Lalach Buri Bala Hai Kahani | Story in Hindi- लालच बुरी बला है कहानी

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Lalach Buri Bala Hai Kahani | Story in Hindi

लालच बुरी बला है कहानी

पुरातन युग में एक राजा बहुत ही लोभी था। उसे सोना इकट्ठा करने की धुन सवार थी। उसने अपने खजाने की सारी निधि को सोने में बदलवा डाला था। इस पर भी वह सन्तुष्ट नहीं था। सोना इकट् ठा करने के लिए उसने प्रजा को सताना शुरू कर दिया। कई तरह के कर लगा दिये। इस तरह जो भी राशि इकट्ठी होती उसी वे वह सोना खरीद लेता।

एक दिन राजा को पता चला कि उसके राज्य में एक सिद्ध पुरुष (महात्मा) ठहरे हुए हैं। वे सबकी इच्छाएँ पूर्ण करते हैं। सुनकर राजा ने अपने मन्त्री द्वारा उन्हें महल में आने का निमन्त्रण भेजा । महात्मा ने उसे स्वीकार कर महल में पदार्पण किया । राजा ने महात्मा का बहुत सत्कार किया। उनके आतिथ्य सत्कार में किसी तरह की कमी न रखी । महात्मा के दिन सुख से कटने लगे।

कुछ दिनों तक आतिथ्य ग्रहण कर महात्मा ने पर्यटन की इच्छा प्रकट की और वरदान मांगने के लिए कहा। राजा इस अवसर की खोज में ही था उसने तत्काल कहा ‘महाराज, मैं जिस वस्तु का स्पर्श करूं, वह सोने में बदल जाये।’ महात्मा पहुँचे सिद्ध पुरुष थे। उन्होंने सहर्ष राजा को वरदान दे दिया और विदा ली ।

वरदान पाकर लोभी राजा की खुशी का पारावार न रहा। उसने जिस वस्तु का भी स्पर्श किया वही सोने में बदल गई । इस प्रकार उसका काफी समय सोना बनाने में बीत गया। अब उसे भूख प्यास सताने लगी। उसने सेवकों को आहार लाने का आदेश दिया । आहार लाया गया। उसके स्पर्श करते ही वह भी सोने में बदल गया। तब उसने पानी पीकर प्यास शान्त करनी चाही पर पानी भी मुख के. स्पर्श से सोना बन गया। अब तो राजा चिन्तित हो उठा।

तभी राजा की इकलौती बेटी उससे मिलने के लिए आयी। उसने उसे गले से लगा लिया। वह भी स्पर्श पाते ही सोने में बदल गई। अब उसकी आँखें खुली। न तो वह आहार ले सकता था, न जल पी सकता था और न ही किसी से दुलार कर सकता था। उसे वास्तविकता का ज्ञान हुआ कि स्वर्ण के लालच में वह सब कुछ गंवा चुका है सब कुछ होते हुए भी वह असहाय था, कंगाल था। तभी वह उस सिद्ध पुरुष की खोज में निकला। महात्मा भी अन्तर्यामी थे।

अतः राजा को उनकी खोज में अधिक नहीं भटकना पड़ा। वे स्वयं ही उसकी दयनीय दशा को देखकर उसे मिल गये। देखते ही लोभी राजा उनके चरणों में गिर पड़ा और अनुनय की, ‘मुझे सोना पाने का वरदान नहीं चाहिए।

‘तथास्तु’, महात्मा के मुख से निकाला। उन्होंने महल में जाकर स्वर्ण में परिवर्तित चीजों पर कमण्डल का जल छिड़का। उनके प्रताप से सभी वस्तुएं वास्तविक रूप में आ गई। राजकुमारी जीवित हो उठी। वह पिता के गले से चिपट गई । महात्मा ने तभी उपदेश दिया, ‘राजन् ! जीवन का सच्चा सुख स्वर्ण प्राप्ति में नहीं है। इसकी प्राप्ति परोपकार, सेवा और दयाभाव से है।”

इतना कहकर महात्मा ने प्रस्थान किया ।
तभी से लोभी राजा एक आदर्श राजा के रूप में बदल गया ।

शिक्षा-

लालच बुरी बला है ।

सच्चे सुख की प्राप्ति ।

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