विद्यार्थी और अनुशासन पर निबंध- Vidyarthi Aur Anushasan Par Nibandh

In this article, we are providing an  Vidyarthi Aur Anushasan Par Nibandh | Essay on Student and Discipline in Hindi |  विद्यार्थी और अनुशासनर पर निबंध हिंदी | Nibandh in 100, 200, 250, 300, 500, 1000, 12000 words For Students & Children.

दोस्तों आज हमने Vidyarthi Aur Anushasan Essay in Hindi लिखा है विद्यार्थी और अनुशासन पर निबंध हिंदी में कक्षा 1, 2, 3, 4, 5, 6, 7, 8, 9 ,10, और 11, 12 के विद्यार्थियों के लिए है।

विद्यार्थी और अनुशासन पर निबंध- Vidyarthi Aur Anushasan Par Nibandh

 

( Essay-1 ) Short Vidyarthi Aur Anushasan Par Nibandh ( 200 words ) 

विद्यार्थी और अनुशासन पर निबंध 200 शब्दों में

व्यावहारिक जीवन में हमें स्वयं को अनुशासन में ढालना पड़ता है। हम नियम के अनुसार समयय पर सोते हैं, समय पर खाते हैं। विद्यालय व अन्य जगह जाते हैं। अपने कर्तव्य का पालन करते हैं। अपने कर्म क्षेत्र में सफलता हासिल करते हैं। इससे हम समाज व परिवार में सम्मान प्राप्त करते हैं। अनुशासन के बिना एक विद्यार्थी विद्यार्जन नहीं कर सकता। विद्यालय में आदि से अंत तक विविध कार्यों के लिए नियम बने रहते हैं। उनका पालन करना सबके लिए नितान्त आवश्यक है। उनका पालन न करने पर हमें दंड मिल सकता है। हम निश्चित समय पर विद्यालय पहुंचते हैं। प्रार्थना के बाद विधिवत कक्षाओं में आते हैं, हर जगह एक पंक्तिबद्ध जाना एक अनुशासन है। फिर घंटों के अनुसार हम विषय वार पढ़ाई करते हैं। अंत में घंटी बजती है जिनका पालन हम श्रद्धा के साथ करते हैं। अपने गुरुजनों का सम्मान करना, सहपाठी भाइयों के साथ प्रेम से रहना भी एक अनुशासन के अंतर्गत आता है।

अनुशासित राष्ट्र ही सदैव उन्नति कर सकता है। देश को सुचारू रूप से चलाने के लिए कुछ कानून बने होते हैं। उनका सभी देशवासियों को पालन करना होता है। पालन न करने पर हम दंड के भागी होते हैं। इनके अतिरिक्त हम जिस कर्म पर भी संलग्न हैं, उसको हम राष्ट्रीय भावना से करें, राष्ट्र से ममता व प्यार करें यह हमारा राष्ट्रीय अनुशासन हैं।

 

( Essay-2 ) Vidyarthi Aur Anushasan Essay in Hindi with points ( 300 to 400 words )

विद्यार्थी और अनुशासन पर निबंध 300 शब्दों में

विद्यार्थी और अनुशासन

अनुशासन का अर्थ व प्रकार-नियंत्रण में रहकर तथा नियमों का लन करते हुए कार्य करना अनुशासन कहलाता है। अन्य शब्दों में नियमों का पालन करना अथवा नियंत्रण को स्वीकार करना अनुशासन है। अनुशासन दो प्रकार से होता है-(1) आत्मिक तथा (2) बाह्य। आत्मिक अनुशासन में व्यक्ति अपनी इच्छा से अनुशासनबद्ध होता है। जबकि बाह्य अनुशासन भय, दण्ड तथा बाहरी दबाव के कारण होता है। इनमें से आत्मिक अनुशासन ही सबसे अच्छा माना जाता है।

अनुशासन का महत्त्व

जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में मनुष्य को कुछ-नकछ नियमों का पालन करना पड़ता है। व्यक्तिगत जीवन, परिवार, समाज, धर्म तथा राजनीति सभी क्षेत्रों में अनुशासन का विशेष महत्त्व है। इतना ही नहीं प्रकृति अथवा सृष्टि भी अनुशासनबद्ध हैं। प्रकृति के नियम शाश्वत एवं अटल हैं। ग्रह एवं नक्षत्र, सूर्य, चन्द्रमा, पृथ्वी आदि सभी अनुशासनबद्ध हैं। यदि ये सभी अपने नियमों को तोड़कर काम करने लग जाएँ तो सारे संसार में उथल-पुथल मच जायेगी। .

विद्यार्थी और अनुशासन

विद्यार्थी के लिए तो अनुशासन बहुत महत्त्वपूर्ण है। विद्यार्थी जीवन ही मनुष्य के भावी जीवन की आधारशिला है। यही वह समय है जब वह अनुशासन में रहना सीख सकता है। पहले तो उसे . विद्याध्ययन करने के लिए अनुशासन में रहना आवश्यक है, दूसरे अपने भावी जीवन को सुधारने के लिए अनुशासन के गुण को अपनाना पड़ता है। विद्यार्थी के जीवन में अनुशासन उसके सर्वांगीण विकास के लिए अनिवार्य है। अनुशासन के अभाव में विद्यार्थी अपने लक्ष्य से भटक सकता है। अनुशासित विद्यार्थी अपने जीवन को सुचारु रूप से चला सकता है। अतः अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिए विद्यार्थी को अनुशासनबद्ध होना चाहिए।

विद्यार्थी और अनुशासनहीनता

आज का विद्यार्थी अनुशासनहीन होता जा रहा है। वह आंदोलन, दंगा-फसाद, चाकूबाजी, गन्दी राजनीति, हड़ताल, हत्या, बंद, आगजनी, डाका व लूटमार जैसे अनुचित कार्यों से जुड़ता जा रहा है। विद्यार्थी वर्ग में अनुशासनहीनता के लिए वर्तमान शिक्षा पद्धति उत्तरदायी है। इसके अतिरिक्त बेरोजगारी, भविष्य की अनिश्चितता और भ्रष्टाचार भी छात्रों में अनुशासनहीनता के लिए उत्तरदायी हैं। विद्यालयों में शिक्षकों की गुटबाजी, राजनीतिज्ञों का अंधा स्वार्थ, घरेलू व सामाजिक वातावरण, सस्ती फिल्में व सस्ते साहित्य आदि भी अनुशासनहीनता को बढ़ावा दे रहे हैं।

उपसहार

इस बढ़ती हुई अनुशासनहीनता को रोकना होगा जिसके लिए हमें अनेक उपाय करने होंगे। सबसे पहले तो छात्रों में उत्तरदायित्व की भावना, शिक्षा को रोजगार से जोड़ना तथा नैतिक शिक्षा को बढ़ावा देना होगा। समय-समय पर अनुशासन सम्बन्धी गोष्ठियाँ करनी होंगी। विद्यार्थियों को दी जाने वाली शिक्षा को व्यावहारिक जीवन की आवश्यकताओं से जोड़कर सरस एवं उद्देश्यपूर्ण बनाना होगा।

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( Essay-3 ) Vidyarthi Aur Anushasan Par Nibandh ( 500 words )

विद्यार्थी और अनुशासन पर निबंध 500 शब्दों में

आधुनिक युग में विद्यार्थी वर्ग का सम्बन्ध अनुशासनहीनता अनु से बहुत अधिक जुड़ गया है। समाचार पत्र प्रतिदिन कालेज और विश्व विद्यालयों की हड़ताल या तोड़-फोड़ के समाचार देते हैं। समाज के प्रत्येक अनुशासन हीन कार्य के साथ विद्याथियों का संबन्ध स्थापित कर दिया जाता है । विद्यार्थियों को प्रायः अनु- शासनहीन कहा जाता है।

नियमबद्ध होकर और नियन्त्रण में रहकर कार्य करना अनु- शासन कहलाता है। मनुष्य जीवन में अनुशासन आवश्यक हैं। अनुशासनहीन व्यक्ति जीवन में कभी सफल नहीं हो सकता। जिस देश में अनुशासन की भावना नहीं होती, वह देश कभी स्वतन्त्र नहीं रह सकता। एक छोटी और अनुशासित सेना एक बड़ी और अनुशासनहीन सेना को सरलता से हरा देती है।

प्रकृति में प्रत्येक कार्य नियमानुसार ही होता है, सूर्य का उदय और अस्त होना, दिन और रात्रि का होना, मौसम का परिवर्तन, वायु, वर्षा आदि सभी नियमों के अनुसार ही चलते हैं। जब कभी प्रकृति इस अनुशासन को तोड़ने का प्रयास करती हैं तो सारा संसार कष्ट प्राप्त करता है। जब प्रकृति अनुशासन में रहकर कार्य करती है तो फिर मनुष्य क्यों न करें ?

इतिहास साक्षी है कि बाबर की छोटी सी, परन्तु अनुशासित फौज ने लाखों की संख्या वाली इब्राहीम लोदी की फौज को हराकर दिल्ली का सिहासन प्राप्त कर लिया । विश्वयुद्धों में परा- जित होकर भी जापान और जर्मनी के अनुशासित लोगों ने अपने देशों को शक्तिशाली बनाया । अनुशासन में वह शक्ति है जो अनेक हाइड्रोजन बम, फँटम विमान और मिग विमानों में भी नहीं है। विद्यार्थी अनुशासन की शिक्षा प्राप्त करता है । अनुशासन से उसका परिचय प्राथमिक पाठशाला में होता है और उसका प्रभाव जीवन भर बना रहता है । धैर्य सहनशीलता और नम्रता की शिक्षा प्राप्त करने के लिए विद्यार्थी गुरु के पास जाता है।

विद्यार्थी वर्ग आज अनुशासन हीन कहलाता है और इस सम्बन्ध में अनेक बातें कही जाती हैं। वास्तव में अनुशासन हीनता का कोई एक विशेष कारण नहीं है, बल्कि इसके व्यक्तिगत, राज- नैतिक, सामाजिक आर्थिक और परिवारिक आदि अनेक कारण हैं। विद्यार्थी पढ़ाई में कमजोर होने पर विद्यालय से बाहर अपना समय व्यतीत करता है, जहाँ वह समाज विरोधी तत्त्वों का शिकार बन जाता है। परिवार का वातावरण धन की कमी, माता-पिता का चरित्र और राजनैतिक दलों के प्रलोभन छात्रों को गलत मार्ग की ओर मोड़ देते हैं।

विद्यार्थी वर्ग में अनुशासन हीनता के लिए वत्र्त्तमानशिक्षा-पद्धति भी उत्तरदायी है । नैतिक शिक्षा और चरित्र-निर्माण को इस पद्धति में कोई स्थान प्राप्त नहीं है । बेरोजगारी, भविष्य के प्रति अनिश्चितता और भ्रष्टाचार भी छात्रों में अनुशासन हीनता के लिए उत्तरदायी है। अनुशासन हीनता को समाप्त करने के लिए विद्याथियों में उत्तरदायित्व की भावना, शारीरिक परिश्रम करने की प्रेरणा और शिक्षा को रोजगार के साथ जोड़ने की आवश्यकता है। राजनेताओं का चरित्र भी आदर्श होना चाहिए तथा राज-नैतिक दलों को भी चाहिए कि वे विद्यार्थियों को गलत दिशा की और न ले जायें ।

 

( Essay-4 ) Long Essay on Student and Discipline in Hindi with points ( 1000 to 1200 words )

प्रस्तावना :

प्राणी मात्र के जीवन में अनुशासन बहुत महत्त्वपूर्ण है। अनुशासन जीवन जीने की एक कला है। अनुशासन शब्द एक ऐसा सामान्य शब्द है, जिसकी उपयोगिता और प्रयोग सर्वत्र होता है। संसार में होने वाले सभी कर्म, चाहे वे बुरे हों या अच्छे, सबमें अनुशासन अर्थात् आत्मनियंत्रण की आवश्यकता होती है। बिना अनुशासन के मनुष्य पशुवत हो जाता है और एक अनुशासित पशु मानवीय गुणों का अनुसरण करने में अग्रसर हो उठता है। अनुशासन का अर्थ है, अपने मन, वचन, कर्म पर नियंत्रण। और जिन लोगों का इन पर नियंत्रण नहीं होता वही पशु के समान उन्मुक्त होकर लक्ष्य हीन हो जाते हैं और संसार के ऊपर भार स्वरूप हो जाते हैं।

अनुशासन का अभिप्राय :

अनुशासन का अभिप्राय है- नियमों सिद्धान्तों तथा आदेशों का पालन करना। आदर्श जीवन जीने के लिए अनुशासन में रहना आवश्यक है। अनुशासन का अर्थ है-स्वयं को वश में रखना। अनुशासन के बिना व्यक्ति पशु के समान है। अनुशासन की प्रथम पाठशाला व्यक्ति का घर होता है जहाँ वह जन्म लेता है। और उस पाठशाला का प्रथम गुरु होता है नवजात शिशु का माता-पिता । नवजात के माता-पिता उसे बैठने, चलने, बोलने की शिक्षा देते हैं अनुशासन पूर्वक जिससे वह बिना कोई नुकसान उठाए आसानी से चलना, बोलना, उठाना-बैठना सीख लेता है। पाँच साल तक उसे माता-पिता, परिवार के अन्य लोग-भाई-बहिन, चाचा-ताऊ सभी अपने-अपने व्यवहार के अनुसार अनुशासित रहने का पाठ पढ़ाते हैं। इसके बाद बच्चा विद्यालय में प्रविष्ट होता है। वहाँ उसे अध्यापक का सान्निध्य मिलता है। अध्यापक उसको अनुशासन का पाठ पढ़ाता है जीवन में गति के पथ पर आगे बढ़ने के लिए, समाज में जीने के लिए।

विद्यार्थी का जीवन अनुशासित जीवन कहलाता है। इसे विद्यालयों के नियमों पर चलना होता है। शिक्षक का आदेश मानना पड़ता है। ऐसा करने पर वह बाद में योग्य, चरित्रवान व आदर्श नागरिक कहलाता है। विद्यार्थी जीवन में बच्चे में शारीरिक व मानसिक गुणों का विकास सम्भव होता है। अपना भविष्य सुखमय बनाने के लिए अनुशासन में रहना जरूरी है। यदि हम नुशासनहीनता, बिना नियम तथा उचित विचार किए किसी कार्य को करते हैं तो हमें उस कार्य में गलती होने का डर लगा रहता है। इससे जहाँ व्यवस्था भंग होती है, वहीं कार्य भी बिगड़ जाता है। परेशानी बढ़ने के साथ-साथ उन्नति का मार्ग भी बन्द हो जाता है। इसलिए सफलता प्राप्त करने के लिए अनुशासन में रहना आवश्यक है।

यदि हम अपने वातावरण को देखें तो पता चलता है कि प्रकृति तथा प्राकृतिक वस्तुएँ भी अनुशासन में हैं। पृथ्वी सूर्य के चारों ओर चक्कर लगा रही है। सूर्य पूरब दिशा से निकल रहा है। चन्द्रमा तथा असंख्य तारे और अन्य ग्रह नक्षत्र अपने-अपने मार्ग में यात्रा कर रहे हैं। यदि ये अनुशासन तोड़ अपने मार्गों में परिवर्तन कर लें तो संसार की क्या व्यवस्था होगी।

अनुशासन का महत्त्व :

प्रारम्भ से ही यदि हमारा जीवन अनुशासित होगा तो हम जीवन में आने वाली समस्याओं का समाधान भविष्य में आसानी से कर सकते हैं। यदि हम अपने जीवन की अनेक समस्याओं की गहराई में जाकर देखें तो उसमें से कुछ ऐसी बातें मिलती हैं जो समस्याओं को जन्म देती हैं। जिनमें आर्थिक और राजनीतिक महत्त्व के साथ ही साथ देश की राष्ट्र-भाषा, धर्म, संस्कृति और खानपान के आधार पर ही लोगों में अनुशासन तोड़ने अथवा समस्याएँ खड़ी करने के लिए प्रेरित होने के प्रसंग मिलते हैं। देश में व्याप्त इन समस्याओं के निराकरण के लिए देश के प्रत्येक नागरिक को अनुशासनप्रिय होना चाहिए । अनुशासनप्रिय होने के लिए हमें स्वप्रेरणा के आधार पर कार्य करना होगा। वैलेंटाइन के अनुसार-अनुशासन बालक की चेतना का परिष्करण है। बालक की उत्तम प्रवृत्तियों और इच्छाओं को सुसंस्कृत करके हम अनुशासन के उद्देश्य को पूरा कर सकते हैं।

विद्यार्थी जीवन में अनुशासन :

विद्यार्थी जीवन में अनुशासन में रहना विद्यार्थी को माता-पिता सिखाते हैं वे अनुशासन के पाठ से उसे परिचय कराते हैं। शिक्षक, अभिभावक आदि सभी चाहते हैं कि उनके बच्चे अनुशासित रहें। विद्या-अध्ययन के दौरान विद्यार्थी सभी प्रकार की जिम्मेदारियों और उत्तरदायित्व से मुक्त होता है। वह पूर्ण रूप से मानसिक रूप से स्वतंत्र रहकर अपनी प्रतिभा का विकास करता है। अपनी बुद्धि, विवेक और प्रतिभा का विकास अनुशासन द्वारा ही कर सकता है। विद्यालय में प्रवेश करते समय विद्यार्थी को अनुशासन में रहना होता है। कई वर्ष तक विद्यालय में रहने पर अनुशासन उसकी दैनिक दिनचर्या में शामिल हो जाता है। अनुशासन से ही विद्यार्थी में आत्म-विश्वास और आत्म-निर्भरता की वृद्धि होती है।

जीवन में अनुशासन की आवश्यकता :

जीवन के हर क्षेत्र में अनुशासन की आवश्यकता होती है। अनुशासित व्यक्ति निरन्तर प्रगति-पथ पर अग्रसर होता जाता है। यह प्रगति चाहे व्यक्तिगत हो या फिर मानसिक, दोनों के लिए अनुशासन जरूरी है। आज के परिवेश में विद्यार्थी अनुशासनहीनता का पर्याय हो गया है। विद्यालय से लेकर घर तक ऐसी कोई जगह नहीं बची है जहाँ विद्यार्थी की उदंडता देखने को न मिलती हो। जब कि यही जीवन ऐसा होता है जहाँ से विद्यार्थी की निजी प्रगति साथ ही देश की, समाज के प्रगति का मार्ग प्रशस्त होता है।

अनुशासनहीनता के कारण ही विवेकहीन विद्यार्थी अपना अमूल्य जीवन बरबाद कर रहा है। आज कोई भी बुरा कार्य ऐसा नहीं बचा है जिसमें विद्यार्थी शामिल न होते हों। दंगा-फसाद, मार-पिटाई, तोड़-फोड़, हिंसा, महिलाओं से अभद्र व्यवहार, परीक्षा में नकल, अध्यापकों से दुर्व्यवहार करना आदि विद्यार्थी के लिए साधारण कार्य हैं। वह कर्तव्यों को तिलांजलि देकर केवल अधिकारों की बात करता है। आकांक्षाओं व अधिकारों की प्राप्ति के लिए विद्यार्थी संघर्ष पर उतर आता है।

अनुशासन में न रहने के कारण :

आज विद्यार्थी के अनुशासित न रहने के अनेक कारण हैं। उसमें सबसे बड़ा कारण है गुरुजनों, श्रेष्ठजनों का विद्यार्थियों के प्रति उपेक्षा का व्यवहार। जब विद्यार्थियों को उपयुक्त स्नेह, आदर, प्रशंसा नहीं मिल पाता तो वह विद्रोह पर उतर आता है। यही विद्रोह बाद में छात्र आन्दोलन का रूप ले लेता है। विद्यार्थी को अनुशासन में बनाये रखने के लिए माता-पिता का उचित संरक्षण व मार्गदर्शन जरूरी है। लेकिन कुछ अभिभावक इस ओर ध्यान नहीं देते। इस कारण उनके बच्चे अनुशासनहीन तो होते ही हैं साथ ही उनमें मर्यादा व अच्छे संस्कार भी नहीं पाये जाते। इसलिए आवश्यक है कि अभिभावक अपने बच्चों को अपने संरक्षण में रख उन्हें अच्छे संस्कार दें।

आज के शिक्षक भी इसके लिए कम दोषी नहीं हैं। एक गुरु में जो गुण होने चाहिए उन गुणों में से कुछ को आज के शिक्षक तिलांजलि दे चुके हैं। उनका मूल भाव बच्चों को अच्छी शिक्षा न देना होकर सिर्फ नौकरी करना ही रह गया है। वे सिर्फ गृहकार्य देकर व कक्षा-कार्य कराकर अपने कर्तव्यों की इतिश्री समझ लेते हैं। आज से कुछ वर्षों पूर्व तक शिक्षक गृहकार्य व कक्षाकार्य कराने के साथ-साथ विद्यार्थियों को कहानी, घटना आदि सुनाकर उन्हें नैतिकता का भी पाठ पढ़ाते थे।

उपसंहार :

विद्यार्थी में जिस गति से अनुशासनहीनता बढ़ रही है यदि उसे समय रहते नियंत्रित नहीं किया गया तो इसके बुरे परिणाम सामने आयेंगे। आज का विद्यार्थी कल का देश का भविष्य होता है। यदि अनुशासनहीनता विद्यार्थियों में बढ़ती जायेगी तो आने वाला हमारा समाज कैसा होगा, इसका सहज अनुमान लगाया जा सकता है। सत्यता, सच्चरित्रता तथा अनुशासन की परम्परा टूटने पर कोई भी व्यक्ति, परिवार, समाज और देश को नष्ट होने से नहीं बचा सकता।

 

इस लेख के माध्यम से हमने Vidyarthi Aur Anushasan Par Nibandh | Essay on Student and Discipline in Hindi का वर्णन किया है और आप यह निबंध नीचे दिए गए विषयों पर भी इस्तेमाल कर सकते है।

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