Viram Chinh in Hindi Grammar- विराम चिह्न (Punctuation Marks)

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Viram Chinh in Hindi Grammar विराम चिह्न (Punctuation Marks)

शब्दों, वाक्यों, उपवाक्यों, वाक्य-खण्डों आदि के बीच में कुछ देर के लिए ठहराव की होती है। इस ठहरने या रुकने का नाम विराम है। इस हेतु लेखक जिन चिह्नों को प्रयक्त के है उन्हें ही विराम चिह्न कहते हैं। विराम चिह्न का महत्त्व भाषा में बहुत अधिक है। इसके अध में सही अर्थ स्पष्ट नहीं होता है। हिन्दी में साधारणतः निम्नलिखित विराम चिह्नों का प्रयोग किया जाता है-

Viram Chinh chart in Hindi

1. पूर्ण विराम                                ( | )

2. अल्प विराम                              ( , )

3. अर्द्ध विराम                               ( ; )

4. प्रश्न सूचक चिह्न                           ( ? )

5. विस्मयादि बोधक                         ( ! )

6. उद्धरण चिह्न                              (“ ”)

7. कोष्ठक                                     ( ), { }, [ ]

8. संक्षेप में                                   ( . )

9. योजक चिह्न                                ( – )

10. रेखिका                                  ( __ )

11. निर्देशक                                  ( _ )

12. अपूर्णता सूचक                          (xxxx)

13. त्रुटि बोधक                               (^)

14. समाप्ति सूचक                           (-x-x-)

पूर्ण विराम ( Purn Viram )–पूर्ण विराम का प्रयोग साधारणतः वहाँ होता है जहाँ वाक्य अन्तिम रूप लेकर समाप्त हो जाता है।

जैसे-राजेश पढ़ने में तेज है। शीला खेलती है।

किसी व्यक्ति या वस्तु का जब सजीव वर्णन प्रस्तुत किया जाता है तो प्रत्येक वाक्यांश के अन्त मे पूर्ण विराम आता है।

जैसे-गोरा रंग। गालों पर तिल । पतले होठ। सिर के बाल न अधिक बड़े न अधिक छोटे।

अल्प विराम ( Alpviram )- अल्प विराम का प्रयोग वहाँ होता है, जहाँ थोड़ी देर के लिए ठहरा जाता है। हिन्दी में अन्य विराम चिह्नों की अपेक्षा इसका अधिक प्रयोग होता है। इसका प्रयोग अग्रलिखित अवस्थाओं में होता है-

1.जब एक ही कोटि के दो या दो से अधिक शब्द, शब्दांश या वाक्यों का प्रयोग हो तो प्रत्येक के बीच अल्प विराम आता है।

जैसे-शील प्रकाश, आनन्द प्रकाश और ज्ञान प्रकाश खेलने जा रहे हैं।

2. जब शब्दों का प्रयोग जोड़े के साथ होता है तो प्रत्येक जोड़े के बाद अल्प विराम चिह्न आता है।

जैसे-हानि-लाभ, जीवन-मरण, यश-अपयश विधि हाथ।

3. सम्बोधन कारक के बाद भी अल्प विराम आता है।

जैसे-रामू, दो प्याला चाय बना लाओ।

4. यह, वह, तब, तो, वा, अब आदि के लुप्त होने पर अल्प विराम का प्रयोग होता है।

जैसे-जो मैं कहता हूँ, सुनो (यहाँ ‘वह लुप्त है।)

5. किन्तु, परन्तु, इसी से, इसलिए, जिसके, तथापि, अतः, क्योंकि आदि के पहले भी अल्प विराम आता है।

जैसे—वह परीक्षा में उत्तीर्ण हो गया, क्योंकि परिश्रम करता था।

6. भावातिरेक में किसी शब्द पर विशेष बल प्रदान करने के लिए-

जैसे-वह मेहनत से, थोड़ी मेहनत से जी चुराता है।

7. उद्धरण के पूर्व अल्प विराम होता है।

जैसे-राम ने कहा, ‘मैं कोलकाता जाऊँगा’ ।

8. तारीख को सन् से अलग करने के लिए अल्प विराम आता है।

जैसे- 13 जून, 1969 ई.

9. छन्दों में यति सूचित करने के लिए भी अल्प विराम आता है।

जैसे-साँच बराबर तप नहीं, झूठ बराबर पाप।

10. वस्तुतः, अच्छा, हाँ, बस, अतः, सचमुच, नहीं आदि शब्दों से जब किसी वाक्य को प्रारम्भ किया जाता है तो अल्प विराम चिह्न का प्रयोग होता है।

जैसे-नहीं, मैं यह नहीं कर सकता।

11. जब कोई वाक्य लम्बा हो तो वाक्य में आगत उन शब्दों या पदबन्धों को अलग करने के लिए जिनका वाक्य की रचना में अप्रत्यक्ष सम्बन्ध है, अल्प विराम चिह्न आता है।

जैसे-वह तो, अच्छी तरह समझने पर भी नहीं मानता।

12. जब प्रधान वाक्य के बीच में मिश्र और संयुक्त वाक्यों में आश्रित वाक्य आता है तब भी अल्प विराम आता है।

जैसे—यह लड़का, आपने भी देखा होगा, समझदार नहीं है।

अर्द्ध विराम ( Ardh Viram )-अर्द्ध विराम, अल्प विराम की तुलना में अधिक रुकने का भाव व्यक्त करता है। अर्द्ध विराम का प्रयोग साधारणतः निम्नलिखित अवस्थाओं में होता है-

1.वाक्य में जहाँ अल्प विराम की अपेक्षा कुछ अधिक देर रुकना पड़ता है, वहाँ अर्द्ध विराम चिह्न का प्रयोग किया जाता है।

जैसे–महापुरुष मरते नहीं; वे तो अमर हो जाते हैं।

2. वाक्य में जहाँ मिश्र वाक्यों के बीच अल्प विराम से भ्रमित होने की संभावना हो वहाँ अर्द्ध विराम का प्रयोग होता है।

जैसे-जब राकेश परीक्षा में उत्तीर्ण हुआ, तो बड़ी खुशियाँ मनाई गईं; मिठाई बांटी गई और लोगों ने उसे बधाई दी।

प्रश्न सूचक चिह्न- प्रश्न सूचक चिह्न का प्रयोग सीधे प्रश्न के अंदर किया जाता है।

जैसे-तुम्हारे विद्यालय का नाम क्या है?

प्रश्न वाचक वाक्य यदि किसी क्रिया का कर्म हो तो प्रश्न सूचक चिह्न नहीं प्रयोग में लाया जाता है। दूसरे शब्दों में यदि प्रश्न के उत्तर की अपेक्षा न रखी जाए तो प्रश्न चिह्न नहीं लगाया जाता है।

जैसे- मैं अच्छी तरह समझता हूँ, तुम कहाँ जा रहे हो।

विस्मयादि बोधक-हर्ष, शोक, विस्मय, भय, करुणा, घृणा आदि भावों को अभिव्यक्त करने वाले पदों के साथ विस्मयादि बोधक चिह्न का प्रयोग किया जाता है।

जैसे- अहा! कितना रमणीय उपवन है।।

उद्धरण चिह्न-इस चिह्न का प्रयोग निम्नलिखित दशाओं में होता है।

1.जब किसी के कथित शब्दों को उसी रूप में प्रस्तुत किया जाता है।

जैसे- गुरुजी ने आज बताया। “पृथ्वी गोल है”।

2. पुस्तकों, पदवियों उपमानों आदि के साथ साधारणतः इकहरे उद्धरण चिह्न का प्रयोग होता है।

जैसे- ‘राम चरित मानस,’ ‘हरिऔध’ आदि।

3. वाक्य में किसी शब्द की विशिष्टता को सूचित करने के लिए भी इकहरे उद्धरण चिह्न का प्रयोग किया जाता है।

जैसे- ‘सदन’ का शाब्दिक अर्थ है ‘घर’ ।

4. कहावतों और वचनों को उद्धृत करने के लिए इस चिह्न का प्रयोग होता है।

जैसे- “क्षुद्रनदी भरि चली उतराई।

जिमि थोड़े धन खल बौराई ।

कोष्ठक का प्रयोग

1.जब वाक्य में कोई ऐसा शब्द आए जिसका मूल वाक्य से सम्बन्ध नहीं हो।

जैसे-उन दिनों श्री (अब डॉक्टर) कैलाशनाथ कॉलेज के प्राध्यापक थे।

2. नाटक में अभिनेता को निर्देश देने के लिए।

जैसे-नौकर (हाथ जोड़कर)-मालिक क्षमा कीजिए। 3. विषय विभाग क्रमांकों एवं अक्षरों के साथ।

जैसे-(1), (क) आदि।

संक्षेप में- इस चिह्न का प्रयोग किसी शब्द के संक्षिप्त रूप के साथ होता है।

जैसे- प्रो. (प्रोफेसर के लिए)।

डॉ. (‘डॉक्टर के लिए)।

योजक चिह्न-योजक का प्रयोग निम्नलिखित दशाओं में होता हैसमस्त पदों के बीच योजक चिह्न खींचा जाता है-

जैसे- सन्धि-कोश, पाप-पुण्य।

रेखिका

1.रेखिका का प्रयोग विवरण देते समय होता है।

जैसे-जैसे-‘ या ‘उदाहरण-‘ के बाद इसका प्रयोग सर्वत्र देखा जाता है।

2. जब किसी कथन को उद्धृत करना हो तो पहले इसका प्रयोग किया जाता है।

जैसे—उसने कहा-‘राम पढ़ने में तेज है’।

3. वाक्य में यदि विचार भंग हो जाता है और तदनन्तर उसका सूत्र फिर से जोड़ दिया जाता है, तो रेखिका का प्रयोग किया जाता है।

जैसे-अन्ततोगत्वा-इस कथन को संक्षेप में कहा जाए-इसने आमरण व्रत करने का संकल्प किया।

निर्देशक– इसका प्रयोग निम्नलिखित अवस्थाओं में होता है-

1.अगर वाक्य में भावगत अचानक परिवर्तन हुआ हो-अपने स्वास्थ्य पर ध्यान देना,अध्ययन सुचारु रूप से चले और-और क्या?

2. कविता या लेख आदि के नीचे लेखक या पुस्तक का नाम लिखने से पूर्व प्रयोग होता है।

जैसे- साँच बराबर तप नहीं झूठ बराबर पाप।

जाके हृदय साँच है ताके हृदय आप ।।

3. वाक्य में आगत ऐसे शब्द या उपवाक्य के पहले जिन पर बल देना हो-

जैसे-“हम देख रहे थे-क्रीड़ास्थल कुरूक्षेत्र का लघु संस्करण बन चुका था। नेता का नाम था-चन्द्रशेखर।

अपूर्णता सूचक-जब उद्धरण प्रस्तुत किया जाता है और उसका कुछ अनावश्यक अंग छोड़ दिया जाता है।

जैसे-

मुख-चन्द्र चाँदनी जल से

मैं उड़ता था मुँह धोके।।”

त्रुटिबोधक– इसे हंसपद भी कहते हैं। किसी शब्द या वाक्यांश या वाक्य के छूट जाने पर लिखते समय उसे जोड़ दिया जा सकता है।

जैसे-वह ^ घर जा रहा था। यहाँ पर छुटे हुए वाक्यांश (^) हैं- “अपने पिता को बुलाने के लिए”

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