वाच्य और वाच्य के भेद- Vachya in Hindi | Vachya ke bhed

In this article, we are providing information about Vachya in Hindi – Vachya ke bhed | Vachya in Hindi Grammar Language. वाच्य परिवर्तन ( Vachya Parivartan ) | वाच्य और वाच्य के भेद

वाच्य और वाच्य के भेद- Vachya in Hindi | Vachya ke bhed

Meaning of Vachya in Hindi वाच्य, क्रिया के उस रूपान्तरण को कहते हैं जिससे यह ज्ञात होता है कि वाक्य में क्रिया वंध (अव्यय) कर्ता के साथ है अथवा कर्म के साथ अथवा इन दोनों में से किसी के भी साथ न होकर केवल उसके (क्रिया के) कार्य व्यापार की प्रधानता है।

जैसे- राम पत्र लिखता है।

पत्र राम द्वारा लिखा जाता है।

तुमसे लिखा नहीं जाता।

प्रथम वाक्य में लिखना क्रिया का संबंध कर्ता राम से है। दूसरे वाक्य में कर्म प्रधान है। जिसमें पत्र (कर्म) उद्देश्य के स्थान पर आया है और इसी की प्रधानता है। ‘तुमसे लिखा नहीं ता’ वाक्य में क्रिया का संबंध न तो कर्ता से है और न ही कर्म से, इसका सम्बन्ध भाव से है।

Vachya ke bhed वाच्य के तीन भेद हैं :

(1) कर्तृवाच्य

(2) कर्मवाच्य

(3) भाववाच्य

(1) कर्तृवाच्य :- क्रिया के जिस रूप से यह प्रकट हो कि वाक्य में क्रिया का उद्देश्य कर्ता है उसे कर्तृवाच्य कहते हैं। दूसरे शब्दों में क्रिया के जिस रूप से यह ज्ञात हो कि वाच्य में क्रिया का उद्देश्य कर्ता है, उसे कर्तृवाच्य कहते हैं।

जैसे- शीला पत्र लिखना चाहती है।

इस वाक्य में लिखने की चाह शीला करती है इसलिए शीला क्रिया का उद्देश्य है।

(2) कर्मवाच्य :- क्रिया के उस रूपान्तर को कर्मवाच्य कहते हैं जिससे यह ज्ञात हो कि वाक्य में कर्ता की प्रमुखता न होकर कर्म की प्रमुखता है। जिस कार्य की गति में कर्म की प्रधानता हो एवं क्रिया के लिंग, वचन कर्म के अनुसार हो उसे कर्मवाच्य कहते हैं।

जैसे- कविता मुझसे पढ़ी जाती है।

पत्र तुमसे पढ़ा जाता है। यहाँ ‘पढ़ी जाती है’ – कविता

‘पढ़ा जाता है’ – पत्र

इसमें कविता और पत्र दोनों कर्म हैं। क्रिया का प्रयोग कर्म के अनुसार हुआ है। क्रिया का संबंध कर्म से ही है।

(3) भाववाच्य :- क्रिया के जिस रूप से यह प्रकट हो कि वाक्य में क्रिया का उद्देश्य न तो कती है, न कर्म, बल्कि वह सदा स्वतंत्र रहकर अपनी ही प्रधानता से युक्त है, उसे भाववाच्य कहते हैं। भाववाच्य केवल सकर्मक क्रियाओं में ही होता है। कर्ता या कर्म के बदलने पर भी क्रिया पर प्रभाव नहीं पड़ता है। इसकी क्रिया पुल्लिंग होती है।

जैसे- “अंधेरे में लिखा नहीं जाता।’

यहाँ न तो कर्ता की प्रधानता है न कर्म की बल्कि क्रिया के व्यापार की प्रधानता है। कभी-कभी सकर्मक क्रिया भी भाववाच्य में प्रयुक्त होती है।

वाच्य के प्रयोग

वाच्य में आगत क्रिया के लिंग, वचन तथा पुरुष के अध्ययन को प्रयोग कहते हैं। हिन्दी में निम्नलिखित तीन प्रयोग होते हैं :

(क) कर्तरि प्रयोग

(ख) कर्मणि प्रयोग

(ग) भाव प्रयोग 

(क) कर्तरि प्रयोग :- कर्तरि प्रयोग में वाक्य की क्रिया के लिंग, वचन और पुरुष कर्ता के लिंग, वचन और पुरुष के अनुरूप होते हैं।

जैसे- कमला घर जाती है। मोहन पुस्तक पढ़ता है।

इन दोनों वाक्यों में क्रिया के लिंग, वचन और पुरुष कर्ता के लिंग, वचन और पुरुष का अनुसरण कर रहे हैं। अतः यहाँ क्रिया का कर्तरि प्रयोग है।

(ख) कर्मणि प्रयोग :- कर्मणि प्रयोग में वाक्य की क्रिया के लिंग, वचन और पुरुष कर्म के लिंग, वचन और पुरुष के अनुरूप होते हैं।

जैसे- शीला ने पत्र लिखा। मोहन ने मिठाई खाई।

इन दोनों वाक्यों में क्रिया का लिंग, वचन और पुरुष कर्म के लिंग, वचन और पुरुष के अनुसार है, अतः क्रिया का कर्मणि प्रयोग माना जायेगा।

(ग) भाव प्रयोग– भाव प्रयोग में वाक्य में प्रयुक्त क्रिया के लिंग, वचन और पुरुष न तो कर्म के लिंग, वचन और पुरुष के अनुसार होते हैं बल्कि सदैव एकवचन, पुल्लिंग तथा अन्य पुरुष में होते हैं।

जैसे- मुझसे चला नहीं जाता।

इस वाक्य में क्रिया के लिंग, वचन और पुरुष न तो कर्ता के अनुरूप हैं और न कर्म के बल्कि क्रिया एकवचन तथा अन्य पुरुष में है। अतः क्रिया का भाव प्रयोग है।

वाच्य परिवर्तन के नियम | Rules of Vachya Parivartan in Hindi

एक वाच्य के वाक्य को दूसरे वाच्य के वाक्य में परिवर्तित करने को वाच्य परिवर्तन कहते हैं। जैसे-

कर्तृवाच्य                       से             कर्मवाच्य

(1) राम पुस्तक पढ़ता है।                     पुस्तक राम द्वारा पढ़ी जाती है।

(2) बछड़ा दूध पीता है।                        दूध बछड़े द्वारा पीया जाता है।

कर्तृवाच्य से कर्मवाच्य बनाते समय प्रधान क्रिया को भूतकालिक क्रिया में बदल दिया जाता है। इसकी भूतकालिक क्रिया के साथ ‘जाता’, ‘जाती’ का प्रयोग सहकारी क्रिया के रूप में किया जाता है। कर्मवाच्य में कर्म को कर्त्ता में तथा कर्ता को करण कारक में बदल दिया जाता है।

कर्तृवाच्य                              से                           भाववाच्य

(1) मैं जाग नहीं सकता।                                      मुझसे जागा नहीं जाता।

(2) वह नहीं टहलता।                                         उससे टहला नहीं जाता।

(3) घोड़ा दौड़ता है।                                           घोड़े द्वारा दौड़ा जाता है।

ऊपर के उदाहरणों से स्पष्ट है कि कर्तृवाच्य की क्रिया को सामान्य भूत के रूप में लाकर उसके साथ लिंग, वचन, पुरुष और काल के अनुसार ‘जाना क्रिया’ के रूप जोड़ने से कर्तृवाच्य से भाववाच्य की क्रिया बन जाती है। भाववाच्य में कर्ता को करण कारक में रखा जाता है।

कर्मवाच्य से कर्तृवाच्य

कर्मवाच्य में करण कारक में जो कर्ता हो, उसको कर्ता के रूप में बदल देना चाहिए और उसके अनुसार क्रिया का रूपान्तर होना चाहिए।

उदाहरण :

कर्मवाच्य                                         कर्तृवाच्य

(1) माया द्वारा वीणा बजाई जाती है।            माया वीणा बजाती है।

(2) लेख उनसे लिखा गया।                      उन्होंने लेख लिखा।

(3) मोहन से पुस्तक पढ़ी गयी।                  मोहन ने पुस्तक पढ़ी।

भाववाच्य                                  से                         कर्तृवाच्य

(1) नवीन से खेला नहीं गया।                                नवीन नहीं खेल पाया।

(2) सौरभ से दौड़ा नहीं जाता।                              सौरभ दौड़ नहीं सकता।

इसमें करण कारक वाले शब्द को ‘उद्देश्य’ कर्ता कारक के रूप में लिखते हैं और क्रिया को उसके अनुसार बदल देते हैं। भाववाच्य में कर्ता, करण कारक में वर्तमान रहता है। उसे करण कारक में जाने के उपरांत कर्ता के अनुकूल क्रिया का रूप देना चाहिए।

# Vachya in Hindi Vyakaran

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