विज्ञान वरदान या अभिशाप पर निबन्ध- Essay on Science a Boon or a Curse in Hindi

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विज्ञान वरदान या अभिशाप पर निबन्ध- Essay on Science a Boon or A Curse in Hindi

विज्ञान के चमत्कार भूमिका– गत दो सौ वर्षों में विज्ञान लगातार उन्नति ही करता गया है। यद्यपि इससे बहुत समय पूर्व रामायण और महाभारत काल में भी अनेक वैज्ञानिक आविष्कारों का उल्लेख मिलता है, परंतु उनका कोई चिहन आज उपलब्ध नहीं हो रहा। इसलिए 19वीं और बीसवीं शताब्दी से विज्ञान का नया अध्याय आरंभ हुआ है। 

आधुनिक आविष्कार– बिजली और परमाणु-शक्ति को वश में करके मनुष्य ने मानव समाज को वैभव की चरम सीमा पर पहुंचा दिया है। तेज चलने वाले वाहन, समुद्र के वक्षस्थल को रौंदने वाले जहाज और असीम आकाश में वायु वेग से उड़ने वाले विमान, नक्षत्र लोक तक पहुँचने वाले राकेट प्रकृति पर मानव की विजय के उज्ज्वल उदाहरण हैं। तार, टेलीफोन, टेलीविजन, सिनेमा, ग्रामोफोन आदि ने हमारे जीवन में ऐसी सुविधाएँ प्रस्तुत कर दी। हैं, जिनकी कल्पना भी पुराने लोगों के लिए कठिन होती है। 

विज्ञान एक वरदान है- पहले मनुष्य का समय अन्न-वस्त्र आदि जुटाने में बीत जाता था। दिन भर कठोर श्रम । करने के बाद भी उसकी आवश्यकताएँ पूर्ण नहीं हो पाती थीं, परंतु अब मशीनों की सहायता से वह अपनी इन आवश्यकताओं को बहुत थोड़े समय काम करके पूरी कर सकता है और शेष घूमने-फिरने, पढ़ने-लिखने या अन्य किसी प्रकार का आनंद लेने में बिता सकता है। वस्तुत: ऐसा प्रतीत होता है कि विज्ञान एक अद्भुत वरदान के रूप में मनुष्य को प्राप्त हुआ है। यह उसकी एक लंबे समय की साधना का श्रेष्ठ फल है जो उसकी सब भावनाओं को पूर्ण करने वाला है।

युद्धों को बढ़ावा- प्रत्येक वैज्ञानिक आविष्कार का उपयोग मानव हित के लिए नहीं किया गया जितना मानव जाति के अहित के लिए। वैज्ञानिक उन्नति से पूर्व भी मनुष्य लड़ा करते थे, परंतु उस समय के युद्ध आजकल के युद्धों की तुलना में बच्चों के खिलवाड़ जैसे प्रतीत होते हैं। प्रत्येक नए वैज्ञानिक आविष्कार के साथ युद्धों की भयंकरता बढ़ती गई और उसकी चरम सीमा हीरोशिमा और नागासाकी में प्रकट हुई। यहां एक अणु बंब के विस्फोट के कारण तीन-तीन लाख व्यक्ति हताहत हुए। आजकल भी उद्जन बंब और न्यूट्रॉन बंब पर परीक्षण किए जा रहे हैं।

दो महायुद्धों में विज्ञान- प्रथम विश्व युद्ध और वितीय विश्व युद्ध में जन और धन का जितना विनाश हुआ उतना शायद विज्ञान हमें सौ वर्षों में भी न दे सकेगा और यह विनाश केवल विज्ञान के कारण ही हुआ है। अनुमान लगाया गया है कि जितनी क्षति इन दो युद्धों में हुई यदि उतनी सामग्री और श्रम का उपयोग रचनात्मक कार्यों के लिए किया जाता तो संसार के प्रत्येक परिवार के पास रहने के लिए सुंदर कोठी, पहनने के लिए बढ़िया वस्त्र और खाने को पर्याप्त अन्न हो सकता था।

अतृप्ति को जगाया- विज्ञान ने मनुष्य की आवश्यकताओं को पूर्ण करने के लिए साधन जुटा दिए, परंतु इन साधनों के कारण मनुष्य की आवश्यकताएं उतनी पूर्ण नहीं हुई जितनी कि बढ़ गई हैं। विज्ञान से मनुष्य की शक्ति उतनी नहीं बढी जितनी लालसा बढ़ी है। इसी कारण मनुष्य की नैतिक धारणाएँ शिथिल हो गई हैं। समाज के वे नियम, जिनके कारण पहले लोगों में सहानुभूति, संवेदना, सत्य और न्याय की भावनाएँ विद्यमान रहती थीं, धीरेधीरे समाप्त होती जा रही हैं। असंतोष एवं अतृप्ति का दावानल सब ओर भड़क उठा है।

विज्ञान के दो पक्ष- विज्ञान, का एक पक्ष तो अत्यंत उज्ज्वल है और दूसरा अत्यंत कलुषित और भयंकर दिखाई पड़ता है। फिर विज्ञान का वास्तविक स्वरूप क्या है ? सच बात तो यह है कि विज्ञान से जितना विनाश हुआ है उतना दोष विज्ञान के सिर पर नहीं मढ़ा जा सकता, क्योंकि वह तो निर्जीव है । उसका सदुपयोग या दुरुपयोग मनुष्य पर निर्भर है।

उपसंहार- यह तो निश्चित है कि विज्ञान का उपयोग मनुष्य को करना है। विज्ञान वरदान सिद्ध होगा या अभिशाप, यह पूर्ण रूप से मानव समाज की मनोवृत्ति पर निर्भर करता है। विज्ञान तो मनुष्य का दास बन गया है। मनुष्य उसका स्वामी है। वह जैसा भी आदेश देगा, विज्ञान उसका पालन करेगा। यदि मानव मानव रहा तो विज्ञान वरदान सिद्ध होगा, यदि मानव दानव बन गया तो विज्ञान भी अभिशाप ही बनकर रहेगा।

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