Essay on Women Education in Hindi- नारी शिक्षा पर निबंध

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Essay Women Education in Hindi- नारी शिक्षा पर निबंध

भूमिका- हिन्दी के प्रसिद्ध कवि जयशंकर प्रसाद ने नारी के संदर्भ में ये काव्य-पंक्तियां रची हैं

नारी तुम केवल अल्ला हो।

विश्वास रखत नग-पग तल में।

पीयूष स्त्रोत सी बहा करो।

जीवन के सुन्दर समतल में।

इन पंक्तियों में नारी को श्रद्धा मान कर उससे कामना की गई है कि वह जीवन में सदैव अमृत-मयी धारा बन कर बहती रहे। मनुष्य सामाजिक प्राणी है, अतएव उसकी वैयक्तिक उन्नति भी सामाजिक विधान पर ही निर्भर करती है। नारी उसके साथ आरम्भ से ही सहचरी बन कर आई है। जीवन के उपवन में जो पुष्प खिलते हैं उनमें सुख की सौरभ नारी ही बिखेरती है। यह पारिवारिक जीवन के लिए ही सहायक नहीं होती है अपितु जीवन के हर कोण पर ही संघर्ष में नारी ने पुरुष का साथ देकर इतिहास-निर्माण में सहयोग किया है। हमारे देश के इतिहास में सामाजिक ढांचे में काल-क्रम में ऐसे परिवर्तन हुए हैं जिससे नारी का अस्तित्व झूले पर झूलते हुए व्यक्ति के समान हो गया और वह अनेक बंधनों में जकड़। कर कठपुतली के समान बनकर रह गई।

नारी-शिक्षा की आवश्यकता- वास्तव में यह प्रश्न ही नितांत अज्ञानता का सूचक । है कि नारी की शिक्षा की क्या आवश्यकता है ? नारी की शिक्षा के प्रति अनेक प्रकार के प्रश्न समाज के तानाशाह तथा अशिक्षित परम्परावादी लोगों ने उठाए हैं। नारी का रूप मा, । पत्नी, बहिन के रूप में सामाजिक जीवन में देखा जाता है और इन रूपों में वह विभिन्न प्रकार के दायित्वों को निभाती है। मां के रूप में वह केवल जन्म देने वाली ही नहीं है अपितु वन में ही वह अपने बच्चे को सही दिशा दे सकती है। पढ़ी लिखी, शिक्षित होने पर, लक के मनोविज्ञान से परिचित होने पर और सामाजिक मूल्यों को पहचानते हुए ही नारी । बच्चे के मानसिक विकास में सहायक होती है। बच्चे की सबसे पहली पाठशाला तो घर ही होता है जिसमें उसकी मां ही उसे आरम्भिक ज्ञान-दान करती है। अत: माँ ही बच्चे के लिए पहली शिक्षिका है और वही उसके जीवन को मोड़ दे सकती है। इसी प्रकार पत्नी के रूप में वह अपनी गृहस्था की रक्षक ही नहीं होती है बल्कि उसे सुख का स्वर्ग भी बनाती है। वर्तमान युग में तो उसने जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में पुरुष वर्ग के समान ही बहुमुखी प्रगति की है। अत: नारी-शिक्षा की आवश्यकता और उसके महत्त्व पर प्रश्न करना केवल हमारी अज्ञानता का सूचक है।

प्राचीन काल में नारी शिक्षा- आरम्भ के युग में नारी का अच्छा सम्मान था। वे पढ़ी-लिखी होती थी। इससे नारी का बौद्धिक स्तर विकसित हो जाता और वे अपने कर्तव्य को पहचान लेती थीं। वे पुरुष के इंगितों पर नहीं चलती थी। तभी तो कैकेयी ने महाराजा दशरथ की युद्ध में रक्षा की, तभी तो विदुला ने अपने संजय को ऐसा समझाया कि वह युद्ध से भागा हुआ पुनः युद्ध में चला गया तभी तो मंडन मिश्र की पली अभय भारती ने शंकराचार्य को शास्त्रार्थ में हराया। हमारे पास एक नहीं, अनेक स्त्रियों के उदाहरण हैं जिन्होंने अपनी शिक्षा के प्रभाव से समय-समय पर अपने पुत्रों और पतियों को सजग किया। उस समय नारी बहुत शिक्षा पाती थी और उस समय की शिक्षा भी आदर्श होती थी। मनुस्मृति में नारी के संदर्भ में कहा गया है-

यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः।

अर्थात् जहां नारी की पूजा होती है वहाँ देवता भी रमते हैं। नारी पूजा का अर्थ उसे सम्मान देना है, उसे शिक्षित बनाना है और जीवन के प्रत्येक पहलू में उसे साथ रखना है।

मध्ययुग में यवनों के आक्रमण आरम्भ हो गए, मुसलमान लड़कियों को उठा ले जाते थे, इसलिए उनके लिए पर्दे की प्रथा आरम्भ हो गई और बाल-विवाह होने लगे और उस समय पुरुष वर्ग ने नारी का केवल एक कर्तव्य समझा पति की सेवा और बच्चों का पालन। स्त्रियों ने भी अपने आप को पुरुषों के अधीन कर दिया और शिक्षा न होने के कारण स्त्रियां अपना कर्तव्य स्वतन्त्र दृष्टि से निश्चित न कर पाई। परिणामत: वे एक ऐसे घेरे में बन्द हो। गई जहाँ से उनका निकलना असम्भव सा हो गया। यही कारण है कि उन में निराशा फैल गई। वे पूर्णतया पुरुषाश्रिता हो गई। जीविकोपार्जन के लिए नारी का बाह्य जीवन में कूदना पाप समझा जाने लगा। यदि विवशतावश किसी नारी को ऐसा करना पड़ता तो उसे कुल्टा कह अपमानित किया जाता था। नौकरी करने वाली लड़कियों के लिए आज भी समाज के कुछ लोगों में सम्मानित धारणा नहीं।

मध्य युग में कुछ कवियों ने नारी के संदर्भ में स्वस्थ विचार नहीं दिए। कबीर ने कहा है-

नारी की झाई पड़त, अन्य होत भुजंग।

तुलसीदास जी ने ‘कु’ और ‘सु’ नारी के चरित्र द्वारा कुपात्र को ढोल गंवार शूद्र और पशु कहा है लेकिन वे सीता अनुसुइयां तथा कौशल्या मंदोदरी जैसे नारी पात्रों को सुपात्र कह कर उन्हें वन्दनीय मानते हैं।

मध्यकाल में गुरु नानक देव जी ने नारी के सन्दर्भ में क्रान्तिकारी विचार दिए और समाज में उसे प्रतिष्ठा दी।।

शिक्षा के अभाव के कारण भारत की मातृशक्ति में आत्महीनता की अन्थि आ गई और उसका अपना इतिहास बदल गया। विवाह के पश्चात् नारी जब ससुराल से तंग होती, सास, ननद और पति द्वारा दु:खी की जाती और यह देखती कि पुरुष इसीलिए कहर ढा रहा है। कि वह पढ़ा-लिखा है, उसकी भी आत्मा शिक्षा पाने के लिए छटपटाती और चाहती कि वह आर्थिक दृष्टि से स्वच्छन्द हो जाए। तब वह पंजाबी लोकगीत द्वारा मायके आकर मां को इस तरह पूछती है :-

‘दस नी माये मेरिए विद्या किनी की दूर

अर्थात् मेरी माता, बता पढ़ाई कितनी कठिन है।

आधुनिक युग में नारी- शिक्षा-सब युग एक समान नहीं रहते। महर्षि स्वामी दयानन्द जी ने इस अभाव को देखा, मातृशिक्षा की इस पीड़ा को परखा और नारी-शिक्षा का नारा लगाया। उस समय स्वामी जी और उनके शिष्यों पर ईटें बरसाई गई। धीरे-धीरे लोगों ने युग को समझा, समाज ने निश्चय कर लिया कि लड़की को इतना पढ़ाना चाहिए कि वह चिट्ठी-पत्र लिख सके। इसलिए आज से साठ वर्ष पहले लड़कियों को केवल प्राइमरी तक शिक्षा दी जाने लगी। पर वह भी बहुत कम। सारे मुहल्ले में केवल एक लड़की पढ़ी होती। उसका बहुत आदर होता था। धीरे-धीरे यह धारणा बदली और निश्चय किया गया कि प्राइमरी शिक्षा बहुत कम है। आज से तीस वर्ष पहले लड़कियों के लिए मिडल और प्रभाकर तक की शिक्षा को उचित समझा गया। बी. ए. की बात क्या करनी, मैट्रिक भी बहुत कम होती थीं। धीरे-धीरे यह दृष्टिकोण भी बदला। निश्चय किया गया कि इतना पढ़ाया जाए जिससे वे आर्थिक दृष्टि से स्वावलम्बी बन सकें। इससे वे मैट्रिक, बेसिक और कुछ बी.ए. बी.टी. होने लगी। आज वह स्थिति भी बहुत बदल गई है। आज लड़की का पहला गुण यह पूछा जाता है कि पढ़ी कितनी है। किसी एम. ए. पास लड़के के साथ मैट्रिक पास लड़की बाँध दी जाए तो वह नाक-भौं चढ़ाता है। मैट्रिक पास लड़का मैट्रिक पास लड़की मांगता है। आजकल शिक्षा नारी-जीवन का अनिवार्य अंग बन गई है। नारी-शिक्षा दो कारणों से दी जा रही है : लड़की को अच्छा वर मिले और आर्थिक दृष्टि से वह आत्मनिर्भरत बन सके।

अब यह कहा जाता है कि नारी को अवश्य शिक्षा देनी चाहिए, नारी-शिक्षा का महत्त्व अधिक है। आज जो लोग अपनी लड़कियों को शिक्षा नहीं देते, उन्हें पश्चाताप करते हुए देखा गया है। आज नारी-शिक्षा केवल इसलिए ही नहीं दी जाती है कि वह मूर्ख न रह जाए, उसे भले-बुरे का ज्ञान हो जाए। अपितु उसकी आत्मा भी ऊपर उठे, वह मूक पशु की तरह न रहे। अपना और अपने परिवार का जीवन सुखी और शान्त बना सके। नारी-शिक्षा का यह भी उद्देश्य है कि भगवान् न करे, यदि लड़क़ी पर कोई विपत्ति आ जाए तो वह “ार स्वयं उठा सके, उसे दूसरों के दरवाजे खटखटाने की आवश्यकता न रहे। यही नहीं, निर्धन परिवार की लड़कियां नौकरी करके घर की आर्थिक अवस्था को सुधारने में भी अपने पति का हाथ बंटाती हैं।

आज के युग में नारी शिक्षा, व्यापार, मेडिकल इन्जीनियरिंग, वैज्ञानिक शोध, खेल-कूद, किसी भी क्षेत्र में पीछे नहीं है। पीछे रहने की अपेक्षा अब स्थिति बदलने लगी है। स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय के जो परीक्षा परिणाम घोषित होते हैं उनमें लड़कियों का सफलता प्रतिशत तो अधिक होती ही है वे पोजिशन भी प्राप्त करती हैं। आज शिक्षा के क्षेत्र में वह पुरुष से कहीं ज्यादा सफल शिक्षिका बनती है मेडिकल के क्षेत्र में वह ममतामयी डॉक्टर और नर्स भी बनती है। क्योंकि उसकी स्वाभाविक करुणा और ममता, मातृत्व भावना उसे कर्तव्य के प्रति अधिक जागरूक बनाती है। मासिक कुण्ठा और तनाव से निकल कर वह अपने बच्चों की शिक्षा और पालन-पोषण अधिक अच्छे ढंग से करती है। अपने घर को अच्छे ढंग से संभालती या व्यवस्था करती है। वह डर और भय के कल्पित लोक से निकल कर, स्कूल, कॉलेज, विश्वविद्यालय, विदेश, ऑफिस, आकाश और समुद्र तक अपने विकास को ले जाती है। समाज के संतुलित और सम्यक विकास के लिए यह आवश्यक है।

उपसंहार- दो बातें आज की नारी के बारे में कहना भी अनुचित न होगा। स्वतन्त्र भारत की मातृशक्ति शिक्षित हो रही है। यह बात देशवासियों के लिए गौरव की है। पर आज की नारी-शिक्षा हमारी मातृशक्ति को न तो स्वस्थ तन दे रही है न मन। कहां है सीता का तेज, जो एक वर्ष रह कर भी रावण के चंगुल से बच कर आई थी ? कहां है राजपूतनियों का साहस जो हँसते हँसते पतियों को युद्धक्षेत्र में भेजती थीं ? कहां है दोनों हाथों से तलवार चलाने वाली झांसी की रानी ? कहां है अपने पति को ठीक राह पर लागे वाली तुलसी दास की पत्नी रत्नावली ? कहां है मां जीजाबाई जिस ने शिवा जी जैसे वीर पैदा किए ? कहाँ हे सती सारन्धा जिसने गुलाम होने से पहले अपने और अपने पति के छुरा घोंप दिया ? ।

नारी-शिक्षा दिनों-दिन बढ़े, पर वह ऐसी शिक्षा हों जो भारतीय संस्कृति के अनुरूप हो। भारत की नारी आदर्श मां, आदर्श बहिन, आदर्श पुत्री, आदर्श पत्नी बन सके। उसमें वह शक्ति हो जो दुष्ट की दृष्टि के चंगुल से उसे बचा सके, न कि चूहे के खटखट करते ही होश हो जाए। वह समय पर फूल जैसी कोमल और पत्थर जैसी कठोर भी हो। तभी हमारी नारी-शिक्षा सफल होगी।

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