Essay on AIDS in Hindi- एड्स पर निबंध

In this article, we are providing Essay on Aids in Hindi. एड्स पर निबंध, एड्स को लेकर समाज में फैली भ्राति बीमारी, एड्स- सावधानी एवं सलाह।

Essay on Aids in Hindi- एड्स पर निबंध

भारत में एड्स का पहला मामला 1986 में प्रकाश में आया था। वर्ष 1987 में सरकार द्वारा एड्स नियंत्रण कार्यक्रम शुरू किया गया। वर्तमान में विश्व वैज्ञानिक प्रगति के कारण जहाँ मानव ने कई रोगों पर विजय प्राप्त करने करने में सफलता पाई है वहीं उसे कुछ नए रोगों से दो-चार होना पड़ रहा है। एक समय था जब क्षय रोग, काली खाँसी, हैजा, प्लग, मलेरिया अदि रोग मौत के कारण माने जाते थे। परंतु आज एड्स नामक बीमारी ने एक महामारी का रूप धारण कर लिया है। एड्स को लेकर समाज में तरह-तरह की भ्रांतियाँ हैं। दरअसल एड्स के बारे में ज्यादातर लोगों को सही जानकारी न होने के कारण इस रोग का डर लोगों में कुछ अधिक ही व्याप्त है।

वैज्ञानिकों के अनुसार जब किसी व्यक्ति के शरीर में एड्स का विषाणु (एच.आई.वी) प्रवेश करता है तो वह व्यक्ति एच.आई.वी से संक्रमित कहलाता है। उस व्यक्ति के संक्रमित होने के दस से पंद्रह शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता धीरे-धीरे खत्म होनी शुरू हो जाती है। दरअसल एच.आई.वी. के संक्रमण क्षमता को कायम रखने का काम करनेवाली CD4 नामक कोशिकाएँ धीरे-धीरे कम होने लगती हैं। समाज का मानना है कि एड्स एक जानलेवा बीमारी है। दरअसल एड्स पीड़ित व्यक्ति में प्रतिरोधक क्षमता कम होने से और बीमारी जैसे- टी. बी., मलेरिया, उल्टी, दस्त या अन्य कोई बीमारी हो जाती है तो उसके लिए उपचार कारगर नहीं रह जाता, क्योंकि उसके शरीर का प्रतिरोधक तंत्र करीब-करीब नष्ट हो चुका होता है। इसलिए एडस रोगी के शरीर पर दवाओं का असर नहीं पड़ता और वह मौत के मुँह में चला जाता है। अब तक एड्स का न तो कोई टीका उपलब्ध है और न ही कोई प्रभावी दवा ही। हालाँकि ऐटिरेट्रोवायरल दवाएँ बाजार में मौजूद हैं जिनसे एडस रोगी की आयु थोडी बढ़ जाती है। ये दवाएँ रक्त में मौजूद एच.आई.वी. विषाणुओं की संख्या को बढ़ने से रोकती हैं।

आज की युवा पीढी पश्चिमी संस्कृति के विलासी जीवन का जीने को लालसा के कारण एड्स को निमंत्रण दे रहा है। एड्स के ज्यादा मामले असुरक्षित यौन संबंधों के कारण फैलते हैं। एड्स पर नियंत्रण पाने के लिए सरकार को यौन शिक्षा लागू करनी चाहिए। लेकिन इस शिक्षा के लागू करने के बावजूद भी ग्रामीणों अशिक्षितों को इस रोग के बारे में जाग्रत करने और इससे बचाव के उपाय बताने के लिए सरकार को ऐसा सूचना तंत्र विकसित करना होगा जो किसी भी भाषा जानने वाले को आसानी से समझ आ सके। इसके लिए धर्म गुरुओं और नेताओं तथा सार्वजनिक और सामाजिक संस्थाओं को आगे आना होगा।

 

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