Essay on Guru Gobind Singh Ji in Hindi- गुरु गोबिन्द सिंह जी पर निबंध

In this article, we are providing Essay on Guru Gobind Singh Ji in Hindi- गुरु गोबिन्द सिंह जी पर निबंध- जीवन परिचय, जीवन की प्रमुख घटनाएँ, बहुमुखी व्यक्तित्व & Guru Gobind Singh Biography / History in Hindi

Essay on Guru Gobind Singh Ji in Hindi- गुरु गोबिन्द सिंह जी पर निबंध

भूमिका- भारतीय इतिहास के पृष्ठों के दशमेश गुरु गोबिन्द सिंह जी का नाम अमिट है। उनका जन्म गीता के उस कथन का समर्थन करता है जिसके अनुसार जब-जब संसार में अत्याचार और अन्याय बढ़ जाता है, पाप प्रधान हो जाता है, तो ईश्वर या उसका अंश किसी महापुरुष के रूप में अवतरित होकर मुक्ति दिलाता है। देश, धर्म और मानवता के लिए आजीवन संघर्ष करने वाले गुरु गोबिन्द सिंह इसी प्रकार अवतरित पुरुष थे। सभी प्रकार के भेद भावों से परे, सन्त, सिपाही गुरु गोबिन्द सिंह सिख धर्म के लिए नहीं अपितु अखिल मानवता के लिए ज्योति पूँज थे। उनके व्यक्तित्व के सम्बन्ध में कबीर का यह कथन सत्य प्रतीत होता है-

सूरा सोई सराहिए, जो लड़े दीन के हेत,

पुरजा-पुरजा कट मरे, कबहुँ न छाँडे खेत।।

जीवन परिचय : 1. जन्म-श्री गुरु गोबिन्द सिंह जी का जन्म 26 दिसम्बर 1666 को बिहार की राजधानी पटना में हुआ-

तही प्रकाश, हमारा भयो,

पटने शहर में भव लयो।।

उनके पिता का नाम श्री गुरु तेग बहादुर और माता का नाम गुजरी था। उसका बचपन का नाम गोबिन्द राय था।

बाल्यकाल-  गुरु गोबिन्द सिंह जी पटना में 5 वर्ष की अवस्था तक रहे। उसके बाद अपने पिता के द्वारा बसाए नगर आनन्दपुर में रहने लगे। बचपन में उन्हें देखकर सैय्यद भीखन शाह ने कहा था—“यह तो कोई अशी हस्ति है।”

शिक्षा-दीक्षा- बालक गोबिन्द राय के व्यक्तित्व के पूर्ण विकास के लिए पिता ने शिक्षा की समुचित व्यवस्था की। उन्हें पंजाबी, फारसी तथा संस्कृत की शिक्षा देने के लिए अलग-अलग शिक्षक नियुक्त किए गए। सैनिक शिक्षा देने के लिए राजपूत सैनिक बाज सिंह को नियुक्त किया गया। आनन्दपुर साहिब में रहकर उन्होंने लगभग 18 वर्ष तक शस्त्र और शास्त्र की शिक्षा द्वारा अपना शारीरिक और मानसिक विकास किया।

उनके बाल्यकाल की प्रमुख घटनाएं उनके महान् भविष्य की ओर संकेत करती हैं। नवाब की सवारी के सामने न झुकना उनकी निर्भीकता का प्रमाण है। दूसरी प्रमुख घटना उस समय की है जब मुगलों के दमन चक्र से भयभीत होकर कुछ कश्मीरी पण्डित उनके पिता से सहायता मांगने के लिए आए थे। पिता को चिन्तित मुद्रा में देखकर बालक ने उन्हें कर्तव्य-बोध कराया कि उनसे बढ़ कर कौन महापुरुष हो सकता है। पुत्र का यह उत्तर सुन कर पिता फूले न समाये। जब बालक गोबिन्द राय केवल 9 वर्ष के थे तो चांदनी चौक दिल्ली में उनके पिता का सिर त्याग की बलिवेदी पर समर्पित हुआ।

जीवन की प्रमुख घटनाएँ- उन्होने पिता की मौत का बदला लेने की सोची लेकिन कुछ सरदारों के कहने पर उन्होंने यह विचार त्याग दिया तथा आत्म शक्ति प्राप्त करने के लिए ध्यानावस्था में रहने लगे। लेकिन उपासना को ही उन्होंने जीवन लक्ष्य नहीं बनाया अपितु धर्म-ध्वजा के लिए निरन्तर संघर्ष करने लगे। पहाड़ी राजाओं के आक्रमणों का सामना पाउन्टा के स्थान के निकट किया तथा विजयी हुए।

मुगल सेना के साथ सन् 1704 ई. में आनन्दपुर में युद्ध हुआ जो बहुत लम्बे समय तक चला और किले में खाद्य-सामग्री का अभाव होने पर भी गुरु जी और उनके वीर सिपाही डटे रहे। कुछ सिखों ने उनका परित्याग भी कर दिया लेकिन बाद में वे अपना बलिदान देकर चालीस मुक्ते कहलाये। आनन्दपुर का किला छोड़ने पर चमकौर गढ़ी में फिर से मुगल सेना का सामना हुआ और गुरु जी को अपने साहिबज़ादे खोने पड़े। उनके दो छोटे साहिबजादे सरहिन्द के मुगल नवाब ने दीवार में चुनवा दिए। परन्तु वह अपने महान् उद्देश्य से जरा भी विचलित न हुए। दक्षिण पंजाब में भ्रमण करते हुए वे नाभा, कोटकपूरा, मुक्तसर, जैजों तथा नांदेड़ आदि स्थानों पर घूमते रहे।

अपने शिष्यों को संगठित करने के लिए उन्होंने सन् 1699 के वैशाखी के दिन खालसा । पंथ की सृजना की। इसका उद्देश्य जाति प्रथा के भेदभाव को मिटाना तथा धर्म को नई दिशा प्रदान करना था।

सरहिन्द के नवाब ने गुरु जी के प्राण लेने के लिए अपने दो विश्वसनीय व्यक्ति नियुक्त किए थे। एक बार जब गुरु जी अपने आश्रम में लेटे थे तो उन व्यक्तियों ने गुरु जी के पेट में छुरा घोप दिया। अपनी कृपाण से गुरु जी ने एक को वहीं ढेर कर दिया। उनका घाव भर तो गया पर कुछ समय बाद धनुष पर चिल्ला चढ़ाते समय उनका घाव फट गया और वे परम धाम को चल बसे।

बहुमुखी व्यक्तित्व– गुरु गोबिन्द सिंह ने अपने बहुमुखी व्यक्तित्व से अपने युग को नई दिशा प्रदान की। श्री गुरु गोबिन्द सिंह निष्ठावान, धर्म प्रर्वतक, सशक्त समाज सुधारक, क्रांतिकारी, लोक नायक, साहसी योद्धा और आशावादी राष्ट्र नायक थे। सेवा त्याग सदाचार के द्वारा सत्य की उपलब्धि को जीवन का चरम लक्ष्य मानने वाले सिखों में उन्होंने वीर भावना का संचार किया तथा स्वयं अन्याय और अत्याचारों के विरुद्ध युद्ध करते रहे। उनकी कामना थी।

देहि शिवा वर मोहि इहै, शुभ कर्मन ते कबहुँ न टरौ।

न डरौ अरि सौ, जब जाय लरौ निसचै करि अपनी जीत करौ।

अरू सिखहौ अपने ही मन को यह लालच हो मुख तौं उचरौ।

जब आव की औघ निदान बनै अति ही रणमें तब जूझ मरौ।

उनके व्यक्तित्व का एक भव्य पक्ष उनका कवि रूप भी है। उनका शरीर पर्वत के समान कठोर था। परन्तु उनके हृदय में दया का झरना भी बहता था। अपने दरबार में उन्होने अनेक कवियों को सम्मानित किया तथा भारतीय संस्कृति से सम्बन्धित अनेक ग्रन्थों की रचना भी। करवाई। उन्होंने स्वयं भी काव्य की रचना की और उनका काव्य दशम ग्रंथ के नाम से प्रसिद्ध है, जिसमें जाप साहिब, अकाल स्तुति, विचित्र नाटक, चौबीस अवतार, चंडी चरित्र, चंडी वार शस्त्रनामाल आदि रचनाएं संकलित हैं।

संसारिक लोभ और मोह से गुरु गोबिन्द सिंह अलग थे। उन्होने पंथ को सुदृढ़ ही नहीं। किया अपितु गुरुमता भी दी। उनकी गुरुमता के दो प्रसंग अत्यन्त प्रसिद्ध हैं। जब कन्हैया । ने आनन्दपुर के युद्ध में घायल सिखों के अतिरिक्त शत्रुओं के सैनिकों को भी पानी पिलाया तो गुरुजी ने उसे अपना सच्चा शिष्य मानकर गले लगा लिया। और इसी प्रकार जब उनके पुत्रों को क्रूरता से मौत की गहरी नींद में सुला दिया गया तो उन्होंने शान्त होकर कहा।

इन पुत्रन के सीस पर, वार दिए सुत चार,

चार मुए तो क्या हुआ, जब जीवित कई हज़ार, ।

उपसंहार- समस्त मानव जाति के प्रति उनमें अपार प्रेम था। लंगर प्रथा का सूत्रपात । कर उन्होंने सामाजिक विषमता को मिटाने का प्रयास किया। वे एक गत्यात्मक समाज की स्थापना करना चाहते थे। उनकी अरदास में लोक-मंगल की कामना थी। वे सामाजिक, राजनैतिक, धार्मिक किसी भी प्रकार के शोषण और अत्याचार के प्रबल-विरोधी थे। उनका । उपदेश, धर्म यही था कि समस्त मानव जाति एक है।

मानुस की जाति समै एकै पहिचानवो,

दूसरो न भेद कोई अम मानवो।

Essay on Guru Nanak Dev Ji in Hindi

ध्यान दें– प्रिय दर्शकों Essay on Guru Gobind Singh Ji in Hindi आपको अच्छा लगा तो जरूर शेयर करे

Loading...

2 comments

  1. Best essay for big classes because I read in 7th std in D.A.V.school and my teacher ask me to write down essay of 2 and half pages but this essay is more than of 3 pages when I gave essay to my teacher she was surprised and ask me WOW!BRILLIANT! and say clapping for me to all students of class.THANK YOU FOR THIS BIG ESSAY.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *