है जैले कार,बस, रेलगाड़ी आदि। मुझे तो सबसे ज्यादा ट्रेन की यात्रा पसंद है। भारत में बहुत से पर्यटन स्थल है। बहुत से यात्री वहाँ जाते है और वहाँ की सुंदरता का लुप्त उठाते है। लोग धार्मिक स्थलों की भी यात्रा करने जाते है।

मैं भी इस साल अप्रैल में अपने दोस्तों के साथ वैष्णों देवी की यात्रा पर गई थी। मैं वहाँ अपने परिवार के साथ पहले भी जा चुकी थी और हमनें बहुत ही मजे किए थे। दोस्तों के साथ यात्रा का और परिवार के साथ यात्रा का अलग ही मजा है। हम पाँच दोस्त थे और हमने रेलगाड़ी से यात्रा करने का तय किया था और उस समय रेलों मैं बहुत ही ज्यादा भीड़ थी। हमारी ट्रेन अंबाला से रात के 10 बजे की थी। ट्रेन के आते ही हम सब उसमें सवार हो गए और खाना खाया। हम सभी दोस्तों ने रात को लुडो खेला, अंताक्षरी खेली। जम्मु से ट्रेन के गुजरते वक्त हमनें खिड़किया खोलकर ठंडी हवा का आंनद लिया। हम सुबह 7 बजे कटरा पहुँचे जहाँ के पहाड़ों में माता वैष्णों देवी का मंदिर स्थित है।

हम लोगों ने वहाँ पर पहुँचकर हॉटल में कमरा लेकर विश्राम किया और एक बजे माता के मंदिर के लिए चढाई शुरू की जो कि 14 किलोमीटर की है। लगभग दो किलोमीटर चढ़ने के बाद हम बाण गंगा पहुँचे और वहाँ पर स्नान किया। गंगा का पानी बहुत ही शीतल था। उसके बाद हमने रूककर खाना खाया। वैष्णों देवी की चढ़ाई पर सुरक्षा के बहुत ही अच्छे इंतजाम किए गए है। बुढ़े लोगों की चढाई के लिए खच्चर और पालकी आदि का इंजाम है। बच्चों को और बैगों को उठाने के लिए पिठ्ठू वाले है। उनकी हालत बहुत ही दयनीय होती है वह अपनी आजीविका चलाने के लिए यह कार्य करते है। हम आस पास देखते हुए हंसते खेलते माता रानी का नाम लेकर चढ़ाई चढ़ते गए। दोपहर में गर्मी होने के कारण हम थोड़ी-थोड़ी दुरी पर नींबू पानी जूस आदि पीते रहे। ऐसे करते करते हम माता के मंदिर पहुँच गए और 6 घंटे लाईन में लगने के बाद माता रानी के दर्शन हुए। उसके बाद हमनें भैरों बाबा की चढ़ाई शुरू की जिसके बिना यात्रा को अधुरा माना जाता है। रात को बहुत ही ज्यादा ठंड हो गई थी। हमनें नीचे उतरना शुरू किया। कमरे पर पहुँच कर हमने आराम किया और वापसी के लिए ट्रेन पकड़ी। तीन दिन की इस यात्रा ने हमें बहुत ही सुखद अनुभव दिया जिसे हम कभी नहीं भूल सकते।

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Yatra Ka Varnan in Hindi Essay

भूमिका- दैनिक जीवन के एक निश्चित कार्यक्रम के अनुसार निरन्तर कार्य करते – मनुष्य थक जाता है। दूसरी ओर कार्य करते-करते वह ऊब भी जाता है। तब उसे एक विशेष परिवर्तन की आवश्यकता पड़ती है जिससे वह अपने कार्य करने के लिए पुनः तत्पर हो जान है। इस प्रकार के परिवर्तन से मनोवैज्ञानिक प्रभाव पड़ता है। मनुष्य किस प्रकार का परिवर्तन चाहता है, यह उसकी प्रवृत्ति पर निर्भर करता है। कुछ लोग विशेष प्रकार के ऐतिहासिक स्थानों की यात्रा करते हैं, कुछ लोग अपनी यात्रा में अनेक प्रमुख शहरों की यात्रा को महत्त्व देते हैं तथा। कुछ लोग धार्मिक प्रवृत्ति के होते हैं और धार्मिक स्थानों, मंदिरों की यात्रा भी करते हैं। यात्रा निश्चय ही मनुष्य को आनन्द प्रदान करती है तथा ज्ञानार्जन करने का साधन भी बनती है। क्योंकि यात्रा करते हुए वह सभी कुछ अपनी आंखों से देखता है। प्राकृतिक दृश्य मन को लुभाते हैं, नये स्थान, अपरिचित लोग, बदले हुए वातावरण से उसे प्रसन्नता मिलती है। प्राचीन काल में हमारे देश में तपस्वी लोग कभी भी किसी एक ही स्थान पर अधिक समय के लिए नहीं ठहरते थे। क्योंकि उनका विचार था कि इससे मनुष्य का ज्ञान ही सीमित नहीं होता अपितु वह गतिहीन और शून्य के समान हो जाता है। हमारे विद्यालय में श्री शर्मा जी इस प्रकार के अध्यापक है जो बच्चों के साथ प्रमण करने के लिए सदैव इच्छुक रहते हैं तथा अनेक अवसरों पर वे छात्रों को अनेक स्थानों की यात्रा करवा चुके हैं।

यात्रा का निर्णय और तैयारी– इस बार अप्रैल, में हमारे विद्यालय की दसवीं कक्षा के छात्रों ने यह निर्णय किया कि शर्मा साहब से यह प्रार्थना की जाए कि वे किसी पर्वतीय स्थल की यात्रा का कार्यक्रम बनाएं। इस प्रकार किस स्थान पर जाया जाय, इसके लिए सभी ने अनके स्थानों के नाम बताए जैसे-मंसूरी, नैनीताल, शिमला आदि। पर इन अनेक स्थानों के भ्रमण करने में यह प्रमुख कठिनाई थी कि हमारे विद्यालय में चार दिन का अवकाश था। अन्त में सभी ने मिलकर यह निर्णय किया कि इस बार वैष्णो देवी की यात्रा की जाय। यह निश्चय होते ही सभी हर्ष से उछल पड़े तथा ‘जय माता की जय माता की घोष करने लगे। क्योंकि गर्मियों का समय था अत: विशेष ऊनी वस्त्रों की आवश्यकता नहीं थी परन्तु अपने अध्यापक के कहने पर हमने एक-एक पूरी बाहों की स्वैटर भी रखने का निश्चय किया। हमारे दल में ‘लड़कों की संख्या तीस हो गई थी। जालन्धर से जम्मू के लिए रात को दो। बजे जेहलम एक्स्प्रेस गाड़ी जाती है, उसमें ही हमने जाने का निश्चय किया। क्योंकि यात्रा केवल 4 दिन की रखी गई अत: कोई विशेष सामान रखने की आवश्यकता प्रतीत हुई। इसके अतिरिक्त रास्ते में क्योंकि सभी सुविधाएं प्राप्त हो जाती हैं अत: साथ में अधिक सामान रखना आवश्यक नहीं था। हम सभी छात्र ठीक डेढ़ बजे रात को रेलवे स्टेशन जालन्धर में पहुंचे। कई छात्रों के साथ उन्हें छोड़ने के लिए उनके माता-पिता तथा अभिभावक भी आए थे। निश्चित समय पर गाड़ी प्लेट फार्म पर पहुंची। हमने देखा कि जालन्धर स्टेशन पर ही लगभग चार-पाँच सौ लोग वैष्णो देवी की यात्रा के लिए जा रहे थे क्योंकि गाड़ी के चलने के समय ‘जय माता दी’ ध्वनि गूंजने लगी।

यात्रा का वर्णन– रात को गाड़ी दो बजे जालन्धर से चल पड़ी। कुछ समय तक हम सभी लोग आपस में बातें करते रहे लेकिन धीरे-धीरे छात्रों को नींद आने लगी और हम सभी सो गए। सुबह सात बजे के लगभग हम जम्मू तवी में पहुंचे। उस दिन के लिए सभी ने यह निश्चय किया कि जम्मू में रुकें और घूमें। अत: हम सभी रघुनाथ मन्दिर के पास की एक सराय में रुके जिसमें सभी प्रकार की व्यवस्था थी। यहां पर पहुंच कर सभी शौचादि क्रिया से निवृत हो कर स्नान कर तैयार हुए और रघुनाध मन्दिर में दर्शन के लिए चल पड़े। इस मन्दिर में बहुत ही भव्य मूर्तियां रखी हैं तथा कहते हैं कि वहां 84 लाख के लगभग देवताओं के प्रतीक बनाए हुए हैं। रघुनाथ मन्दिर में बहुत भीड़ थी। अनेक शहरों से लोग यहां आए थे। कुछ लोग वैष्णो देवी की यात्रा करके वापिस आ गए थे और कुछ लोग हमारी ही भांति यात्रा करने के लिए जाने वाले थे। रघुनाथ मंदिर के बाद हम जम्मू के बाजार में घूमने के लिए निकल पड़े। यहां हमें यह देखकर आश्चर्य हुआ कि बाजार में कहीं चढ़ाई है कहीं ढलान। ऊपर चढ़ते और नीचे उतरते हम बाजार में घूमते रहे और इस प्रकार यह दिन हमने जम्मू में बिताया। दूसरे दिन हम सुबह के समय बस के द्वारा कटरे के लिए तैयार हो गए। जम्मू से कटरा जाने वाले यात्रियों की बहुत अधिक भीड़ थी। हमें एक घण्टे तक बस स्टैंड पर खड़े होने के बाद बस मिली। यह बस शहरों में चलने वाली बस की अपेक्षा छोटी थी। जैसे ही बस आगे बढ़ी सभी ने माता का जय घोष किया। कुछ ही समय पश्चात् बस टेढ़े-मेढ़े घुमावदार मार्ग पर चलने लगी। बस में बैठे हुए भी हम दूर-दूर फैली पर्वत श्रेणियों को देख रहे थे। कभी-कभी कोई भक्त माता की जयकार करता और फिर सभी लोग उसके साथ बोल पड़ते। कटरा से यात्रियों से भरी हुए अनेक बसें वापिस आ रही थीं। ठण्डी । हवा के झोंके हमें प्रसन्न कर रहे थे। इस प्रकार पहाड़ी मार्ग के द्वारा यात्रा करते हुए हम 10 बजे दिन में कटरा पहुंचे। कटरा में यात्रियों की बहुत अधिक भीड़ थी। यहां हमने पहले एक धर्मशाला में पड़ाव डाल दिया। हम सभी लोग एक ही जगह ठहर गए। कुछ समय बाद हममें से कुछ लोगों ने वैष्णो देवी के मंदिर में जाने के लिए जो टिकट कटरा में मिल रहे थे वे टिकट प्राप्त किए। हमारे अध्यापक भी टिकट प्राप्त करने गए थे। लगभग सात बजे सायं को हमने वैष्णो देवी के लिए पैदल मार्ग की यात्रा आरम्भ की। कटरा से थोड़ी दूर पर आगे बाण गंगा है, हमने उसमें उतर कर स्नान किया। वैष्णो देवी की कथा से यह नदी जुड़ी हुई है। यहां पर टिकट पर एक विशेष नम्बर लगया गया। हमने आगे बढ़ने का निश्चय किया। यहीं से वैष्णो देवी की यात्रा के लिए दो मार्ग हो जाते हैं। एक मार्ग सीढ़ियों वाला है तथा दूसरा घुमावदार पगडंडी का मार्ग है। हम सभी युवा थे अतः हमने निश्चय किया कि कभी सीढ़ियों से चलें और कभी पगडंडी से। इससे हम दोनों मार्गों का और यात्रा का आनन्द ले सकेंगे। दोनों रास्तों पर आने-जाने वाले लोगों की भीड़ थी। लोग आते-जाते अथ माता’ कहकर ही एक-दूसरे का स्वागत करते थे। जाने और आने वाले लोगों में कुछ | बहुत ही वृद्ध भी होते थे और घोड़ों पर चढ़ कर आ-जा रहे थे। यात्रियों में दक्षिण भारत के भी बहुत-से लोग हमसे मिले। इस यात्रा में अनेक धर्म और जाति के लोग चल रहे थे। इस मार्ग पर यात्रा कठिन होती है पर सभी साथी आराम से थोड़ी दूर पर बैठकर चलते थे। कटरा के बाद फिर थोड़ी दूर पर धार्मिक स्थान चरण पादुका मिलता है। यहां पर दर्शन कर हम आगे बढ़े। फिर धीरे-धीरे चलते-बढ़ते हम आदि कुंवारी में पहुंचे। रात्रि के समय यहां चढ़ना बहुत ही सुखद और मनोहारी लगता है। बिजली का प्रकाश यद्यपि बहुत तेज नहीं होता तथापि मार्ग-दर्शन के लिए यह सहायता कर देता है। ‘आदि कुंवारी’ में बहुत बड़ी संख्या में लोग ठहरे हुए थे। यहां पर एक गुफा के मार्ग में निकलना होता है। जिसे गर्भयोनि कहते हैं। यह मार्ग बहुत ही तंग है तथा जब गुफा में प्रवेश करते हैं तो मन एक अजीब भय और कौतूहल से भर जाता है। पेट के बल लेट कर फिर इससे आगे निकलना पड़ता है। यहाँ भी माता की जयकार करते हुए लोग आगे बढ़ते हैं। हम यहाँ पर लगभग दस बजे पहुंचे तथा एक घण्टा यहीं पर रुके। अनेक यात्री रात्रि को यहीं विश्राम करते हैं तथा सुबह के समय अपनी यात्रा आरम्भ करते हैं। पर हमने निश्चय किया कि हम लोग अपनी यात्रा रात को जारी रखेंगे। अतः यहां पर हमने रात्रि का भोजन किया। यह बात उल्लेखनीय है। कि यहाँ पर व्यापारी यात्रियों के साथ अभद व्यवहार करते हैं और उनको मनमानी कीमतों पर चीजें, भोजन देकर लूटते हैं। सरकार की ओर से इन पर कोई नियन्त्रण नहीं होता है। ‘आदि कुंवारी’ पर लगभग आधी यात्रा हो जाती है। रात्रि में यहाँ से कटड़ा की ओर देखने पर अत्यन्त मोहक प्रकाश नज़र आता है। इस मार्ग पर बढ़ते हुए हमें अत्यन्त आनन्द आ रहा था। क्योंकि यह मार्ग चीड़ और देवदार के जंगल के बीच से होकर गुज़रता है, अतः यहाँ की यात्रा अत्यन्त रोमांचकारी थी। रात में ठण्डी-ठण्डी हवा बह रही थी तथा आकाश में बिखरे तारे और चाँद का प्रकाश दृश्य को रमणीय बनाता था। हम सभी लोग आपस में चुटकुले आदि सुनाते, माता का जयघोष करते आगे बढ़ रहे थे। हमारे अध्यापक साहब ने हमें माता के भजन भी सुनाए। चढ़ाई चढ़ते हुए कठिनाई और थकान तो अवश्य होती है परन्तु आनन्द भी बहुत मिलता है। यह मार्ग सारी रात यात्रियों से भरा रहता है तथा पूरी रात-दिन लोग चलते रहते हैं। यात्रियों को लूटने का कोई भय नहीं होता है। लोग निडर होकर यात्रा करते हैं। अर्द्धक्वारी के बाद ‘हाथी मत्था’ नामक स्थान आता है। इस स्थान पर बैठकर हमने विश्राम किया।

हाथी मत्था से आगे की यात्रा भी रोचक रही। यहाँ से चढ़ाई समाप्त होती है उसके बाद की यात्रा बहुत ही सुखद होती है। पहाड़ी चोटियों से घिरे हुए इस प्रदेश में दूर-दूर तक के स्थान नज़र आते हैं। हरे-भरे खेतों के दृश्य, घने-जंगल तथा जंगल में पक्षियों के चहचहाने की ध्वनि बहुत ही प्रिय लगती है। इस स्थान के बाद लोग भाग-दौड़कर जाते हैं, बच्चे तो बहुत ही हर्षित होकर दौड़ लगाते हैं। फिर कुछ समय के बाद उतराई आरम्भ हो जाती है और तब संभल-संभल कर चलना आवश्यक हो जाता है। क्योंकि इस मार्ग पर फिसलने का भय बना रहता है। इसके बाद माता वैष्णो देवी का मन्दिर नज़र आने लगता । है। हम लोग माता का जयघोष करते हुए सुबह के चार बजे मन्दिर में पहुंचे।

यात्रा के स्थल का वर्णन– यह स्थल वास्तव में एक पहाड़ी स्थान पर बना हुआ है। पहाड़ की गुफा में ही माता का मन्दिर बनाया गया है। इस स्थान पर कुछ व्यापारी लोगों के होटल और दुकानें हैं तथा शेष धर्मशालाएं हैं। इन धर्मशालाओं की व्यवस्था यदि बहुत आरामदायक नहीं होती है तो बहुत खराब भी नहीं होती है। जब यहां आने वाले यात्रियों की संख्या बहुत अधिक हो जाती है तब यहाँ यात्रियों को बहुत कठिनाई का सामना करना पड़ता है। क्योंकि धर्मशालाएं यहां पर्याप्त नहीं होती है। पहाड़ी पर होने के कारण यहाँ इधर-उधर घूमने का स्थान भी नहीं है। चारों ओर सीधे खड़े हुए पहाड़ ही नज़र आते हैं। पर्वत के नीचे घाटी बन जाती है तथा इस ओर दूर-दूर तक खेत दिखाई पड़ते हैं। यहाँ पर पानी की भी विशेष व्यवस्था नहीं है। नहाने के लिए माता के मंदिर के पास ही चार-पाँच नलों की व्यवस्था है। यहाँ पर स्त्रियों के स्नानगृह भी अलग व्यवस्थित रूप में उपलब्ध नहीं है।

यहाँ पहुंचकर हमने स्नान किया और माता को चढ़ाने के लिए प्रसाद इत्यादि लेकर पंक्तियों में खड़े हो गए। लाइन में लगभग दो घण्टे खड़े रहने के बाद ही हमारी बारी आई। माता की गुफा में जाकर हमने तीनों पिण्डियों के दर्शन किए। इस गुफा में बहुत ही ठण्डा पानी बहता है। झुक-झुक कर इस मंदिर की गुफा में जाते हैं। दर्शन करके दूसरे मार्ग से बाहर आते हैं। दर्शन करके हम लोग वापिस धर्मशाला में आए लगभग पाँच घण्टे तक इस तीर्थ-स्थल में ठहरने के बाद पुन: वापिस चल पड़े। उतरते हुए वास्तव में लोग अधिक उत्साह से भागते-दौड़ते हैं। इस प्रकार हमने आदि कुंवारी में पुन: बैठकर विश्राम किया और वहाँ से बिना रुके कटरा पहुंचे। कटरा में भी हमने विश्राम नहीं किया तथा सीधे बस पकड़ कर जम्मू आए। यहाँ से हमने यात्रा बस से ही की और फिर अपने शहर जालन्धर में पहुंचे। माता का जयघोष करते हुए हम अपने घरों की ओर चल दिए।

उपसंहार– वास्तव में इस प्रकार की धार्मिक यात्रा अनेक दृष्टि से महत्त्व रखती है। एक ओर इस यात्रा में सभी लोग लोग, सभी भेदभाव भुलाकर साथ चलते हैं तथा निडर होकर यात्रा करते हैं, दूसरी ओर यात्रा की दृष्टि से और भ्रमण करने की दृष्टि से भी इस यात्रा का अपना विशेष आनन्द और महत्त्व है। सचमुच पैदल चलकर यात्रा का आनन्द लेना कहीं अधिक सुखदायी होता है अपेक्षाकृत बस में बैठकर यात्रा करने के। जंगल के रास्ते से गुज़रते हुए भी अनेक प्रकार के सुन्दर दृश्य मन को मोहते हैं। शान्त वातावरण में सुख की अनुभूति होती है। इस यात्रा में यह बात उल्लेखनीय है कि पंडा और पुजारी केवल धन एकत्रित करने से ही जुड़े रहते हैं। इन लोगों के मन में श्रद्धा नहीं होती है और न ये लोग यात्रियों से अच्छा व्यवहार करते हैं। दूसरी ओर व्यवस्था की दृष्टि से मन्दिर में भी अनेक कमज़ोरियाँ हैं। श्रद्धालु लोग इस ओर ध्यान नहीं देते हैं। अतएव जम्मू-कश्मीर की सरकार तथा वहाँ के ट्रस्टी लोगों को इस ओर ध्यान देना चाहिए।

# Yatra Vritant in Hindi

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