Essay on Bhagat Singh in Hindi- शहीद भगत सिंह पर निबंध

इस निबंध में आपको शहीद भगत सिंह के बारे में पूरी जानकारी मिलेगी। In this article we are providing an essay on Bhagat Singh in Hindi.

Essay on Bhagat Singh in Hindi- शहीद भगत सिंह पर निबंध

भूमिका- पराधीनता की भयानक और काली रात के अन्धकार में भारत का भाग्य डूबा था। अपनी ही धरती, अपने ही आकाश और अपने ही घरों में भारतवासी परतन्त्र थे, गुलाम थे। विदेशी शासकों की दया और कृपा पर उनका भाग्य निर्भर करता था। अपनी इच्छा और कल्पना, भावना तथा विचार प्रकट करने के लिए भी वे स्वतन्त्र न थे। अपनी प्रगति, न्याय और सम्मान के लिए भी वे पराश्रित थे। अन्याय की इस कालिमामयी रात्रि को चीरकर और स्वतन्त्रता के सूर्य को भारत के भाग्याकाश में उदित करने वाले शहीदों की प्रात: स्मरणीय गाथा में शहीद भगत सिंह का नाम अविस्मरणीय है। अपने बाल्यकाल से ही स्वतन्त्रता के प्रेमी दीवाने बालक ‘भागांवाला’ ने स्वतन्त्रता के अश्वमेघ में अपने जीवन की जो आहुति दी उससे निकलने वाली लपटों की भयावह आग में विदेशी शासन जलकर भस्मीभूत हो गया। ‘भारत मां का लाडला’, ‘भारतीयों का कण्ठहार भगत सिंह बलिदान की अमिट-अमर गाथा का दिव्य नायक है।

जीवन की झलक- सरदार भगत सिंह का परिवार देश भक्तों का परिवार था। आप के पिता सरदार कृष्ण सिंह कांग्रेस पार्टी के गणमान्य सदस्यों में से थे। आप के चाचा अजीत सिंह ‘पगड़ी सम्भाल जट्टा” लहर के नेता थे और अंग्रेज़ों की लम्बी सजा काट कर आए थे। आप की दादी बचपन से ही वीर पुरुषों की कहानियां सुनाती थी और वीरता की लोरियाँ देती थी। ऐसे वीर और देश भक्त परिवार में पला हुआ सरदार भगत सिंह क्यों न देश भक्त निकलता।

सरदार भगत सिंह का पहला नाम भागांवाला था क्योंकि जिस दिन यह पैदा हुआ उस दिन इनके पिता नेपाल से आए थे और दादी ने कहा था यह लड़का भाग्य शाली है इसी लिए इसका नाम भागांवाला रखा गया और यही बाद में भगत सिंह के नाम से प्रसिद्ध हुआ। सचमुच यह बालक सौभाग्यशाली था देश के लिए भी और परिवार के लिए भी। इस का जन्म सन् 1907 में पंजाब प्रान्त के ज़िला जालन्धर के तहसील बंगा के पास खटकड़ कलां में सरदार कृष्ण सिंह के घर हुआ। प्रारम्भिक शिक्षा गांव में ही पाई। मैट्रिक तक शिक्षा डी. ए. वी. स्कूल से पाई और नेशनल कालेज लाहौर से आप ने बी. ए. पास की। अनेक पत्रों के सम्पादक बने। एक स्कूल में मुख्य अध्यापक भी रहे। नाम बदल-बदल कर भी कई स्थानों पर घूमते रहे। घर वालों ने आप का विवाह करने का विचार किया पर आप घर से यह सोच कर भागे कि शादी देश भक्ति में बाधा पहुंचाएगी इस तरह आप का जीवन देश भक्ति से युक्त रहा।

क्रांति के पथ पर- जिस समय शहीद भगत सिंह का जन्म हुआ उस समय कांग्रेस की दो पार्टियां बन चुकी थीं। नरम दल और गरम दल। नरम दल के लोग नियमों द्वारा और विधान द्वारा देश को स्वतन्त्र करवाना चाहते थे। महात्मा गांधी, जवाहर लाल नेहरू इसी दल के सदस्य रहे पर गरम दल वालों का विचार था कि लातों के भूत बातों से नहीं माना करते इस लिए अनुनय विनय से आज़ादी नहीं मिल सकती इस लिए क्रान्ति का पथ अपनाना चाहिए। लोक मान्य तिलक इस दल के नेता थे। बाद में चन्द्र शेखर आज़ाद, बटुकेश्वर दत्त आदि ने इस पथ को अपनाया। सरदार भगत सिंह जी इसी दल के सदस्य बने।

जलियांवाला बाग में जब सन् 1919 में गोली चली उस समय भगत सिंह की आयु 11 वर्ष की थी उसने हज़ारों लोगों को मरते हुए देखा। भगत सिंह ने उस भूमि की मिट्टी को माथे पर लगाया और कसम खाई कि जब तक देश को आज़ाद न करा लंगा तब तक चैन से न बैटुंगा। 30 अक्तूबर, 1928 को साईमन कमीशन का बहिष्कार किया गया इस सम्बन्ध में बड़ा भारी जलूस लाहौर में निकला। दफा 144 लगी हुई थी पर शहीद होने वाले दफा की कब परवाह करते हैं। लाल लाजपत राय उस जलूस के नेता थे। उन पर लाठियां बरसीं और 17 नवम्बर, 1928 को उन की मृत्यु हो गई। भगतसिंह के हृदय पर इस घटना का गहरा आघात लगा। सरदार भगत सिंह ने सोच लिया कि कोई ऐसा काम किया जाए जिस से बहरे कानों को कुछ सुनाई दे इसलिए उन्होंने 8 अप्रैल, 1929 को असैम्बली में दो बम्ब फैके और कुछ पर्चियां फैकीं। भगत सिंह चाहते तो भाग सकते थे पर उन्होंने ऐसा नहीं किया उन्होंने आत्मसमर्पण कर दिया।

फांसी की सजा- भगत सिंह पर केस चला। भगत सिंह के साथ सुखदेव और राज गुरु भी थे। 7 अक्तूबर, 1930 को भगत सिंह को फांसी की सजा सुना दी गई। देश में आन्दोलन हुए, हड़तालें हुई, जलसे हुए, जलूस निकले पर अग्रेज़ों के कानों पर जू तक न रेंगी। आखिर 23 मार्च, सन् 1931 को शाम के समय सरदार भगत सिंह को फांसी दे दी गई। फांसी का फंदा चूमते हुए सरदार भगत सिंह ने कहा, आत्मा अमर है इसे कोई मार नहीं सकता। पैदा होने वाले के लिए मरना और मरने वाले के लिए पैदा होना ज़रूरी है। मैं मर रहा हूं, भगवान् से प्रार्थना है कि मैं फिर इसी देश में जन्म लू और अंग्रेज़ों से संघर्ष करता हुआ देश को आज़ाद कराऊँ और यह कहते हुए भगत सिंह ने फांसी का फंदा चूम लिया।

‘सर फरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है,

देखना है जोर कितना बाजुए-कातिल में है।”

उपसंहार- आज हम स्वतन्त्र हैं पर हमें उन देश भक्तों के बलिदान नहीं भूलने चाहिएं। आज हम सब को भाषा, प्रान्त और जातीयता से ऊपर उठना चाहिए। हमारे सामने एक लक्ष्य रहना चाहिए कि हम सब एक ही देश के वासी हैं। यही भगत सिंह जी को सच्ची श्रद्धांजलि होगी और दूसरी बात यह कि हमें इन शहीदों का नाम कभी नहीं भूलना चाहिए। इनके कर्तव्य हम में प्रेरणा भरने वाले हैं।

‘शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले,

वतन पर मरने वालों का यही बाकी निशी होगा।”

Long essay on Bhagat Singh in Hindi.

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