Essay on Karat Karat Abhyas ke Jadmati hot Sujaan in Hindi- करत करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान

In this article, we are providing an Essay on Karat Karat Abhyas ke Jadmati hot Sujaan in Hindi. करत करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान पर निबंध.

Essay on Karat Karat Abhyas ke Jadmati hot Sujaan in Hindi- करत करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान

‘करत करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान।

रसरी आवत जात ते, सिल पर परत निसान।’

अर्थात् जिस प्रकार कुएँ की जगत की शिला पर पानी खींचने वाली रस्सी के बार-बार आने-जाने से निशान अंकित हो जाते है, उसी प्रकार निरंतर अभ्यास करते रहने से जड़मति अर्थात भुद्दिहिन भी सुजान अर्थात भुद्दिमान बन जाता है। कहने का भाव यह है कि लगातार परिश्रम और लगन के द्वारा असंभव समझे जाने वाले कार्यों को भी संभव किया जा सकता है। सतत् अभ्यास मनुष्य को सफलता की ऊँची-से-ऊँची सीढ़ियों तक ले जाता है।

इसमें कोई संदेह नहीं कि इस संसार में जन्म से कोई विद्वान् बनकर नहीं आता। सभी लोग अनजान और अबोध होते है। यह तो उनके सतत् अभ्यास का फल होता है कि वे विद्वान, महान् या शक्तिशाली बन जाते हैं। अभ्यास आत्मविकास का सर्वो । साधन है। यदि एक बार असफल हो भी जाए तो बार-बार के श्रम से सफलता प्राप्त की जा सकती है। एक छोटा बच्चा बार-बा गिरगिर कर चलना सीख जाता है, घुड़सवार बार-बार घोड़े से गिरकर ही सवारी करना सीखता है। शरीर के जिस अंग से काम लिया जाए, वह अंग बलिष्ट हो जाता हैऔर जिस अंग का प्रयोग न किआ जाए, वह कमजोर रह जाता है।

प्राचीनकाल में ऋषि-मुनि तपस्या करके अनेक प्रकार की सिद्धियाँ प्राप्त कर लेते थे। रावण, हिरण्यकश्यप आदि राक्षसों अपने अभ्यास और परिश्रम के बल पर अनेक वरदान पाए। इतिहास में अनेक ऐसे उदाहरण मिल जाते हैं, जिन्हें बार-बार अभाव करने पर सफलता प्राप्त हुई है। मोहम्मद गौरी ने सत्रह बार पराजित होकर भी साहस न छोड़ा और अठारहवीं बार पृथ्वीराज चौह को हरा दिया। किंग ब्रूस एंड स्पाइडर नामक कविता में राबर्ट ब्रूस निरंतर युद्ध में पराजित होने पर एक गुफा में छिप गया । उसने वहाँ एक मकड़ी को देखा, जो ऊपर चढ़ने का प्रयत्न कर रही थी, परंतु उसे सफलता नहीं मिल रही थी। बार-बार के प्रया से अंत में वह सफल हो गई। राबर्ट ब्रूस को इस घटना से प्रेरणा मिली और उसने एक बार फिर युद्ध में प्रयास किया और सफलता प्राप्त की। कविवर कालिदास कवित्व-शक्ति प्राप्त करने से पहले निपट जड़-बुद्धि थे, परंतु कठिन परिश्रम और निरंतर साधना । अभ्यास ने तपा कर उन्हें महाकवि कालिदास बना दिया। जब गुरु द्रोणाचार्य ने भील बालक एकलव्य को शस्त्र विद्या सिखाने missing इंकार कर दिया तो उसने निरंतर अभ्यास किया और एक दिन वह बालक अर्जुन से भी बढ़कर धनुर्विद्या सीख गया। इसी प्रकार अनेक वैज्ञानिक जैसे राइट बंधु, मैडम क्यूरी आदि निरंतर अभ्यास के कारण ही वैज्ञानिक खोजें कर पाए।

जीवन के किसी क्षेत्र में भी सफलता प्राप्त करने के लिए निरंतर अभ्यास आवश्यक है। निरंतर अभ्यास के साथ-साथ परिश्रम भी आवश्यक है। जो व्यक्ति आलस्य को त्याग कर परिश्रम करता है, उसे आगे बढ़ने से कोई नहीं रोक सकता। जिसने भी परिश्रम से मुँह मोड़ा, सफलता उससे कोसों दूर भागती है। काम मनोरथ से नहीं, बल्कि परिश्रम से सिद्ध होते हैं। अभ्यास जीवन में सफलता दिलाने का मूल मंत्र है। आज संसार मे जो लोग विद्या, बल, प्रतिष्ठा, व्यवसाय आदि के क्षेत्र मे ऊँचे पदों पर आसीन हैं, वे एक दिन में ही वहाँ नहीं पहुँच गए। इसके लिए उन्हें लगातार श्रम करना पड़ा होगा, साधना करनी प्रड़ी होगी, तभी उनके हाथ सफलता की कुंजी लगी होगी।

लगातार अभ्यास से मनुष्य अनेक सिद्धियाँ प्राप्त कर सकता है। अभ्यास से वह किसी भी कार्य में कुशल हो जाता है। उसके लिए कठिन-से-कठिन कार्य भी सरल हो जाता है। उसके समय की बचत होती है। किसी कार्य को एक अनजान व्यक्ति आठ घंटे में करेगा तो बार-बार काम करने से उसे काम के सूक्ष्मतम गुण-दोषों का ज्ञान हो जाता है, जिससे उसमें वह कार्य करने में दक्षता आ जाती है और वह विशेषज्ञ बन जाता है।

विद्यार्थी जीवन में तो अभ्यास अति आवश्यक होता है। शिक्षा की प्राप्ति एक दिन में नहीं की जा सकती, इसके लिए वर्षों की लगन, कठिन परिश्रम तथा निरंतर अभ्यास की आवश्यकता होती है। विद्वान् बनने के लिए रातों की नींद गँवानी पड़ती है, दिन का चैन बेचना पड़ता है। विद्यार्थी अपने लक्ष्य से भटक न जाए, इसके लिए उनसे लगातार अभ्यास तथा कठोर परिश्रम करवाया जाता है। 

समाज सुधार तथा राष्ट्र-उत्थान में भी अभ्यास का महत्व है। किसी भी देश की उन्नति के लिए एक दिन की नहीं, बल्कि वर्षों की योजनाएँ तथा समूचे देशवासियों का कठोर परिश्रम चाहिए। संसार के संपूर्ण विकास के पीछे अभ्यास और परिश्रम का हाथ है। अभ्यास से ही पूर्णता आती है।

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One comment

  1. Nice , helpful but vidyarthi jeevan main iska mahatv is not complete there should be more lines to end this para with grace

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