सुभाष चन्द्र बोस पर निबंध- Subhash Chandra Bose Essay in Hindi Language

दोस्तों इस आर्टिकल में हम आपके लिए Subhash Chandra Bose par Nibandh ( Subhash Chandra Bose Essay in Hindi ) शेयर कर रहे है, हमने 100 words, 200 words, 250 words, 300 words and 500, 800 words ke essay लिखे है जो की class 1,2,3,4,5,6,7,8,9,10,11,12 Ke students | Vidyarthi ke liye upyogi hai.

In this article, we are providing information about Subhash Chandra Bose in Hindi. सुभाष चन्द्र बोस पर पूरी जानकारी जैसे की जन्म और शिक्षा, स्वतंत्रता संग्राम में सहयोग, कांग्रेस का नेतृत्व एवं त्याग, आजाद हिन्द फौज का गठन, मृत्यु अदि के बारे बताया गया है। 

सुभाष चन्द्र बोस पर निबंध | Subhash Chandra Bose Essay in Hindi Language

 

10 Lines Essay on Subhash Chandra Bose in Hindi

नेताजी का जन्म सन् 1897 को उड़ीसा के कटकं नगर में हुआ।

नेताजी सुभाषचंद्र बोस भारत माता के महान सपूत थे।

वे चौबीस परगना के कोदौलिया गांव के निवासी थे।

उन्होंने सन् 1913 में मैट्रिक की परीक्षा उत्तीर्ण की।

नेताजी ने बी.ए. की परीक्षा आनर्स स्काटिश चर्च कालेज से पास की।

1939 नेताजी राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष चुना गए थे।

नेताजी ने ‘आजाद हिन्द फौज’ का गठन किया ।

‘तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजदी दूंगा’ – ये शब्द थे अमर सेनानी नेताजी के थे।

26 अगस्त सन् 1942 को एक विमान दुर्घटना में नेताजी की मृत्यु हो गई।

नेताजी के जीवन चरित्र से हमें त्याग, बलिदान और वीरता की प्रेरणा मिलती है।

 

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Netaji Subhash Chandra Bose Essay in Hindi in 250 words

नेताजी सुभाष चन्द्र बोस का जन्म उड़ीसा प्रांत, कटक में हुआ था। ये क्रान्तिकारी नेता बने। ये अपूर्व देश भक्त थे। गाँधी जी की अहिंसा के विपरीत ये शक्ति से अंग्रेजों को भारत से भगाना चाहते थे। वे ईंट का जवाब पत्थर से देने के हिमायती थे। इनके भाषण बड़े जोशीले होते थे। भारत के नवयुवक उनसे बहुत प्रभावित थे।

अंग्रेज सरकार सुभाष बाबू से बहुत डरती थी। उनको जेल में बंदकर देती थी। सन् 1941 में नेता जी अंग्रेजों की निगरानी से भाग गए। वे वेश बदल कर विदेश चले गए। वे जापान पहुंचे।

जापान की सहायता से सेना एकत्रित करके वे भारत से अंग्रेजों को भगाना चाहते थे। उन्होंने सिंगापुर आकर आजाद हिन्द सेना गठित की। उसका अपना झण्डा बनाया। जापान की सहायता से इस सेना ने इम्फाल मणिपुर आदि से अंग्रेजों का सफाया कर दिया। वे भारत की ओर बढ़ रहे थे। दुर्भाग्य से उनकी सेना की भोजन सामग्री समाप्त हो गई। जापान पर अमेरिका ने एटम बम गिरा दिया। जापान की शक्ति क्षीण हो गई। आजाद हिन्द सेना को जापान की सहायता बंद हो गई। उनकी सेना भूखी रहकर भी लड़ती रही। अन्त में आत्म समर्पण करना पड़ा। नेता जी एक विमान द्वारा टोकियो जा रहे थे। कहते हैं कि उस विमान में रास्ते में ही आग लग गई 18 अगस्त 1945 ई. को उनकी दुखद मृत्यु का समाचार मिला।

नेता जी द्वारा सशस्त्र आक्रमण के कारण ऐसा वातावरण बना कि कुछ ही दिनों में अंग्रेज भारत छोड़कर चले गए। देशवासी अपने इस सुपुत्र का अब भी सम्मान करते हैं। उनके न रहने से ओजस्वी वक्ता तथा अद्भूत साहसी नेता की कमी खटकती है।

 

Subhash Chandra Bose Par Nibandh ( 500 words )

‘तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजदी दूंगा’ – ये शब्द थे अमर सेनानी नेताजी के, जिन्होंने भारतीय जनता के हृदय में विश्वास का अंकुर उपजाया था। इनकी वाणी में जादू और व्यक्तित्व में आकर्षण तथा हृदय में राष्ट्र के लिए मर मिटने की चाह थी, जो विदेश में जाकर स्वतन्त्रता संग्राम लड़ कर पूरी हुई।

नेताजी सुभाषचन्द्र बोस का जन्म 13 जनवरी, सन् 1879 ई० को उड़ीसा प्रांत, कटक में हुआ था । इनके पिता जानकीनाथ बोस कटक के प्रसिद्ध अधिवक्ता थे।

इनकी प्रारम्भिक शिक्षा कटक के यूरोपियन स्कूल में हुई। इन्होंने सन् 1912 ई० में मैट्रिक की परीक्षा पास की । ये उच्च शिक्षा के लिए कलकत्ता के प्रेजीडेंसी कालेज में दाखिल हुए। एक अंग्रेज प्राध्यापक को पीटने के अपराध में कालेज छोड़ना पड़ा। तत्पश्चात् बी० ए० की उपधि स्कॉटिश कालेज के विश्वविद्यालय में सर्वप्रथम रहकर प्राप्त की । फिर ये आई० सी० एम० के लिए विलायत गए। उत्तीर्ण होकर वहां से लौटे। स्वदेश पहुंचते ही सरकारी नौकरी मिल गई।

सन् 1920 ई० में नागपुर कांग्रेस अधिवेशन हुआ जो भुलाया नहीं जा सकता। गांधीजी का ‘असहयोग आंदोलन’ छिड़ा हुआ था, जिसका प्रभाव भारतीय जनता पर इतना पड़ा कि अनेक उच्चधिकारी सरकारी पदों को लात मार कर राष्ट्र सेवा में जुट गए। इस क्रांतिकारी युग में सुभाषचन्द्र बोस कब चूकने वाले थे ? इन्होंने भी सरकारी पद को ठोकर मार दी और स्वाधीनता संग्राम में कूद पड़े। कई बार सरकारी मेहमान बनना पड़ा। भांति-भांति की कष्टाग्नि में तप कर ये कुन्दन बन गए।

सुभाषचन्द्र बोस गर्म स्वभाव के थे, फलस्वरूप इन्हें कांग्रेस छोड़नी पड़ी। तभी इन्होंने फार्वर्ड ब्लाक की स्थापना की जिसका ध्येय पूर्ण स्वराज्य और हिन्दू-मुस्लिम एकता था । इनके कार्य का नया रूप देखकर गौरांग शासक बिगड़ उठे और इन्हें बन्दीगृह में ढूंस दिया। वहां इन्होंने भूख हड़ताल कर दी । देश भर में अशांति फैल गई । ब्रिटिश सरकार ने भयभीय होकर इन्हें छोड़ दिया और इन्हीं के घर पर नजरबन्द कर दिया।

नजरबन्दी की अवस्था में इनका किसी से मिलना-जुलना बन्द था। ये एकांतवास में बैठे देश को स्वतन्त्र कराने की योजना तैयार कर रहे थे। सन् 1942 ई० की 26 जनवरी का दिन आ गया। सारे देश में स्वतन्त्रता दिवस मनाया गया। तभी पंछी पिजरें से उड़ गया। सरकार के करे-धरे पर पानी फिर गया। ये जियाउद्दीन बन कर कई देशों में घूमते-घूमते टोकियो जा पहुंचे।

वहां पर इन्होंने ‘आजाद हिन्द फौज’ का गठन किया। इसमें जात-पात का भेदभाव नहीं था। महाराणा प्रताप की भांति इनके सैनिकों को भी घास उबाल कर खाना और देशभक्ति के गीत गाना था। द्वितीय महायुद्ध में जापान की पराजय होने के कारण इनकी आजाद हिन्द फौज को भी शस्त्र डालने पड़े। नेताजी विमान दुर्घटना के शिकार हो गए । यह दुःखद समाचार 23 अगस्त, 1945 ई० को टोकिया रेडियो ने प्रसारित किया। पर भारतीयों के हृदय में इनकी मृत्य अब भी रहस्य बनी हुई है।

आज भी नेताजी का नारा ‘जय हिन्द’ ‘कदम-कदम बढ़ाए जा’ का गीत और ‘दिल्ली चलो’ हूंकार हमारे कानों में गूंज रही है। महात्मा गांधी जी से मतभेद होने पर भी ये पिता तुल्य समझ कर उनका सम्मान करते थे। इन्होंने भारतीयों के सम्मुख देशभक्ति का अनुपम उदाहरण रखा जिससे हमें शिक्षा ग्रहण चाहिए और राष्ट्र हित में तन, मन, धन न्योछावर कर देना चाहिए। लोक सेवा मनुष्य को ऊंचा उठाती है।

 

lines Subhash Chandra Bose Essay

 

Long Essay Subhash Chandra Bose Essay in Hindi ( 800 words )

भूमिका

प्रत्येक देश में समय-समय पर महापुरुषों का जन्म होता रहता है। ऐसा महापुरुष दलितों, दुःखियों और पीड़ितों के उत्थान में अपना जीवन उत्सर्ग कर देते हैं। अनेक महापुरुष देश, धर्म, समाज और जाति को ऊँचा उठाने के लिए अपने प्राणों की बाजी लगा देते हैं। आधुनिक युग में भारत वर्ष में अनेक महापुरुष पैदा हुए। उनमें से नेताजी सुभाषचन्द्र बोस का नाम अग्रिम पंक्ति में है। नेताजी ने देश को स्वतंत्र करने के लिए अदम्य साहस और कठोर संघर्ष किया और देश के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया।

जन्म और शिक्षा

नेताजी का जन्म सन् 1897 को उड़ीसा के कटकं नगर में हुआ। उनके पिता का नाम रामबहादुर जानकी नाथ बोस था। वे चौबीस परगना के कोदौलिया गांव के निवासी थे। जीविकोपार्जन के लिए उड़ीसा के कटक शहर में रहने लगे थे। नेताजी के पिता सुप्रसिद्ध बैरिस्टर और कटक नगरपालिका और जिला बोर्ड के अध्यक्ष थे। नेताजी की माता का नाम प्रभावती बोस था। वे बड़े अच्छे स्वभाव और उच्च चरित्र की महिला थीं।

सुभाष की प्रारम्भिक शिक्षा अंग्रेजी माध्यम के स्कूल में हुई। उन्होंने सन् 1913 में मैट्रिक की परीक्षा उत्तीर्ण की। इसके पश्चात वे कलकत्ता के प्रेसीडेन्सी कालेज में भर्ती हुए। वे अत्यन्त मेधावी छात्र थे। प्रेसीडेंसी की एक घटना नेताजी के जीवन से जुटी हुई हैं। कालेज का एक अंग्रेज प्रोफेसर भारतीय छात्रों का अपमान करता था। इससे क्षुब्ध होकर सुभाष ने उसका तीव्र प्रतिवाद किया। इस कारण उन्हें कालेज से निकाल दिया गया। नेताजी ने बी.ए. की परीक्षा आनर्स के साथ स्काटिश चर्च कालेज से पास की। कालेज जीवन में उन पर रामकृष्ण परमहंस और स्वामी विवेकानन्द का विशेष प्रभाव पड़ा। वे दीन-दुःखियों की सेवा के लिए जगह-जगह भ्रमण करते थे।

सुभाष के घर वालों ने उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए इंगलैण्ड भेजा दिया। वहाँ उन्होंने उच्च अंकों से आई.सी.एस. की सम्माजनक परीक्षा उत्तीर्ण की और स्वदेश लौट आए।

स्वतंत्रता संग्राम में योगदान

नेताजी में देशाभिमान और राष्ट्रीयता की भावना कूट-कूट कर भरी थी। वे बचपन से अन्याय और अत्याचार के विरोधी थे। जिस समय नेताजी विलायत से उच्च शिक्षा प्राप्त करके भारत लौटे, उस समय यहाँ स्वतंत्रता संग्राम जोरों पर था। आई.सी.एस. परीक्षा पास करने के कारण उन्हें ऊँची सरकारी नौकरी और सम्मान मिल सकता था, किन्तु नेताजी अंग्रेजों की सत्ता से घृणा करते थे। अत: देश बन्धु चितरंजन दास के नेतृत्व और देखरेख में वे समाज और देश सेवा में लग गए। अपनी लगन, परिश्रम और कार्य क्षमता के बल पर वे कुछ ही दिनों में बंगाल के बड़े नेताओं में गिने जाने लगे। वे आजादी की लड़ाई में कई बार जेल गए और तरह-तरह के कष्टों का सामना करते रहे। राष्ट्रीय कांग्रेस ने उन्हें अपना अध्यक्ष चुना। इस पर उन्होंने बड़ी निष्ठा और उत्साह से कार्य किया।

कांग्रेस का नेतृत्व और पद त्याग

सुभाष, गाँधी जी के नेतृत्व में पूर्ण आस्था रखते थे। उनके निर्देशन में आजादी की लड़ाई लड़ते रहे। स्वास्थ्य सुधार के लिए अचानक उन्हें विदेश जाना पड़ा। स्वास्थ्य लाभ कर भारत लौटे और पुनः देश सेवा में जट गए। सन् 1938 में वे पुनः कांग्रेस के अध्यक्ष निर्वाचित हुए। इस मुद्दे पर उनका गाँधीजी से मतभेद हो गया। बहुमत रहते हुए भी नेताजी ने अध्यक्ष पद से त्याग पत्र दे दिया। उन्हीं दिनों त्रिपुरा कांग्रेस ने उन्हें फिर राष्ट्रीय कांग्रेस का अध्यक्ष चुना। गाँधी जी को उनका अध्यक्ष चुना जाना पसंद न आया। गांधी का रुख देखकर लोग नेताजी का विरोध करने लगे। अन्तत: सुभाषचन्द्र ने कांग्रेस का परित्याग किया और ‘फारवर्ड ब्लाक’ नाम पार्टी का गठन किया। अंग्रेज सरकार ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया और उनके निवास में ही उन्हें नजरबन्द कर दिया।

आजाद हिन्द फौज का गठन और नेतृत्व

एक दिन पहरेदारों की आँखों में धूल झोंक कर नेताजी घर से गायब हो गए। तरह-तरह के भेष बदलते और लुकते-छिपते वे भारत से जर्मनी पहुंचे। वहाँ उन्होंने हिटलर से मुलाकात की। वे जर्मनी से जापान चले आए। उस समय मित्र राष्ट्रों और विरोधी राष्ट्रों के बीच युद्ध चल रहा था। यह द्वितीय विश्व युद्ध का समय था। जापान पहुँचकर नेताजी ने आजाद हिन्द फौज का गठन किया। इस सेना में वे भारतीय सैनिक थे जो जापान द्वारा बंदी बनाए गए थे। आजाद हिन्द फौज ने अंग्रेजी सेना से जमकर लोहा लिया। जीत पर जीत हासिल कर आजाद हिन्द फौज मणिपुर के निकट प्रवेश कर कुछ क्षेत्र जीत लिया। किन्तु दुर्भाग्य से 26 अगस्त सन् 1942 को एक विमान दुर्घटना में नेताजी की मृत्यु हो गई। आजाद हिन्द फौज का उत्साह भंग हो गया। उधर द्वितीय विश्व युद्ध में जापान की पराजय ने इसे एक और आघात दिया।

उपसंहार

नेताजी सुभाषचंद्र बोस भारत माता के महान सपूत थे। वे सच्चे राष्ट्र भक्त और जन सेवक थे। उनमें अपूर्व उत्साह, साहस और पौरुष था। उन्होंने भारत माँ की स्वाधीनता के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया। नेताजी के जीवन चरित्र से हमें त्याग, बलिदान और वीरता की प्रेरणा मिलती है।

 

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