Essay on Dr BR Ambedkar in Hindi- डॉ भीमराव अंबेडकर पर निबंध

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दोस्तों आज हमने Bhim Rao Ambedkar Essay in Hindi लिखा है डॉ भीमराव अंबेडकर पर निबंध हिंदी में कक्षा 1, 2, 3, 4, 5, 6, 7, 8, 9 ,10, और 11, 12 के विद्यार्थियों के लिए है। Dr BR Ambedkar information in Hindi essay & Speech. Dr Bhimrao Ambedkar Biography in Hindi

Essay on Dr BR Ambedkar in Hindi- डॉ भीमराव अंबेडकर पर निबंध

 

Short Essay on DR Bhim Rao Ambedkar in Hindi ( 200 to 250  words )

डॉ भीमराव अम्बेडकर डा० अम्बेडकर का जन्म 14 अप्रैल सन् 1891 को मध्य प्रदेश की जहू छावनी में हुआ। उनके पिता श्री रामजी सेना में सूबेदार थे और माता भीमाबाई एक मेजर की लड़की थी। वे मूल रूप से महाराष्ट्र में रत्नगिरि जनपद के अम्बाड़े ग्राम के दलित महार जाति से संबंधित थे। उनका बचपन का नाम सुकपाल था। बाद में वे भीमराव अम्बेडकर के नाम से प्रसिद्ध हो गये। उन्होंने बड़े संघर्षो में प्रारम्भिक शिक्षा प्राप्त की। लेकिन भयंकर परिस्थितियों का सामना करते हुए उन्होंने बम्बई से बी० ए० पास किया। उसके बाद बड़ौदा नरेश ने उन्हें छात्रवृत्ति देकर अमेरिका भेज दिया। यहां से उन्होंने कई विषयों में एम. ए. व पी. एच. डी की उपाधियां प्राप्त की ।

डॉ अम्बेडकर स्वदेश लौटकर कई उच्च पदों पर कार्यरत रहे परन्तु हर जगह उन्हें संघर्षो का सामना करना पड़ता था। अब उन्होंने किसी भी पद पर कार्य न करने का निर्णय कर लिया। वे दलित, अछूत, दीन-हीन गरीबों के उद्धार में जुट गये। उन्होंने कई संगठन बनाए। दलितों को उनका हक दिलाने के लिए वे आजीवन संघर्षो से जूझते रहे।

डॉ अम्बेडकर कानून के ऐसे महान ज्ञाता थे कि उनके समान संविधान का निर्माता उस समय जगत में उपलब्ध नहीं था। उन्होंने भारत का महान संविधान अपने हाथों से बनाया। वे भारत के प्रथम कानून मंत्री थे। बाद में उन्होंने बौद्ध धर्म ग्रहण कर लिया था। 6 दिसम्बर 1956 ई० को डा० अम्बेडकर का निधन हो गया।

10 lines on B.R Ambedkar in Hindi

 

Essay on Bhimrao Ambedkar in Hindi ( 500 words ) 

जीवन परिचय

भारत-रत्न डॉ. भीमराव अम्बेडकर हरिजन व दलित समाज के मसीहा तथा भारत के आधुनिक मनु माने जाते हैं। उनका जन्म 14 अप्रैल सन् 1891 को मध्य प्रदेश में इन्दौर के पास महु नामक ग्राम में एक हरिजन परिवार में हुआ था। डॉ. भीमराव अम्बेडकर का मूल नाम सकपाल था। उनके एक अध्यापक ने उन्हें ‘अम्बेडकर’ नाम दिया था। आपके पिता राम जी मौला जी एक सैनिक स्कूल में प्रधानाध्यापक थे। उनके पिता की प्रबल इच्छा थी कि उनका पुत्र शिक्षित होकर समाज में फैली हुई छुआछूत, जात-पांत और संकीर्णता को दूर कर सके। सोलह वर्ष की अल्पायु में मैट्रिक परीक्षा पास करते ही उनका विवाह रामाबाई नामक किशोरी से कर दिया गया था।

शिक्षा

आप बचपन से ही कुशाग्र बुद्धि के बालक थे। वे विद्याध्ययन में बहुत रुचि रखते थे। पिता की नौकरी छूट जाने पर उनके सामने आर्थिक संकट आए परन्तु उन्होंने साहस नहीं छोड़ा और बड़ी लगन से अपनी पढ़ाई जारी रखी। उन्होंने 1912 ई. में बी.ए. की परीक्षा उत्तीर्ण की तथा सन् 1913 ई. में बड़ौदा के महाराजा से छात्रवृत्ति पाकर वे उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए लिए अमेरिका चले गए। भीमराव ने सन् 1913 से 1917 तक अमेरिका व इंग्लैण्ड में उच्च शिक्षा प्राप्त की और वहाँ से अर्थशास्त्र, राजनीतिशास्त्र तथा कानून में एम.ए. तथा पी.एच.डी. तथा एल.एल.बी. की डिग्री लेकर वापस भारत आ गए।

आजीविका

विदेश से भारत वापस आने पर महाराजा बड़ौदा ने उन्हें सैनिक-सचिव के पद पर नियुक्त कर दिया। परन्तु उन्हें हर कदम पर जातिगत भेदभाव का शिकार होना पड़ा। जब उनसे वह अपमान सहन न हो सका तो उन्होंने वह पद छोड़ दिया और मुम्बई जाकर अध्यापन-कार्य करने लगे। किन्तु वहाँ भी छूतछात के अभिशाप से बच न सके और वह कार्य भी छोड़ना पड़ा। अन्त में उन्हें वकालत का पेशा ही अपनाना पड़ा। इसी बीच उन्होंने छूतछात के विरुद्ध लड़ने का बीड़ा उठाया और तभी से इस कार्य में जुट गए। तभी भीमराव अम्बेडकर गांधी जी के सम्पर्क में आए और उनसे बहुत प्रभावित हुए। तभी उन्होंने एक ‘मूक’ शीर्षक पत्रिका का प्रकाशन प्रारम्भ किया। इस पत्रिका में उन्होंने दलितों की दशा तथा उनके उद्धार के विषय में अनेक लेख लिखे, जिनका भारतीय दलित वर्गों तथा अन्य शिक्षित समाज पर बहुत गहरा प्रभाव पड़ा।

राजनीति में प्रवेश

सन् 1947 में भारत के स्वतंत्र होने पर पहले वे पं. जवाहरलाल नेहरू जी के मंत्रिमंडल में कानून मंत्री बने। इसी वर्ष भारत के अपने संविधान निर्माण के लिए जो समिति बनाई गई थी, डॉ. अम्बेडकर की विद्वता तथा कानून की विशेष योग्यता को ध्यान में रखते हुए, उन्हें उसका अध्यक्ष चुना गया। इनके अथक प्रयासों से ही भारतीय संविधान में जाति, धर्म, भाषा और लिंग के आधार पर सभी तरह के भेदभाव समाप्त कर दिए गए।

उपसंहार

अन्त में डॉ. अम्बेडकर का मन अपने मूल धर्म से विचलित हो गया और उन्होंने बौद्ध धर्म की दीक्षा ले ली। उनका निधन 6 दिसम्बर, 1956 ई. को नई दिल्ली में हुआ। उनकी सेवाओं को देखते हुए भारत सरकार ने उन्हें मरणोपरान्त ‘भारत-रत्न’ की उपाधि से सम्मानित किया।

 

Dr BR Ambedkar Essay in Hindi डॉ भीमराव अंबेडकर पर निबंध 1000 शब्दों में

प्रस्तावना :

भारतवर्ष का यह इतिहास रहा है कि यहाँ जब-जब आतंक, उत्पीड़न, भ्रष्टाचार का बोलबाला हुआ, कोई-न-कोई महाविभूति जन्म लेकर उसके विरुद्ध संघर्ष किया। डॉ. अम्बेदकर भी उन्हीं में से एक महाविभूति थे। एक तो भारत अंग्रेजों की दासता में पिस रहा था, उसमें भी देश की त्रासदी यह थी-जातीय भेद-भाव, ऊँच-नीच और अश्पृश्यता । दलित और दलनकर्ता-शोषक, शोषित के बीच समाज बँटा था। अम्बेदकर एक दलित के घर जन्म लेकर स्वयं उस अपमान और तिरस्कार को सहा था। उनके हृदय में इस कुरीति के उन्मूलन का जज्बा उत्पन्न हो चुका था। इसके लिए उन्होंने अधिक परिश्रम कर देश और विदेश में उच्च शिक्षा प्राप्त की और शिक्षा की शिष्टता के द्वारा इस कुरीति के विरुद्ध बिगुल बजाया ।

जीवन परिचय एवं शिक्षा :

प्रसिद्ध समाज सुधारक, राजनीतिज्ञ, विधिवेत्ता और दलितों के मसीहा डॉ. भीमराव अम्बेदकर का जन्म 14 अप्रैल, सन् 1891 को महाराष्ट्र के एक महार परिवार में हुआ। इनका बचपन ऐसी सामाजिक, आर्थिक दशाओं में बीता जहाँ दलितों को निम्न स्थान प्राप्त था। दलितों के बच्चे पाठशाला में बैठने के लिए स्वयं ही टाट-पट्टी लेकर जाते थे। वे अन्य उच्च जाति के बच्चों के साथ नहीं बैठ सकते थे। डॉ. अम्बेदकर के मन पर छुआछूत का व्यापक असर पड़ा जो बाद में विस्फोटक रूप में सामने आया। इस अपमान की जिन्दगी में बड़ौदा के महाराजा गायकवाड़ ने इनकी मदद की। महाराजा गायकवाड़ ने उनकी प्रतिभा को परखते हुए उन्हें छात्रवृत्ति उपलब्ध कराई। इस कारण वे स्कूली शिक्षा समाप्त कर मुंबई के एल्फिस्टन कॉलेज में आ गये।

शिक्षा में बड़ौदा नरेश गायकवाड़ का सहयोग :

इसके बाद सन् 1913 में डॉ. अम्बेदकर उन्हीं की मदद से अमेरिका के कोलम्बिया विश्वविद्यालय से अर्थशास्त्र में एम.ए. की डिग्री हासिल की। सन् 1916 में उन्होंने इसी विश्वविद्यालय से “ब्रिटिश इंडिया के प्रान्तों में वित्तीय स्थिति का विश्लेषण” नामक विषय पर पी-एच.डी. की उपाधि प्राप्त की। सन् 1922 में लंदन विश्वविद्यालय से डॉ. अम्बेदकर ने “रुपये की समस्या” शोध विषय पर पी-एच.डी. की दूसरी डिग्री प्राप्त की। उन दिनों भारतीय वस्त्र उद्योग व निर्यात ब्रिटिश नीतियों के कारण गहरे आर्थिक संकट से जूझ रहा था, इस अवसर पर उनका शोध सामयिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण था।

भारतीय और विदेशी सामाजिक व्यवस्था का अध्ययन :

डॉ. अम्बेदकर ने भारतीय और विदेश में रहकर विदेशी सामाजिक व्यवस्थाओं को बहुत नजदीक से देखा और उन पर मनन-चिन्तन किया। उन्होंने अनुभव किया कि भारत में तत्कालीन सामाजिक व्यवस्था छूत-अछूत जाति के सिद्धान्त पर आधारित थी, किन्तु वहीं विदेशों में इस व्यवस्था का नितान्त अभाव था। उन्हें भारत के समान सामाजिक व्यवस्था कहीं नहीं दिखाई दी। कुशाग्र बुद्धि होने के कारण उन्होंने देश व विदेश की सामाजिक व्यवस्था का अपने ढंग से न केवल मूल्यांकन किया बल्कि उन विसंगतियों को भी समझा जो भारतीय समाज में छुआछूत के आधार पर परिलक्षित होती रही थी। उन्हें लंदन के स्कूल ऑफ इकोनामिक्स एवं पोलिटिकल साइंस में प्रवेश भी मिला लेकिन गायकवाड़ शासन के अनुबंध के कारण उन्हें पढ़ाई छोड़कर वापस भारत आना पड़ा और बड़ौदा राज्य में मिलिट्री सचिव के पद पर कार्य करना पड़ा।

प्रजातन्त्रीय शासनप्रणाली के प्रबल समर्थक :

सन् 1926 में डॉ. अम्बेदकर ने हिल्टन यंग आयोग के समक्ष पेश होकर विनिमय दर व्यवस्था पर जो तर्कपूर्ण प्रस्तुति की थी, उसे आज भी मिसाल के रूप में पेश किया जाता है। डॉ. अम्बेदकर को गांधीवादी, आर्थिक व सामाजिक नीतियाँ पसन्द नहीं थीं। प्रजातान्त्रिक संसदीय प्रणाली के प्रबल समर्थक थे और उनका विश्वास था कि भारत में इसी शासन-व्यवस्था से समस्याओं का निदान हो सकता है। इसकी वजह गांधी जी का बड़े उद्योगों का पक्षधर नहीं होना था। डॉ. अम्बेदकर की मान्यता थी कि उद्योगीकरण और शहरीकरण से ही भारतीय समाज में व्याप्त छुआछूत और गहरी सामाजिक असमानता में कमी आ सकती है।

स्वतन्त्र भारत के विधिमन्त्री और संविधान निर्मात्री समिति के अध्यक्ष :

स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद डॉ. अम्बेदकर को 3 अगस्त, सन् 1947 को विधिमंत्री बनाया गया। 21 अगस्त, 1947 को भारत की संविधान निर्मात्री समिति का इन्हें अध्यक्ष नियुक्त किया गया। डॉ. अम्बेदकर की अध्यक्षता में भारत की लोकतांत्रिक, धर्मनिरपेक्ष एवं समाजवादी संविधान की संरचना हुई, जिसमें मानव के मौलिक अधिकारों की पूर्ण सुरक्षा की गयी। 26 जनवरी, 1550 को भारत का संविधान राष्ट्र को समर्पित कर दिया गया। 25 मई, 1950 को डॉ. अम्बेदकर ने कोलम्बो की यात्रा की। इस पद पर रहते हुए डॉ. अम्बेदकर ने हिन्दू कोड बिल लागू कराया । इस बिल का उद्देश्य हिन्दुओं के सामाजिक जीवन में सुधार लाना था। इसके अलावा तलाक की व्यवस्था और स्त्रियों को सम्पत्ति में हिस्सा दिलाना था।

उपसंहार :

डॉ. अम्बेदकर ने आर्थिक विकास व पूँजी अर्जन के लिए भगवान बुद्ध द्वारा प्रतिस्थापित नैतिक और मानवीय मूल्यों पर अधिक जोर दिया था। उनका कहना था कि सोवियत रूस के मॉडल पर सहकारी व सामूहिक कृषि के द्वारा ही दलितों का विकास हो सकता है। तत्कालीन प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू भी इसी व्यवस्था के पक्षधर थे। उन्होंने इसके क्रियान्वयन के लिए डॉ. अम्बेदकर को योजना आयोग का अध्यक्ष पद देने का वायदा किया था। डॉ. अम्बेदकर पंचायती राज व्यवस्था और ग्राम स्तर पर सत्ता के विकेन्द्रीकरण के हक में नहीं थे। उनका कहना था कि ग्रामीण क्षेत्रों के विकेन्द्रीकरण से दलित व गरीबों पर आर्थिक अन्याय व उत्पीड़न और बढ़ेगा। दलितों को आरक्षण देने की मांग के सूत्रधार के रूप में डॉ. अम्बेदकर का योगदान अत्यधिक रहा।

 

इस लेख के माध्यम से हमने Dr BR Ambedkar Par Nibandh | Essay on Dr BR Ambedkar in Hindi का वर्णन किया है और आप यह निबंध नीचे दिए गए विषयों पर भी इस्तेमाल कर सकते है।

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