Essay on Diwali in Hindi- दिवाली पर निबंध

दिवाली पर निबंध- इस निबंध के द्वारा जानिए दिवाली त्योहार क्यों और कब मनाया जाता है। Essay on Diwali in Hindi. Here we providing an full information about Diwali in Hindi – why we celebrate Diwali/Deepavali and history of Diwali in Hindi.

Essay on Diwali in Hindi- दिवाली पर निबंध

Diwali Essay in Hindi ( 200 words )

भारत में सभी त्योहार बहुत ही हर्ष और उल्लास के साथ मनाए जाते हैं जिनमें से दिपावली हिंदुओं का सबसे प्रमुख त्योहार है। यह बौद्ध, जैन और सिक्ख धर्म के लोगों के द्वार भी मनाया जाता है। जब भगवान श्री राम चौदह वर्ष का बनवास काटकर अयोद्धया लौट आए थे तब सभी ने घी के दीपक जलाकर उनका स्वागत किया था और तभी से यह दिपावली का पर्व मनाया जा रहा है। यह हर साल कार्तिक माह की अमावस्या को मनाया जाता है। यह अक्टूबर या नवंबर में आता है। इस दिन जगमगाती हुई दियों की रोशनी अंधकार को खत्म कर देती है। यह त्योहार रोशनी का त्योहार है और इस दिन से सर्दियों का आगमन भी हो जाता है।

दिपावली की रात को गणेश लक्ष्मी जी की पूजा की जाती है और घर पर तरह तरह के व्यंजन बनाए जाते हैं। इस दिन लोग एक दुसरे को मिठाईयाँ भी देते हैं और खुशियाँ मनाते हैं। बच्चे और बड़ो के द्वारा बम पटाखे आदि भी जलाए जाते हैं। दिपावली का त्योहार सबके जीवन को एक नई उमंग और उम्मीदों से भर जाता है। हम लोगों को सिर्फ दिया ही जलाने चाहिए ताकि दिया बेचने वाले भी इस त्योहार को खुशी से मना सके।

Long Essay on Diwali in Hindi Language ( words 1200 )

दीपावली त्यौहार है, दीप की अनवरत साधना का।

अज्ञान की अमा में, सत्य की चिर आराधना का।।

भूमिका- हमारा देश प्राकृतिक सौन्दर्य से मण्डित देश है। हिमाच्छादित उतग पर्वत श्रेणियां, कल-कल और छल-छल का स्वर करती हुई बहती नदियां, दूर-दूर तक फैले हुए हरे-भरे वन, गरजता सिंधु, विभिन्न ऋतुओं के आगमन से सजता-संवरता हमारा देश विश्व में अनोखा देश है। केवल प्राकृतिक सुषमा ही इसे अलंकृत नहीं करती है अपितु इसकी गौरवमयी संस्कृति भी इसे गौरव-मण्डित करती है। किसी देश और जाति का महत्व उसकी संस्कृति पर ही निर्भर करता है। हमारे देश की संस्कृति अनेक कारणों से विश्व संस्कृतियों में शीर्षस्थ है। विभिन्न प्रकार के त्यौहार और पर्व इसके ही अंग होते हैं। दीपावली भी इसी प्रकार का त्यौहार है जिसकी पृष्ठभूमि में हमारी संस्कृति के अनेक प्रसंग छिपे हुए हैं।

दीपावली का अर्थ- दीपावली संस्कृत भाषा का शब्द है। जिसका अर्थ है-दीप+आवली अर्थात् दीपों की पंक्तियां। स्पष्ट है कि यह त्यौहार प्रकाश का त्यौहार है, दीपों का त्यौहार है, विजय का त्यौहार है, ज्ञान का त्यौहार है। जिस प्रकार दीपक का प्रकाश अंधकार को दूर करता है उसी प्रकार ज्ञान का प्रकाश भी अज्ञान के अंधकार को विदीर्ण करता है।

इस त्यौहार को मनाने के लिए विशेष रूप से मिट्टी के दीपकों में तेल डालकर, रूई की बाती से उन्हें जलाते हैं। आधुनिक युग का रंगीन प्रकाश यद्यपि अपनी विशेष शोभा रखता है तथापि छोटे-छोटे दीपकों की छटा निराली ही होती है।

पृष्ठभूमि- दीपावली का त्यौहार अनेक प्रसंगों से जुड़ा हुआ है। सनातन धर्म को मानने वाले लोगों का विश्वास है कि भगवान् श्री राम 14 वर्ष का बनवास समाप्त कर अयोध्या आए और उनका राज्याभिषेक हुआ। इसी खुशी में अयोध्यावासियों ने घृत्-दीप जलाकर उनका स्वागत किया। कृष्ण के चरित्र से भी दीपावली का प्रसंग जुड़ता है। लोगों का विश्वास है कि भगवान् कृष्ण ने इससे एक दिन पूर्व नरकासुर का वध किया था। इसी दिन भगत वत्सल नृसिंह भगवान् ने हिरण्य कश्यपु का वध करके अपने भक्त प्रहलाद की रक्षा की थी। इसी दिन समुद्र-मंथन से लक्ष्मी जी प्रकट हुई थी। इन्द्र का गर्व चूर करने हैलए गढ़लवासियों से भगवान् कृष्ण ने इसके एक दिना परवा गवर्धन पूण करवाई

इस पावन त्यौहार की पृष्ठभूमि से अन्य प्रसंग भी जुड़े हुए हैं। सिक्खों के छठे गुरु हरगोबिन्द जी जहांगीर के कारागार से इसी दिन मुक्त हुए तथा सिखों ने अपनी प्रसन्नता गुरुद्वारों तथा घरों में दीप जलाकर प्रकट की। जैनियों के 24वें तीर्थकर महावीर स्वामी, आर्य समाज के प्रवक्ता महर्षि दयानन्द जी तथा स्वामी रामतीर्थ का निर्वाण भी इसी दिन हुआ था।

कुछ लोगों का विश्वास है कि भगवान् विष्णु ने राजा बलि की दानशीलता की परीक्षा लेने के लिए वामनावतार लिया था तथा राजा बलि से केवल तीन पग वसुधा की याचना की। उन्होंने तीन ही पगो में तीन लोक नाप लिए। राजा बलि की दानशीलता से प्रशन्न होकर भगवान् विष्णु ने उन्हें वरदान दिया कि पृथ्वीवासी उनकी स्मृति में दीपों का त्यौहार मनाएंगे।

जनश्रुति है कि महामाया दुर्गा ने असुरों का वध किया परन्तु उनका क्रोध शान्त नहीं हुआ और वह संसार का संहार करने के लिए तत्पर हो गई। उनका क्रोध शान्त करने के लिए शिव उनके चरणों में लेट गए और उनके पवित्र शरीर के स्पर्श से ही दुर्गा का क्रोध शान्त हो गया और संसार विनाश से बच गया। इसी उपलक्ष्य में दीपावली का त्यौहार मनाया जाता है।

हमारा देश कृषि-प्रधान देश है और यह पर्व भारतीय कृषि समाज के लिए भी समृद्धिपूर्ण नवजीवन का संदेश लेकर आता है। इस समय तक किसानों की खरीफ की फसल कट कर घर आ जाती है और घर धन-धान्य से भर जाता है। किसान का मन मयूर नाच उठता है।

इस प्रकार यह सांस्कृतिक पर्व अपनी पृष्ठभूमि में अनेक पौराणिक तथा ऐतिहासिक स्मृतियों से जुड़ा हुआ है।

त्यौहार मनाने की विधि– दीपावली का अभिनन्दन भारतवासी प्रफुल्लित होकर करते हैं। इसके प्रथम चरण में घरों, दुकानों और कार्यालयों की सफाई की जाती है। घर सीलन से भर जाते हैं तथा चारों ओर गंदगी के ढेर इकट्ठे होने से मक्खी तथा मच्छर भी पैदा हो जाते हैं। सफाई करने, रंग-रोगन करने से एक ओर घरों की शोभा बढ़ जाती है तो दूसरी ओर हानिकारक जीवाणु मर जाते हैं। व्यापारी वर्ग के लिए यह त्यौहार विशेष महत्व रखता है। वे इस दिन नए वित्तीय वर्ष का आरम्भ मानते हैं और अपने पुराने बही खातों को बदल कर नए बही खाते आरम्भ करते हैं। इस दिन वे लक्ष्मी-पूजन करते हैं। घर और दुकानों की सजावट के लिए बड़ी धनराशि व्यय करते हैं। तांत्रिक तथा योगी भी इस रात को अपनी सिद्धि के लिए उपासना करते हैं।

दीपावली से दो दिन पूर्व त्रयोदशी को धनतेरस कहा जाता है तथा लोग इस दिन बर्तन खरीदना शुभ मानते हैं। दर्जियों की दुकानों में भी भीड़ लगी रहती है। इस शुभ अवसर पर लोग नए-नए वस्त्र पहनते हैं। इस प्रकार दीपावली उत्सव का पहला चरण सफाई, साज-सजावट, नए वस्त्रों और बर्तनों के क्रय से आरम्भ होता है।

अपने यौवन में दीपावली का त्यौहार दूसरे चरण पर तब दिखाई देता है जब रात के समय में गहन अंधकार में दीपों की पंक्तियों जल उठती हैं। एक ओर बाजारों में सजी हुई दुकानें तथा दूसरी ओर हर घर में जलते हुए दीप। विभिन्न प्रकार के रंगीन प्रकाश में रात्रि रूपी नायिका अपना श्रृंगार करती है जिसका यौवन सभी को मुग्ध कर देता है। इसी चरण पर आतिशबाजी छोड़ने से नयनभिराम दृश्य उपस्थित होता है। घर में, गलियों में, मुहल्लों में तथा सड़कों में बच्चों का कोलाहल गूंजता है और पटाखों की आवाज़ सुनाई देती है। फुलझड़ियों के प्रकाश में शिशुओं के चेहरे खिल उठते हैं। छतों पर और मुंडेरों पर जलते हुए दीपकों की पंक्तियां सब का मन मोह लेती हैं।

जन-जन ने हैं दीप जलाए लाखों और हज़ारों ही।

धरती पर आकाश आ गया सेना लिए सितारों की।

छिप गई हर दीपक के नीचे आज अमावस काली।

सुन्दर-सुन्दर दीपों वाली झिलमिल आई दिवाली।

लोग अपने मित्रों, रिश्तेदारों, प्रियजन-परिजन को मिठाई देते हैं और उन्हें गले से लगाते हैं। घरों में सुन्दर पकवान बनाए जाते हैं और बच्चे इस अवसर को मिठाई खाने का शुभ अवसर मानते हैं। संध्या के समय घर से भोजनादि से निवृत होकर लोग जगमगाते हुए प्रकाश की शोभा देखने के लिए निकल पड़ते हैं। इस प्रकार दीपावली का यह पावन पर्व प्रकाश का पर्व है जिसे सभी भारतवासी हर्ष और उल्लास से मनाते हैं।

त्यौहार का मूल्यांकन- गुण-दोष-यह आनन्दोत्सव प्रकाश के माध्यम से ज्ञान का संदेश देता है तथा अशुभ कर्मों को त्याग कर शुभ कर्म करने की प्रेरणा देता है। शत्रुता को छोड़कर लोग गले मिलते हैं तथा मैत्री और बन्धुत्व की भावना को ग्रहण करते हैं।

इस पावन पर्व के साथ कालिमासय पक्ष भी जुड़ गया है। अपनी किस्मत की परीक्षा लेने के बहाने कुछ लोग जुआ खेलते हैं और बहुत बड़ी धनराशि भी खो देते हैं। कभी-कभी आतिशबाजी को लोगों पर फैककर मूर्ख लोग असुखद वातावरण बनाते हैं। कुछ लोग अपने घरों के दरवाज़ों को खुला छोड़ते हैं ताकि लक्ष्मी उनके घर में प्रवेश करे परन्तु वास्तव में चोर इस अवसर का लाभ उठा लेते हैं।

उपसंहार- निष्कर्षत: कहा जा सकता है। दीपावली भारतवर्ष का सांस्कृतिक पर्व है जो नवजीवन को नई स्फूर्ति देता है, संस्कृति की स्मृति करवाता है तथा बन्धुत्व और आलोक का संदेश देता है। हमारा पुनीत कर्तव्य है कि कुप्रवृतियों को त्याग कर इस पावन त्यौहार की पावनता बनाए रखें। दीपावली का संदेश किसी कवि के शब्दों में इस प्रकार है-

दीपमाला कह रही है,

दीप सा युग-युग जलो।

घोरतम को पार कर,

आलोक बन कर तुम डलो।

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