गौतम बुद्ध पर निबंध- Essay on Gautam Buddha in Hindi

In this article, we are providing an Essay on Gautam Buddha in Hindi गौतम बुद्ध पर निबंध हिंदी में | Essay in 100, 150. 200, 300, 500, 800, 1000 words For Students.

गौतम बुद्ध पर निबंध | Gautam Buddha Essay in Hindi ये हिंदी निबंध class 4,5,7,6,8,9,10,11 and 12 के बच्चे अपनी पढ़ाई के लिए इस्तेमाल कर सकते है।

गौतम बुद्ध पर निबंध- Essay on Gautam Buddha in Hindi

 

( Essay-1 ) 10 Lines Essay on Gautam Buddha in Hindi

1. गौतम बुद्ध का जन्म लुम्बिनी, नेपाल में हुआ था।

2. उनके पिता का नाम शुद्धोधन और माता का नाम माया था।

3. उन्होंने आस्था को प्राथमिकता देने का सिद्धांत प्रदान किया।

4. उनके उपदेशों में दुःख और संख्यावाद के उपाय दिए गए थे।

5. चारित्रिकता, दया, और त्याग के महत्व को उन्होंने बताया।

6. उनका महत्वपूर्ण उपदेश – “बुद्धं शरणं गच्छामि” था, जिसका अर्थ है कि मैं बुद्ध की शरण लेता हूँ।

7. उन्होंने निर्वाण की प्राप्ति के लिए मध्यम मार्ग की महत्वपूर्णता बताई।

8. उनके शिक्षाओं से बौद्ध धर्म की उत्थान और प्रसार हुआ।

9. उनके उपदेशों का पालन करके लोग आत्म-समर्पण की मार्ग पर चलने लगे।

10. गौतम बुद्ध की मृत्यु कपिलवस्तु में उनके आयु 80 वर्ष में हुई।

10 Lines on Gautam Buddha in Hindi

 

( Essay-2 ) Essay on Gautam Buddha in Hindi 200 to 250 words

महात्मा बुद्ध का जन्म ई० पूर्व 623 वर्ष में शाक्य गण राज्य के राजा शुद्धोदन के यहां हुआ। उनकी राजधानी कपिलवस्तु थी बुद्ध का बचपन का नाम सिद्धार्थ था। उनकी माता का नाम माया देवी था। उनके पिता उन्हें सदा खुश रखना चाहते थे। उन्होंने 7 कुमार की सुख सुविधा के लिए सारे साधन जुटा रखे थे। लेकिन उनका मन उखड़ा हुआ-सा रहता था। सिद्धार्थ ने बचपन में शास्त्र व शस्त्र दोनों प्रकार की विद्याएं सीख ली थीं। वे जीवन से उदासीन रहते थे।

एक दिन वे अपने पुत्र व पत्नी को सोया हुआ छोड़कर अर्द्धरात्रि में घर से चले गये और वैराग्य को प्राप्त हो गये। सिद्धार्थ इधर उधर भटकते हुए ज्ञानियों व ऋषियों के आश्रमों में गये लेकिन उन्हें ज्ञान का बोध नहीं हुआ। वे भयानक जंगलों में घूमते रहे और कठोर तप करने लगे। अंत में उन्हें किसी महान योगो से सत्य ज्ञान प्राप्त हुआ। वे गया के निकट वट वृक्ष के नीचे ध्य न मग्न होकर बैठ गये और उनकी समाधि लग गयी। उन्हें सत्य का प्रत्यक्ष बोध हो गया। तब से वे बुद्ध के नाम से संसार में प्रसिद्ध हो गये।

सत्य, अहिंसा, सभी प्राणियों से समान व्यवहार, शुभ कर्म, सब की सेवा, ये पांच बुद्ध जी की प्रमुख शिक्षाएं थीं। कुशीनगर के पास 81 वर्ष की आयु में बुद्ध जी का महा निर्वाण हो गया। उनके बाद उनके द्वारा संस्थापित बौद्ध धर्म संसार का महान धर्म बन गया।

 

( Essay-3 ) Lord Gautam Buddha Essay in Hindi ( 500 words )

भूमिका

भारत में सामाजिक कुरीतियों और धार्मिक पाखण्डों को रोकने के लिए समय-समय पर किसी न किसी महापुरुष ने जन्म लिया है । ठीक उसी समय महात्मा बुद्ध अवतरित हुए । जबकि हिन्दू समाज में धर्म के नाम पर भांतिभांति के अत्याचार हो रहे थे।

सामान्य परिचय

इनका जन्म आज से 2500 वर्ष पूर्व कपिलवस्तु नरेश शुद्धोदन के यहाँ हुआ था । इनका बचपन का नाम सिद्धार्थ और माता का नाम देवी था। जन्म के कुछ दिन बाद ही माता का स्नेहांचल सिर पर से उठ गया । इनका पालन-पोषण विमाता प्रजावती द्वारा हुआ। अल्पावस्था में ही इन्हें देखकर एक ज्योतिषी ने भविष्यवाणी की थी कि युवराज बड़ा होकर चक्रवर्ती राजा होगा या प्रसिद्ध योगीराज । वृद्धावस्था की इकलौती सन्तान के विषय में ऐसा सुनकर महाराज शुद्धोदन चितिन्त हो उठे थे। उन्होंने उसी दिन से सिद्धार्थ के सामने ऐसी कोई वस्तु नहीं जाने दी जिसे देखकर दुःख प्रकट हो और इनकी भावना वैराग्य की ओर बढ़े।

शैशवावस्था

सुख और ऐश्वर्य में पलकर सिद्धार्थ युवा हुए । तभी इनका विवाह यशोधरा नामक रूपवती राजकुमारी के साथ कर दिया गया। कुछ दिनों के लिए सिद्धार्थ पत्नी के मोहपाश में फंस गए । इनके एक पुत्र राहुल उत्पन्न हुआ।

गृहस्थ और वैराग्य

महाराज शुद्धोदन की इच्छा न होते हुए भी युवराज सिद्धार्थ एक दिन नगर भ्रमण के लिए निकल गए । राज पथ पर इन्होंने एक रोगी, एक वृद्ध और एक मृतक को देखा । इन तीनों का इनके मन पर गहरा प्रभाव पड़ा । फलतः इनका मन सांसारिक भावनाओं से उचाट रहने लगा । रूपवती पत्नी का आकर्षण फीका पड़ गया। एक रात्रि को ये पत्नी और पुत्र राहुल को सोता छोड़ कर महल से शांति की खोज में निकल पडें ।

ज्ञान की प्राप्ति

इनका कुछ समय भयानक जंगलों में इधर-उधर घूमते हुए बीता । अन्त में तपस्या में लीन हो गए । किन्तु इससे भी मन को शांति नहीं मिली । देह बहुत ही दुर्बल हो गई। ये शांति की खोज में गया की ओर बढ़े और वहीं एक ‘वट वृक्ष’ के नीचे समाधि लगा कर बैठ गए । सात वर्ष की अवधि घोर तपस्या में बीत गई। एक दिन सहसा इन्हें ‘दिव्य ज्ञान’ की प्राप्ति हुई और तभी से महात्मा बुद्ध कहलाए ।

सिद्धांत

यहाँ से महात्मा बुद्ध ‘सारनाथ’ पहुंचे । वहीं पर इन्होंने प्रथम प्रवचन किया । तत्पश्चात् इन्होंने सारे देश का भ्रमण किया । इनके मुख्य सिद्धांत थे, ‘वासना ही मानव जीवन में दुःख का मूल कारण है, इससे बचना चाहिए । सत्य दृष्टि, सत्य भाव, सत्य विचार और सत्य ध्यान से ही मानव इस लोक तथा परलोक में सुख शांति से रह सकता है।’

उपसंहार

कुछ ही दिनों में इनके सिद्धांत इतने लोकप्रिय हुए कि अनेक राजा-महाराजाओं ने इसी धर्म को स्वीकार किया। अशोक महान ने तो इसे ‘राजधर्म’ तक बना डाला । यह भारत के अतिरिक्त लंका, जावा, सुमात्रा, वर्मा, जापान, चीन और तिब्बत आदि देशों में खूब प्रसारित हुआ ।

बौद्ध धर्म के प्रवर्तक महात्मा बुद्ध का देहावसान 80 वर्ष की अवस्था में कुशीनगर में हुआ।

 

( Essay-4 ) गौतम बुद्ध पर निबंध- Essay on Gautam Buddha in Hindi ( 1000 words )

महान् और विशाल है भारत देश । समय समय पर इसके किसी न किसी भू-भाग पर ऐसी उज्ज्वल विभूतियों का उदय होता रहा, जिनके प्रकाशपुंज से इस देश का कोना-कोना आलोकित हुआ । इस देश में बौद्ध धर्म के प्रवर्तक महात्मा वृद्ध का अवतरण हुआ ।

आज से प्रायः अढ़ाई हजार वर्ष पूर्व उत्तरी बिहार में रोहिणी नदी के पश्चिमी एक छोर पर जनपद था जिसकी कपिलवस्तु नामक सुन्दर नगरी राजधानी थी। यहाँ के राजा शुद्धोधन थे । राजा की दो रानियाँ थीं- मायावती और प्रजावती । कपिलवस्तु से पन्द्रह मील दूर लुम्बिनी वन में मायावती की कोखसे बुद्ध का जन्म हुआ। बुद्ध के जन्म सात दिन बाद ही उसकी माता का देहान्त हो गया। बालक का पालन पोषण छोटी रानी प्रजावती ने किया। बालक का नाम सिद्धार्थ रखा गया। दूसरा नाम गौतम था जो कि गोत्र के कारण था ।

सिद्धार्थ की बाल्यवस्था और किशोरकाल सुख और ऐश्वर्य में व्यतीत हुए। उसको धनुविद्या, घुड़सवारी, मल्लविद्या आदि में प्रवीण बनाया गया, परन्तु गौतम बाल्यकाल से ही कुछ गम्भीर था । बच्चों की सी चंचलता और नटखटपन उसमें न थी । शुद्धोधन उसकी गंभीरता से शंकित थे । अतः गौतम को दुनियां में फंसाने के लिए उन्होंने बहुत प्रयत्न किए। उसके सुख के सभी साधन जुटाए गए, पर राजकुमार का मन सांसारिक सुखों से विरक्त था । कभी-कभी तो उनके मन में संसार के प्रति घृणा की भावना . विशेष रूप से उग्र हो उठती थी ।

यह देखकर राजा शुद्धोधन ने सुप्रबुद्ध महान् की परम सुन्दरी पुत्री राजकुमारी यशोधरा से राजकुमार का विवाह कर दिया। विवाह के उपरान्त कुछ दिनों तक गौतम सांसारिक भोग-विलास की ओर उन्मुख होने लगा । किन्तु एक दिन अकस्मात् ही ऐसी घटना घटी कि वह सुख-स्वप्न टूट गया, उसके अन्तर की करुणा फिर जाग उठी । अपने उद्यान में बैठा सिद्धार्थ आनन्द मना रहा था कि अकस्मात् एक घायल हंस उसकी गोद में आ गिरा। हंस को तीर लगा था। वह असह्य वेदना से तड़प रहा था । गौतम के हृदय से की दया फूट पड़ी।

इस घटना के पश्चात् गौतम फिर उदास रहने लगा। उसके वैराग्य को दूर करने के लिए उसके पिता ने भरसक प्रयत्न किया। उसके सुख-विला और आमोद-प्रमोद के लिए सब कुछ किया गया, परन्तु सिद्धार्थ को रंग-रंग से उत्तरोतर घृणा होने

एक दिन राजकुमार ने अपने पिता से नगर देखने की आज्ञा मांगी राजा ने स्वीकृति दे दी और नगर भर में यह आदेश भी हो गया कि नगर का सारा दृश्य स्वर्ग के समान आकर्षक बना दिया जाए। रोग-शोक जरामरण कुछ दी उसके मार्ग में दिखाई न पड़े । युवराज रथ पर निकले । सारी प्रजा प्रसन्न दिखाई भी, परन्तु एक चौराहे पर अचानक एक बूढ़ा आदमी रथ के आगे आ निकला । युवराज ने वृद्ध की ओर देखकर अपने सारथी से पूछा कि यह कौन है, यह इतना दुर्बल क्यों है ? सारथी ने दबी आवाज से उत्तर दिया कि वह जरा पीड़ित है । प्रत्येक मनुष्य ने बूढ़ा होना है ।

मृत्यु का सा साम्राज्य छा गया। चारों और सन्नाटा था ! राजकुमार रथ लौटा कर घर वापस आ गया ।

इसके पश्चात् युवराज ने कई बार नगर का भ्रमण किया । एक बार उसने एक रोगी को रोग से छटपटाते देखा दूसरी बार एक मुर्दों की अर्थी देखी जिसे जलाने के लिए उसके प्रियजन रोते-चिल्लाते जा रहे थे । रोग, जरा और मरण के इन शोकपूर्ण दृश्यों का गौतम के हृदय पर गहरा प्रभाव हुआ। तीसरी बार उसने एक सन्यासी को को देखा, जिसके मुख पर शान्ति की आभा थी । उससे बात करने पर सिद्धार्थ विशेष रूप से प्रभावित हुआ और उसने अपना मार्ग निश्चित कर लिया ।

गौतम के मन में अब यही विचार घूमने लगे कि आखिर इन दुःखों का कारण क्या है ? जरा और मृत्यु क्या है ? ये क्यों आती है ? उसने पण्डितों, विद्वानों और ऋषियों से बार- बार पूछा । किसी ने कुछ बताया और किसी ने कुछ । परन्तु उसे सन्तोष- जनक उत्तर न मिला। उसने संकल्प कर लिया कि मैं जरा, मरंण, रोग, शोक आदि का कारण खोजकर ही चैन लूँगा । उसने गृह-त्याग का संकल्प कर लिया ।

इसी बीच यशोधरा ने एक पुत्र को जन्म ब्रिया । बच्चे का नाम राहुल रखा गया ।

गृह-त्याग के संकल्प और यशोधरा तथा राहुल के आकर्षण एवं ममता के बीच संघर्ष चला । एक रात गौतम ने यशोधरा और राहुल को मीठी नींद सुलाकर अपने आस-पास की सभी वस्तुओं, सभी विभूतियों, माता-पिता, प्रिया, पुत्र आदि सबको मन ही मन प्रणाम किया । यशोधरा मधुर स्वपनों में खोई हुई थी और शिशु उसकी छाती से चिपक कर सो रहा था । गौतम उसे एकटक देखता रहा । ममता के सभी धागों को एकदम तोड़कर गौतम अपने अश्व पर जा चढ़ा । घने जंगलों में पहुंचकर उसने अपने कीमती वस्त्र उतार फेंके और रेशमी बाल काट दिए । अश्व को उसके रक्षक को सौंप कर वह अपने पथ का पथिक बना ।

गौतस राजगृह के समीप विन्ध्याचल की तलहटी में पहुचा । वहां वह अलाराकलम नामक एक तपस्वी का शिष्य बन गया । कई साल तक उसने वहाँ अध्यात्मिक जीवन बिताया, ज्ञान की ज्योति को खोजा परन्तु उसकी आत्मा को शान्ति नहीं मिली ।वह यहाँ से दूसरे गुरु उद्यक के पास चला गया, परन्तु वहां भी असन्तुष्ट रहा। तब गौतम ने छः वर्षों तक उरुवेला के जंगलों में घोर तपस्या की, परन्तु परिणाम वही रहा । उसने खाना-पीना छोड़ दिया और अपने रक्त का कण-कण सुखा दिया, परन्तु मन फिर भी अशांत रहा ।

तपस्या के मार्ग से निराश होकर सिद्धार्थ वर्तमान बोधगया के समीप पहुंचा । बहां एक विशाल पीपल का वृक्ष था । वह थक कर उसकी छाया में बैठ गया । यहीं उसे ज्ञान प्राप्त हुआ । उसने जान लिया कि आवा गमन ही दुःखों का कारण है । जब झूठी इच्छाएं नष्ट हो जाती हैं, तभी भ्रम और अज्ञान का अन्धकार दूर होता है और उसके स्थान पर ज्ञान, शान्ति और वास्तविक सुख को सूर्य उदित होता है ।

इस प्रकार दुनिया के सत्य को पहचानकर गौतम बुद्ध हो गए। उन्हें पूर्ण ज्ञान की प्राप्ति हुई । भ्रम, आकर्षण, मोह, माया अब उनके लिए समाप्त हो गए। उनके अहम् का नाश हो गया ।

अपना सन्देश लोगों को सुनाने के लिए बुद्ध गया से काशी के समीप सारनाथ पहुंचे । यहां उन्होंने पांच साधुओं को ज्ञान का उपदेश दिया। सारनाथ से बुद्ध उरुवेला गए । यहां अनेक ब्राह्मण उनके अनुयायी बन गए। उरुवेला से वे अपने शिष्यों के साथ राजगृह आए । मगध के बहुत से लोग भिक्षु बन गए । मगध से बाहर भी वे काशी, कौशल और बज्जि जनपदों में गए । भगवान् बुद्ध कपिलवस्तु भी गए। अपनी माता, भाई-बन्धू, पत्नी तथा पुत्र को भी दीक्षा दी ।

महात्मा बुद्ध करुणा के अवतार थे । प्रेम, सहानुभूति और दया की साक्ष मूर्ति थे । मानवता का इतना सच्चा हितैषी आज तक उत्पन्न ही नहीं हुआ । उन्होंने चालीस वर्ष के लगभग अपना अमर सन्देश घर-घर पहुंचाया। ब अस्सी वर्ष के थे तो कुशीनगर की यात्रा में बीमार पड़ गए । यहीं पर कुछ दिनों के बाद उनका जीवन दीप निर्वाण को प्राप्त हुआ। वे मर कर भी अमर हो गए।

 

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