श्री सत्यनारायण व्रत कथा, विधि- Shri Satyanarayan Vrat Katha in Hindi

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श्री सत्यनारायण व्रत कथा, विधि- Shri Satyanarayan Vrat Katha in Hindi

Satyanarayan Pooja Vidhi in Hindi  ( श्री सत्यनारायण व्रत पूजा विधि )

श्री सत्यनारायण व्रत किसी भी दिन किया जा सकता है। फिर भी हमारे देश में प्रायः पूर्णमासी के दिन श्री सत्यनारायण की कथा कराने का अधिक प्रचार है।

प्रातःकाल ही इस व्रत का संकल्प लेकर दिन-भर निराहार रहकर विष्णु भगवान का ध्यान और गुणगान करते रहे। सायंकाल स्नान करक पजन की तैयारी करे। केले के खम्भों और आम के पत्तों के वन्दनवारों से एक सुन्दर मण्डप बनाकर सुन्दर चौकी पर भगवान की प्रतिमा की स्थापना करे। पास ही कलश गणेश जी और नवग्रह भी स्थापित करके षोड्शोचार से पूजन करे पश्चात् ध्यान पूर्वक कथा सुने।।

Shree Satyanarayan Vrat Katha सत्यनारायण व्रत कथा

एक बार नैमिषारण्य में तपस्या करते हुए शौनकादि ऋषियों ने सूतजी से पूछा कि जिसके करने से मनुष्य मनोवांछित फल प्राप्त कर सकता है, ऐसा व्रत या तप कौन सा है ? सूतजी ने कहा कि एक बार श्री नारद जी ने भी श्री विष्णु भगवान से ऐसा ही प्रश्न किया था। तब श्री विष्णु भगवान ने उनके सामने जिस व्रत का वर्णन किया था, वही मैं आपसे कहता हूं।

प्राचीन काल में काशीपुरी में एक अति निर्धन और दरिद्र ब्राह्मण रहता था। वह भूख-प्यास से व्याकुल हो भटकता फिरता था एक दिन उसकी दशा से व्यथित होकर विष्णु भगवान ने बूढ़े ब्राह्मण के रूप में प्रकट होकर ब्राह्मण को सत्यनारायण व्रत का विस्तारपूर्वक विधान बतलाया और अन्तर्धान हो गये।

ब्राह्मण अपने मन में श्री सत्यनारायण व्रत करने का निश्चय करके घर लौट आया और इसी चिन्ता में उसे रात-भर नींद नहीं आई। सवेरा | होते ही वह सत्यनारायण के व्रत का संकल्प करके भिक्षा मांगने के लिए। | चल दिया। उस दिन उसे थोड़े ही परिश्रम में बहुत अधिक धन-धान्य भिक्षा में प्राप्त हुआ। सांयकाल घर पहुंचकर उसने बड़ी श्रद्धा के साथ श्री त्यनारायण भगवान का विधिपूर्वक पूजन किया। भगवान सत्यदेव की कृपा से वह थोड़े ही दिनों में धनवान हो गया। वह जब तक जीवित रहा तब तक महीने के महीने श्री सत्यनारायण का व्रत और पजन करता रहा। यह देह छोड़ने के बाद वह विष्णुलोक को गया।

सूतजी पुनः बोले कि एक दिन वह ब्राह्मण अपने बन्धु-बान्धुवों के साथ बैठे ध्यान मग्न हो श्री सत्यदेव की कथा सुन रह थे। तभी भूख-प्यास से व्याकुल एक लकड़हारा वहां जा पहुंचा। वह भी भूख प्यास भूलकर कथा सुनने बैठ गया। कथा की समाप्ति पर उसने प्रसाद ग्रहण किया और जल पिया। फिर उसने ब्राह्मण से इस कथा के बारे में पूछा तो उसने बताया कि यह सत्यनारायण जी का व्रत है जो मनोवांछित फल देने वाला है। पहले मैं बहुत दरिद्र था। इस व्रत के प्रभाव से ही मुझे यह सब वैभव प्राप्त हुआ है। यह सुनकर लकड़हारा बहुत प्रसन्न हुआ और मन-ही-मन श्री सत्यनारायण के व्रत और पूजन का निश्चय करता हुआ लकड़ी बेचने के लिए बाजार की ओर चल पड़ा। उस दिन लकड़हारे को लकड़ियों का दुगुना दाम मिला। उन्हीं पैसों से उसने केले, दूध, दही आदि पूजन की तमाम सामग्री खरीद ली और घर चला गया। घर पहुंचकर उसने अपने कुटुम्बियों और पड़ोसियों को बुलाकर विधिपूर्वक सत्यनारायण का पूजन किया। सत्यनारायण की कृपा से वह थोड़े ही दिनों में सम्पन्न हो गया।

सूतजी ने फिर कहा कि प्राचीनकाल में उल्कामुख नाम का एक राजा हो गया है। वह और उसकी रानी दोनों बड़े धर्मनिष्ठ थे। एक समय राजारानी भद्रशीला नदी के किनारे श्री सत्यनारायण की कथा सुन रहे थे कि एक बनिया भी वहां आ पहुंच गया। उसने रत्नों से भरी अपनी नौका को एक किनारे पर लगा दिया और स्वयं पूजा की जगह पर गया। वहां का चमत्कार देख उसने राजा से इसके बारे में पूछा। राजा ने बताया कि हम विष्णु भगवान का पूजन कर रहे हैं। यह व्रत सभी मनोकामनाएं पूर्ण करने वाला है। राजा के वचन सुन और प्रसाद पा बनिया अपने घर चला आया।

घर पहुंचकर उसने अपनी पत्नी से व्रत का सब वृत्तान्त कहा और संकल्प किया कि मैं भी सन्तान होने पर यह व्रत करूंगा। उसकी पत्नी का नाम लीलावती था। सत्यदेव की कृपा से वह कुछ ही दिनों बाद गर्भवती हो गई और दस महीने पूरे होने पर उसने एक कन्या को जन्म दिया। कन्या का नाम कलावती रखा गया और वह चन्द्रमा की कलाओं के समान नित्यप्रति बढ़ने लगी। एक दिन अवसर पाकर लीलावती ने अपने पति को सत्यदेव का व्रत करने की बात याद दिलाई तो उसने कहा कि मैं यह व्रत कन्या के विवाह के समय करूंगा। यह कहकर बनिया अपने कारोबार में लग गया। जब कन्या विवाह के योग्य हो गई तो उसने दूतों द्वारा खोज कराकर कंचनपुर नगर के एक बनिये के सुन्दर सुशील और गुणवान बालक के साथ विवाह कर दिया। फिर भी बनिये ने सत्यनारायण का व्रत नहीं किया। इससे श्री सत्यनारायण अप्रसन्न हो गये।

कुछ दिनों बाद बनिया अपने दामाद को साथ लेकर समुद्र के किनारे रत्नसारपुर में व्यापार करने लगा। एक दिन रनसारपुर के राजा चन्द्रकेतु के खजाने से चोरों ने बहुत-सा धन चुरा लिया। राजा के सिपाही चोरों का पीछा कर रहे थे। चोरों ने जब देखा कि सिपाहियों से बचना कठिन है तो उन्होंने राज–कोष से चुराये हुए तमाम धन को एक जगह फेंक दिया और स्वयं भाग गये। वहीं बनिये का डेरा था। सिपाही चोरों को ढूंढते हुए उसी जगह पहुंच गये और उन्होंने दोनों बनियों को चोर समझ कर पकड़ लिया। राजा ने दोनों बनियों को जेल में डालने का आदेश दिया और उनका धन कोष में जमा करा दिया।

श्री सत्यदेव के कोप से लीलावती और कलावती भी बड़े दुख से दिन काट रही थीं। एक दिन कलावती भूख-प्यास से बहुत व्याकुल होकर एक मन्दिर में चली गई। वहां श्री सत्यनारायण की कथा हो रही थी। वहीं बैठकर उसने कथा सुनी प्रसाद लेकर रात होने पर घर पहुंची। माता के देरी का कारण पूछने पर उसने सब बात कह दी। उसकी बात सुनकर लीलावती को अपने पति की भूली बात याद आ गई और उसने श्री सत्यदेव के व्रत का निश्चय किया। उसने अपने बंधु-बान्धुओं को बुलाकर श्रद्धापूर्वक कथा सुनी और विनभ्र भाव से आर्त होकरं प्रार्थना की कि मेरे पति ने संकल्प करके भी जो आपका व्रत नहीं किया उसी से आप अप्रसन्न हुए थे। अब कृपा करके उसका अपराध क्षमा करें। लीलावती की प्रार्थना से श्री सत्यदेव प्रसन्न हो गये।

उसी रात्रि में श्री सत्यदेव ने राजा चन्द्रकेतु को स्वप्न में दर्शन देकर कहा कि प्रातःकाल होते ही दोनों बनियों को जेल से छोड़ दो और उनका सभी धन उन्हें लौटा दो, वरना पुत्र पौत्र समेत तुम्हारा राज नष्ट हो जायेगा। इतना कहकर सत्यदेव तो अन्तर्धान हो गये और राजा ने भी सवेरा होते ही दोनों बनियों को मुक्ति का आदेश दिया। और साथ ही उनका धन उन्हें लौटा दिया और बहुत सम्मानपूर्वक उन्हें विदा किया।

दोनों बनिये आनंदित हो अपनी नौका लेकर घर की ओर चल पड़े। तभी श्री सत्यनारायण भगवान सन्यासी के वेश में उनके समीप आये और बोले कि तुम्हारी नौका में क्या है ? बनिये ने हंसते हुए उत्तर दिया कि नौका में लता-पत्रों के सिवाय और कुछ भी नहीं है। यह सुनकर दण्डी स्वामी ने कहा कि तुम्हारा वचन सत्य हो। स्वामी के चले जाने पर बनिये ने देखा कि नौका हल्की होकर ऊपर को उठ रही है। उसे बड़ा कुतूहल हुआ और देखा कि बेहोश होकर गिर पड़ा। किन्तु दामाद ने कहा कि इस प्रकार घबड़ाने से काम नहीं चलेगा। यह सब उन्हीं स्वामी की करामात है। चलकर उनसे प्रार्थना की जाय तो फिर वैसा ही हो जाएगा।दामाद की बात मानकर बनिया स्वामी के पास पहुंचकर उनके चरणों में गिर पड़ा और बार-बार उनसे क्षमा माँगने लगा। उनकी विनीत प्रार्थना से भगवान ने प्रसन्न होकर उसे इच्छित वरदान दिया और स्वयं उसी जगह अन्तर्धान हो गए। बनियों ने नाव के पास जाकर देखा तो वह धन रलों से भरपूर थी। तब उन्होंने वहीं श्री सत्यदेव का पूजन किया और कथा सुनी। फिर वह घर की ओर चल दिए।

अपने नगर के समीप पहुंचकर बनिए ने लीलावती के पास अपने आने का समाचार भेजा। लीलावती उस समय श्री सत्यनारायण की कथा सुन रही थी। उसने अपनी पुत्री कलावती से कहा कि तुम्हारे पति और पिता आ गये हैं। मैं उनके स्वागत के लिए चलती हूं, तुम भी प्रसाद लेकर शीघ्र ही नदी तट पर पहुंच जाना। कलावती प्रसन्नता के कारण इतनी विमुग्ध हो गई कि वह कथा का प्रसाद लेना भी भूल गई और तुरन्त ही नदी के तट की ओर दौड़ पड़ी। वह ज्योंही नदी के किनारे पहुंची त्योंही उसके पति समेत नौका जल में डूब गई। यह देख बनिया हाहाकार करके छाती पीटने लगा। लीलावती भी दामाद के शोक में विलाप करने लगी और कलावती अपने पति के खड़ाऊ लेकर सती होने को उद्यत हुई। तभी आकाशवाणी हुई कि हे वणिक ! तेरी कन्या सत्यनारायण के प्रसाद का निरादर करके पति से मिलने के लिए आतुर होकर दौड़ी आई है। यदि वह प्रसाद लेकर फिर आये तो उसका पति जी उठेगा। यह सुन कलावती घर की ओर दौड़ गई और श्री सत्यनारायण का प्रसाद लेकर नदी के किनार आई तो क्या देखती है कि उसके पति समेत नौका जल पर तैर रही है। यह देख बनिया भी प्रसन्न हो गया और अपने घर पहुंच गया। वह जब तक जीवित रहा तब तक श्री सत्येदव का व्रत करता तथा श्रद्धापूर्वक कथा सुनता रहा।

इसके पश्चात् सूतजी बोले कि एक समय तुङ्गध्वज राजा शिकार खेलने के लिए वन में गया हुआ था। वहां उसने देखा कि एक बरगद के वृक्ष के नीचे बहुत से गोप-ग्वाल इकट्ठे होकर सत्यनारायण की कथा सुन रहे हैं। राजा ने न तो सत्यनारायण को नमस्कार किया और न पूजन के पास ही गया। गोपगण राजा को देखकर स्वयं प्रसाद लेकर उसके पास आए और प्रसाद राजा के सामने रख दिया। राजा ने प्रसाद की कुछ परवाह न की और महल की ओर चला गया। राजद्वार पर पहुंचते ही राजा को मालूम हुआ कि उसके पुत्र-पौत्र और धन-सम्पत्ति सब नष्ट हो गये हैं। उसे वन की घटना स्मरण हो आई और उसने विचार किया कि श्री सत्यदेव के प्रसाद का निरादर करने के कारण ही मुझे यह दुःख प्राप्त हुआ है। यह सोचकर राजा पुनः वन में दौड़ा गया और सब गोप-ग्वालों के साथ मिल कर श्रद्धा और भक्ति के साथ श्री सत्यदेव का पूजन करके प्रसाद ग्रहण किया। इसके बाद वह घर पर लौट आया तो उसके मृत पुत्र पौत्रादि भी जी उठे और नष्ट हुई सम्पत्ति भी ज्यों की त्यों हो गईं। तब से राजा जीवन भर समय-समय पर श्री सत्यदेव का व्रत और पूजन करता रहा।

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