दहेज प्रथा पर निबंध- Essay on Dowry System in Hindi

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दहेज प्रथा पर निबंध- Essay on Dowry System in Hindi

Dahej Pratha Par Nibandh 300 words

दहेज प्रथा सामाजिक और पारिवारिक जीवन के लिए एक कलंक है क्योंकि बड़े दुख की बात है कि हमारे देश में शिक्षा और जीवन स्तर में विकास होने के बावजूद भी दहेज प्रथा अभी तक चलती आ रही है। इस दहेज प्रथा की वजह से ना जाने कितने घर बर्बाद हो चुके हैं और कितनों को भुखमरी की कगार पर लाकर खड़ा कर दिया है।

दहेज प्रथा क्या है?

यह प्रथा प्राचीन काल से चलती आ रही है, पहले काफी हद तक अच्छी मानी जाती थी मगर अभी इस प्रथा ने बुरा स्वरूप धारण कर लिया है । किसी भी माता-पिता के पास इतने सारे पैसे नहीं होते हैं कि वह अपनी बेटी की शादी के लिए दहेज 10-20 लाख दे पाए, इसी कारण वर्ष दहेज के अभाव में योग्य कन्याएं अयोग्य वरों को सौंप दी जाती हैं । दहेज प्रथा का simple सा अर्थ यह होता है कि , शादी विवाह के अवसर पर कन्या पक्ष द्वारा सामने वाले पक्ष को उपहार में कोई भी महंगी भेंट दी जाती है, इसे “दहेज़” काहा जाता है‌, दहेज प्रथा समाज के लिए कलंक मानी जाती है ।

दहेज प्रथा को किस तरह से रोका जा सकता है ?

दहेज को रोकने के लिए आज बहुत सारी संस्थाएं बनाई गई है और इसके अलावा भारत सरकार ने दहेज पर प्रतिबंध के लिए, दहेज कानून अधिनियम 1961 के अनुसार दहेज लेने या फिर देने पर 5 वर्ष की कैद और 150000 रुपए का जुर्माना लगाया गया है ।

दहेज प्रथा को हम किस तरह से रोक सकते है ?

दहेज प्रथा के प्रतिबंध के लिए बहुत सारे कानून बनाए गए हैं लेकिन जब तक पुराने जमाने की सोच नहीं बदलेगी, तब तक दहेज प्रथा बदलना असंभव है । इसलिए हमें सबसे पहले हमारी सोच बदलनी होगी । जब तक समाज में दहेज प्रथा के प्रति जागृति नहीं आएगी तब तक दहेज प्रथा को बदलना मुश्किल होगा । दहेज प्रथा को खत्म करना हमारी जिम्मेदारी है! हम सभी युवकों को सामने आना चाहिए और लोगों को इसकी बुराइयों के बारे में बताना चाहिए! रिश्ते हमेशा दिल के होते हैं पैसों के नहीं. हमें इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि कोई भी बेटी अपने परिवार में बोझ ना बने, इसके लिए दहेज प्रथा को खत्म करना बहुत जरूरी है। जो भी विद्यार्थि इस लेख को पढ़ रहे हैं, आप अपने मन से वचन लीजिए कि आने वाले समय में आप दहेज नहीं लेंगे ।

Essay on Dowry System in Hindi in 1500 words

नारी तुम केवल श्रद्धा हो,

विश्वास रजत नग-पग तल में।

पीयूष स्रोत सी बहा करो,

जीवन के सुन्दर समतल में॥

कविवर जयशंकर प्रसाद की ये काव्य-पंक्तियों/जीवन उद्यान में महकते, सुगन्धित, सौन्दर्यमय पुष्प रूपी नारी के महत्व को और उसकी कमनीयता को अभिव्यक्त करती है। सृष्टि के आरम्भ से ही प्रकृति और पुरुष दो मूल तत्व सृष्टि-प्रसार के आधार स्तम्भ रहे हैं। जीवन और गृहस्थ रूपी रथ के ये दो चक्र है और दोनों यथाशक्ति भार वहन करते हैं। इन दोनों के संतुलन में जीवन का सौन्दर्य और सुख छिपा हुआ है। अत: प्रत्येक दृष्टि से नारी जीवन-संघर्ष में, जीवन-यात्रा में सहयात्री है, सहचरी है।

दहेज प्रथा का अर्थ- दहेज शब्द अरबी भाषा के ‘जहेज’ शब्द से बना है। जिसका अर्थ है ‘सौगात’। ‘संस्कृत में ‘दायज’ शब्द मिलता है, जिसका अर्थ है उपहार या दान। मेक्सरेडिल ने दहेज को स्पष्ट करते हुए लिखा है-

“साधारणतया दहेज वह सम्पत्ति है जो एक व्यक्ति विवाह के अवसर पर कन्या पक्ष से प्राप्त करता है।”

इस परिभाषा के अनुसार दहेज़ की संपत्ति प्राप्त करने के लिए किसी भी प्रकार के नियम की अथवा बंधन का ज्ञान नहीं होता है। वस्तुत: माता-पिता का अपनी लाड़ली पुत्री के प्रति जो वात्सल्य और स्नेह की भावना होती है उसी के कारण प्राचीन काल में भी लोग अपनी पुत्री को दान दिया करते थे ताकि उनकी कन्या अपना गृहस्थ जीवन आरम्भ करते हुए किसी भी प्रकार की परेशानियों का सामना न करे। इस दान के मूल में यही शुभेच्छा थी। वर्तमान युग में दहेज अब वात्सल्य और स्नेह का प्रतीक नहीं रह गया है अपितु यह वह अभिशाप है जो कन्या के जन्म लेते समय माता-पिता को पीड़ित करता है और उसके बाद कन्या के सिर पर सवार होकर ससुराल तक भी उसका पीछा नहीं छोड़ता। इतना ही नहीं कभी-कभी यह वरक-वधु दोनों पक्षों के घरों को उजाड़ कर ही साँस लेता है।

दहेज-प्रथा का प्राचीन रूप- मनु ने मनुस्मृति में आठ प्रकार के विवाहों का उल्लेख किया है—ब्रह्म विवाह, दैव विवाह, आर्य विवाह, प्रजापत्य विवाह, आसुर विवाह, गान्धीव विवाह, राक्षस विवाह तथा पैशाच विवाह। आसुर विवाह का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि यदि विवाह के अवसर पर वर को कन्या के माता-पिता धन देते हैं तो वह आसुर विवाह कहलाता है-

जातिभ्योविणं दत्वा कन्यायै चैव शकि्तत |

कन्या प्रदान चर्म उच्यते॥

विवाह की प्रथा के अनुसार शास्त्र के ज्ञाता के समक्ष विवाह सम्पन्न कराते तथा कन्या का हाथ वर के हाथ में देते। इसी अवसर पर बन्धु-बान्धव तथा प्रिजयन कन्या को प्रेमोपहार स्वरूप कुछ दहेज देते थे। युग की अवस्था के अनुसार दहेज का स्वीरूप भी बदलता गया। कृषि-युग में पशुओं तथा भूमि का महत्व बढ़ा। अत: दहेज के रूप में भूमि दान तथा गाय दान आदि की प्रथा चल पड़ी। इसीलिए आज भी लोग विवाह में गाय दान तथा भूमि दान को बहुत ही पवित्र रूप में मानते हैं। कृषि युग के पश्चात् औद्योगीकरण होने लगा तथा अर्थ को विशेष महत्व दिया जाने लगा। इसलिए दहेज के स्थान पर धन, वस्त्र, आभूषण आदि प्रमुख बन गए। अब यही प्रथा चल पड़ी। आज के युग में स्कूटर, टैलीविजन, फ्रिज आदि की माँग और प्रथा इस तथ्य का प्रमाण है कि जिस युग में जिस वस्तु विशेष का महत्व रहा वही दहेज के रूप में भी दी जाती रही।

आधुनिक युग में दहेज एक अभिशाप- कन्या का जन्म पुरुष प्रधान समाज में केवल दु:ख का ही कारण माना जाता रहा है। उसके जन्म से ही उसे ‘पराया धन’ कहा जाता है। प्राचीनकाल में स्त्री की शिक्षा-दीक्षा भी इसी दृष्टिकोण को मध्य नज़र रख कर दी जाती है। लड़के के जन्म को शुभ माना जाता है तथा लड़की के जन्म को अशुभ माना। कालिदास ने ‘अभिज्ञान शाकुन्तलम’ में लिखा है कि कन्या का पिता होना कष्टकारक होता है

पुत्रीति जाता महतीह चिन्ता, कस्मै प्रदेयेति महान् वितर्कः॥

दत्वा सुखं प्राप्स्यति वा नवेति, कन्या पितृत्वं खलु नाम कष्ट्म॥

इस प्राचीन विचारधारा में कन्या को विपत्ति का कारण अन्य दृष्टियों से माना जाता था परन्तु आधुनिक युग में दहेज के अभिशाप के कारण कन्या का जन्म होते ही माता-पिता गहरी श्वास छोड़ने लगते हैं। जो लोग सम्पन्न होते हैं वे उसके जन्म से ही उसके लिए, विवाह के अवसर के लिए धन संचित करने लगते हैं, परन्तु जो आर्थिक रूप से विपन्न होते हैं वे इसी चिन्ता में घुलने लगते हैं। आज स्थिति इतनी विकट हो गई है कि जो लड़कियां नौकरी में भी होती हैं, उनके विवाह के अवसर पर भी दहेज के लालची लोग हिसाब लगाते हैं कि कितने वर्षों में कितने रुपए महीने के हिसाब से कितना धन जमा होगा। दहेज की स्थिति व्यापारी वर्ग में तो इस रूप में फैली है कि साधारण व्यापारी इस बोझ के नीचे दब कर रह जाता है। सारे परिवार का उद्देश्य ही लड़की की शादी के लिए धन एकत्रित करना हो जाता है। मध्यवर्गीय परिवारों में स्थिति अत्यन्त विकट होती है। ऐसे लोग जो नौकरी पेशा वाले होते हैं, अपनी भविष्य-निधि, ‘प्राविडेन्ट फण्ड या जीवन-बीमा सुरक्षा आदि बचत योजनाओं से पैसा निकाल कर लगभग खाली हो जाते हैं।

दहेज आज फैशन और प्रतिष्ठा का रूप ले रहा है तथा भयानक दानव बनकर मासूम निर्दोष लड़कियों को निगल रहा है। प्रति दिन पत्र-पत्रिकाओं, समाचार-पत्रों में दहेज में पर्याप्त रूप से धन न मिलने पर या अधिक माँग पूरी न होने पर सास और ससुर, ननद और देवर तथा पति द्वारा लड़की पर होने वाली जघन्य, अमानवीय, क्रूर अत्याचारों का वर्णन मिलता है। स्टोव का फटना, आग लगना, गैस सिलिण्डर से जलना ये घटनाएं केवल नवविवाहिताओं के साथ ही होती हैं। दहेज-दानव की बलि चढ़ने वाली अभागी लड़कियों की संख्या प्रतिवर्ष बढ़ती जाती है। कभी-कभी तो लड़की खुद ही आत्महत्या कर लेती है। सन् 1988 में कानपुर के एक साधारण परिवार की तीनों बहनों ने एक साथ आत्महत्या की थी क्योंकि उनके लिए वर इसलिए नहीं मिलता था कि उनके पिता की दहेज देने की सामथ्र्य नहीं थी। आज के युग में लड़कों की नीलामी होती है। डॉक्टर, आफिसर या इंजीनियर लड़का कार तथा लाखों से कम में नीलाम नहीं होता। उसकी मान-मर्यादा, धर्म-ईमान सभी दाव पर लग जाते हैं जिनकी रक्षा अधिक दहेज प्राप्त करने से ही हो सकती है। सन् 1990 के एक सर्वेक्षण के अनुसार दहेज की राशि साधारण पेशे के लिए 50-60 हज़ार से शुरु होती है, द्वितीय, श्रेणी के लिए उसकी कीमत अब 70-80 हज़ार तक तथा प्रथम श्रेणी के लिए लाखों बन गई हैं।

दहेज के कलह के कारण लड़की का पारिवारिक जीवन नारकीय बन जाता है और तलाक की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। दहेज प्रथा के कारण ही निर्धन परिवारों की योग्य लड़कियाँ अयोग्य और अनमेल वर से विवाह के लिए बाध्य हो जाती हैं जिससे फिर कलह उत्पन्न होता है।

दहेज-प्रथा को रोकने के उपाय-दहेज- प्रथा आज समाज में भयानक स्थिति में पहुंच गई है तथा उसका रूप वीभत्स हो गया है। इस कुप्रथा के कारण ही लोग विभिन्न प्रकार के भ्रष्टाचार करने पर विवश हो जाते हैं। लड़की के विवाह के लिए धन एकत्रित करने के लिए पिता अनेक प्रकार के अनैतिक साधन अपनाता है। इस प्रथा को रोकने के लिए केन्द्रीय सरकार ने सन् 1961 में दहेज निरोधक अधिनियम बनाया तथा सन् 1985 में भी इसी प्रकार का नियम बनाया गया। इसके अनुसार कोई भी व्यक्ति किसी भी प्रकार का दहेज विवाह में नहीं देगा। यदि कोई व्यक्ति किसी भी रूप में देता हुआ पकड़ा जाएगा तो उसे कैद एवं जुर्माने की सजा भी हो सकती है।

महिलाओं के संगठन- ‘नैशनल फैडरेशन आफ इंडियन वोमेन’ ने भी सन् 1976 में दहेज विरोधी प्रस्ताव पारित किया था। इस का सारे देश में व्यापक प्रचार करवा कर इस कुपथा के प्रति जनमत बनाने का प्रयास किया गया था।

इस प्रथा का उन्मूलन सामाजिक एवं नैतिक आधार पर किया जा सकता है। युवक और युवतियाँ दृढ़ प्रतिज्ञ होकर अपने विवाह में न दहेज लें और न दहेज दें। यदि कहीं पर इस प्रकार की स्थिति उत्पन्न हो भी जाए तो उसका विरोध किया जाए। समाज के लोग मिलकर दहेज लेने वालों का विरोध करें, उनका सामाजिक बहिष्कार करें तथा सरकार उन्हें कठोरतम दण्ड दे। दहेज प्रथा के उन्मूलन के लिए महात्मा गांधी ने कहा था-“दहेज की पातकी प्रथा के खिलाफ ज़बरदस्त लोकमत बनाया जाना चाहिए और जो नवयुवक इस प्रकार गलत ढंग से लिए गए धन से अपने हाथों को अपूर्वित्र करें उन्हें जाति से बहिष्कृत कर देना चाहिए।” अन्तर्जातीय तथा प्रेम-विवाह को प्रोत्साहन दिया जाए जिससे इनके प्रति युवक-युवतियों का आकर्षण बढ़े। यदि सामूहिक विवाह का आयोजन किया जाए तो वह भी उचित रहेगा। इस दिशा में स्त्रियों का सक्रिय सहयोग आवश्यक है। |ाँ किसी ऐसे युवक से विवाह करने के लिए सहमत ही न हों जो दहेज का लोभी है।\नारी की शिक्षा, स्वतंत्रता भी दहेज प्रथा के उन्मूलन के लिए आवश्यक है। यदि उसका मनोबल सुदृढ़ हो, उसमें अन्याय और अत्याचार करने की प्रबल भावना हो तो इस प्रथा को रोकना असंभव नहीं। कानून के माध्यम से ही इसे रोकना संभव नहीं। नारी जाति में जागृति और चेतना लाने के लिए प्रयास किए जाने चाहिए, तभी इस प्रथा को रोका जा सकता है। श्रीमती इन्दिरा गांधी के शब्दों में-इस बुराई को कानून द्वारा ही समाप्त नहीं किया जा सकता है इसके लिए सामूहिक चेतना व जागृति भी आवश्यक है।”

उपसंहार– दहेज की कुप्रथा किसी एक व्यक्ति के लिए नहीं अपितु संपूर्ण राष्ट्र तथा इतिहास और संस्कृति के लिए ही कलंक है। यह नारकीय और राक्षसी, कृत्य मानवता के लिए आत्मघाती है तथा जीवन के उपवन में तुषारापात है। देश के प्रत्येक व्यक्ति का यह पावन कर्तव्य है कि वह इस कार्य में सक्रिय सहयोग दे ताकि इस से देश पर लगा कलंक का टीका धोया जा सके हैं और मनुष्यता की भी रक्षा हो सके। समाज के सर्वागीण विकास के लिए इस प्रथा को समाप्त करना अत्यावश्यक है। मानव समाज के इतिहास में यह अमानवीय प्रथा अशान्ति और अनेक जीवन को नष्ट करने की कलंकित प्रथा है।

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Berojgari ki Samasya par nibandh

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