Essay on Independence Day in Hindi- स्वतंत्रता दिवस पर निबंध

In this article, we are providing an essay on Independence Day in Hindi. In this essay, you get to know- History of Independence Day in Hindi and why we celebrate Independence Day/15 August. इस निबंध में आपको पता लगेगा की हम स्वतंत्रता दिवस कब, क्यों और कैसे मानते है। Swatantrata diwas हमारा राष्ट्रीय पर्व है।

Essay on Independence Day in Hindi- स्वतंत्रता दिवस पर निबंध

जिसको न निज गौरव तथा निज देश का अभिमान है।

वह नर नहीं नरपशु निरा है और मृतक समान है।

भूमिका- उन अमर शहीदों के चरणों में कोटिश: प्रणाम है, जिन्होंने अपने जीवन को स्वतन्त्रता संग्राम के यज्ञ में आहुति के रूप में समर्पित किया है। पराधीनता की कालिमामय रात को चीर कर स्वतन्त्रता का जो सूर्य आकाश-मण्डल में उदित हुआ है, उसके आलोक में जीवन पुष्प खिल उठा। आशा और आकांक्षा का सौरभ बिखर पड़ा, हर्ष-निनाद करते हुए अमर गुन्जार कर उठे। 15 अगस्त, 1947 ई. को नव-जीवन का सन्देश लेकर स्वर्णिम विहान भारतीय धरा पर उतरा और 26 जनवरी, 1950 ई. को भारतीय गणतन्त्र का भव्य, सुदृढ़ प्रासाद निर्मित हुआ। अपनी ही धरती और अपने ही आकाश के नीचे, अपनी ही नदियों, अपने ही खेतों, अपने ही सूर्य और अपने ही चाँद से आततायी अंग्रेज़ों ने हमें दूर कर दिया था। पर स्वतन्त्रता की देवी ने हमारा खोया वैभव पुन: हमें सौंप दिया।

स्वतंत्रता का अर्थ- स्वतंत्रता का अर्थ मानसिक, शारीरिक, आर्थिक तथा अपने-आप नैतिक विधि-विधान से सम्पन्न निर्णय तथा विचार ग्रहण करना है। केवल शारीरिक अथवा शासन की दृष्टि से स्वतंत्रता का पूर्ण अर्थ नहीं माना जा सकता। जहां, जिस राज्य में, जिस राष्ट्र में प्रत्येक व्यक्ति अपने मौलिक अधिकार प्राप्त करता है, तथा अपने कर्तव्य को नैतिक स्तर पर निभाता है, वही राज्य, वही राष्ट्र, वही शासन पद्धति पूर्ण रूप से स्वतन्त्र मानी जा सकती है। किसी पशु को बांध कर रखने और स्वतन्त्र रूप से उसे फिर खुला छोड़ देने में, मनुष्य की स्वतन्त्रता की कल्पना और तुलना नहीं की जा सकती। स्वतंत्रता हमारी शिरा और धमनियों में बहने वाले रक्त और हृदय के स्पंदनों की भांति है। इन उदार भावनाओं से शून्य व्यक्ति मृत होता है, पत्थर हृदय होता है

जो भरा नहीं है भावों से,

बहती जिसमें रसधार नहीं।

हृदय नहीं, वह पत्थर है,

जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं।

कविवर तुलसीदास जी ने भी कहा है-

पराधीन सपनेहुँ सुख नाहीं।

किसी अन्य कवि के शब्दों में भी-

बस एक क्षण की दासता शत कोटि नरक समान है।

पृष्ठभूमि- अनन्त बलिदानों की गाथा-भारत की शस्य-श्यामला धरा को मुसलमान तथा अंग्रेज़ जैसे अत्याचारी शासकों ने लगभग 500 वर्ष तक अपने अपवित्र कार्यों से अपावन कर दिया था। मुसलमानों के बाद अंग्रेज़ों ने भारत को गुलामी की जंज़ीरों में जकड़ा। गुलामी की जंज़ीरों में बंधे भारतीय उसी दिन से उस जाल को काटने के लिए अनवरत प्रयास करते रहे। इस पुनीत संग्राम का, ‘श्री गणेश’ झांसी की रानी ‘लक्ष्मीबाई के कर-कमलों से हुआ। संघर्ष की इस ज्वाला में बालक-वृद्ध, युवा-युवती, नर-नारी, सभी झुलसते रहे। बलिदान की इस माला में भगत सिंह, चन्द्रशेखर आज़ाद, राजगुरु, सुखदेव, बटुकेश्वर दत्त, खुदीराम महात्मा गांधी, पं. जवाहर लाल नेहरु जैसे स्वतन्त्रता सेनानियों के ही रत्न नहीं पिरोये हैं, अपितु इनकी संख्या अनगिनत है। अनगिनत माताओं की गोद सूनी हुई, अनगिनत पत्नियों के भाग्य का सिन्दूर मिट गया और अनन्त बहनों के भाई स्वतन्त्रता की बलि वेदी पर चढ़कर अमर-गति को प्राप्त हुए। अनेक परिवार इस पवित्र यज्ञ की अग्नि में जल कर राख हो गए।

जलियावाला बाग़’ ‘कामा- मारू, साइमन कमिशन का विरोध, ‘ भारत छोड़ो आंदोलन, विदेश वस्त्रो की होली जलाओ’ तथा अनेक सत्याग्रह इस संगर्ष की रोमांचक कहानी सुनाते हैं। अनन्त बलिदानों के उपराम का पुनीत दिवस 15 अगस्त, 1947 भारतवासियों के लिए सुखद समाचार ले कर आया। शताब्दियों से खोई हुई स्वतन्त्रता असंख्य दीपों में फिर लौट आई।

स्वतंत्रता दिवस समारोह-

हर वर्ष ऐ दिवस आओ तुम खुशी में झूमते से।

देख लहराते तिरंगे नील नभ को चूमते से।

राष्ट्रीय स्तर पर- राष्ट्रीय स्तर पर स्वतंत्रता दिवस समारोह का कार्यक्रम देश की राजधानी नई दिल्ली में मनाया जाता है। लाल किले के प्राचीर पर प्रधानमन्त्री ध्वजारोहण करते हैं तथा लहराते हुए तिरंगे के नीचे से राष्ट्र के नाम सन्देश प्रसारित करते हैं। वे उन प्रात: स्मरणीय शहीदों को भाव पूर्ण श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं, तथा राष्ट्र को सुखी और समृद्ध बनाने का संकल्प करते हैं। विभिन्न राज्यों की राजधानियों में भी राजकीय स्तर पर यह समारोह मनाया जाता है। मुख्यमन्त्री अपने-अपने राज्यों में नई योजनाओं की घोषणा करते हैं। जिसके माध्यम से राष्ट्र में सम्पन्नता, साक्षरता तथा समता लाने का प्रयास किया जाता है।

स्थानीय स्तर पर– यह राष्ट्रीय पर्व नगर और ग्राम, स्कूल तथा कॉलिजों में भी मनाया जाता है। प्रभात भेरी की धुन तथा गगन-भेदी नारों से इसका शुभारम्भ होता है, तथा ध्वजारोहण, राष्ट्रीय गान का गायन और पुन: भिन्न-भिन्न क्षेत्रों में भिन्न-भिन्न कार्यों से सम्पन्न होता है। विद्यालयों में विभिन्न प्रकार के सांस्कृतिक कार्यक्रम तथा अन्य प्रतियोगिताएं आयोजित की जाती हैं। मिष्ठान् वितरण का कार्यक्रम इन गतिविधियों को सुमधुर बना देता है। दूरदर्शन और आकाशवाणी के माध्यम से इन कार्यक्रमों का प्रसारण किया जाता है।

हमारे विद्यालय में भी इस पुनीत अवसर पर समारोह का आयोजन किया जाता है। प्राधानाचार्य ध्वजारोहण करते हैं। नगर के गणमान्य लोग इस अवसर पर हमारे स्कूल द्वारा आमन्त्रित होते हैं। वे छात्रों को अपना सन्देश देते हैं। राष्ट्र प्रेम के गीत, कविताएं तथा शहीदों की स्मृति दिलाते हुए बच्चों के भाषण प्रस्तुत किये जाते हैं। इसके पश्चात् अतिथि विजेताओं तथा योग्य बच्चों को पुरस्कार देते हैं।

नगर और ग्राम संध्या के आगमन पर दीपमाला के आलोक से आलोकित हो उठते हैं। विभिन्न रंगों का प्रकाश स्वतंत्रता संग्राम की उज्जवल गाथा प्रकट करता है।

राष्ट्र और संस्कृति प्रेमी, नर-नारी, युवक-युवती सभी भाव-विभोर हो उठते हैं। सम्पूर्ण राष्ट्र अमर शहीदों की स्मृति में अपनी पावन श्रद्धांजलि अर्पित करता है तथा उन्हें नमन करता है। वस्तुत: यह दिवस हमारे संकल्प का दिवस है, जब हम सभी प्रतिज्ञा करते हैं कि हम अपनी महिमामयी संस्कृति को नहीं भूलेंगे। वतन पर मर मिटने वालों की स्मृति हमें सन्देश देती है कि हम भी उनके चरण-चिन्हों पर चल कर देश के गौरव को बना कर रखें। कवि की यह पंक्तियां याद हो आती है

शहीदों की चिताओं पर, लगेंगे हर बरस मेले।

वतन पे मिटने वालों का, यही बाकी निशी होगा।

उपसंहार- स्वतंत्रता दिवस एक ओर जहां हर्ष और उल्लास का सन्देश ले कर आता है, दूसरी ओर शहीदों का स्मरण कराता है तथा भविष्य के प्रति हमें जागरूक करता है। जिन वीरों को आततायिओं ने खिलने से पहले कुचल दिया था, उनकी स्मृति में सभी भाव-विभोर हो जाते हैं।

इस पावन पर्व पर हमें निष्पक्ष रूप से सोचने की आवश्यकता है कि क्या हम सही अर्थों में स्वतन्त्र हो सके हैं ? क्या शासक, अधिकारी एवं प्रजा स्वतन्त्रता के अर्थ को समझती है ? जब तक देश भुखमरी, निर्धनता, निरक्षरता के आंसुओं से ग्रस्त होता रहेगा, तब तक स्वतन्त्रता की देवी की अराधना सही अर्थों में नहीं हो सकेगी। इस वीर-भोग्या वसुन्धरा को तभी स्वतन्त्र कहा जाएगा, जब हम आर्थिक, सामाजिक, नैतिक और धार्मिक क्षेत्रों में स्वतन्त्र हो सकेंगे। आज भी हमारी कामना का यह रूप होना चाहिए

मुझे तोड़ लेना बन माली,

उस पथ पर तुम देना फेंक।

मातृ-भूमि पर शीश चढ़ाने,

जिस पथ जावे वीर अनेक।

हिंदी में स्वतंत्रता दिवस पर निबंध- Long essay on Independence Day in Hindi

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