Essay on Co Education in Hindi- सह शिक्षा पर निबंध

In this article, we are providing Essay on Co Education in Hindi. सहशिक्षा पर निबंध, सहशिक्षा के विरोधी और उनके विचार, सहशिक्षा का अर्थ और परम्परा, समाधान, सहशिक्षा के पक्षधर और नके विचार

Essay on Co Education in Hindi- सह शिक्षा पर निबंध

भूमिका- शिक्षा मानव के आंतरिक गुणों के विकास का साधन भी हैं और उसे सामाजिक जीवन में व्यवहार का ज्ञान कराने के लिए अनिवार्य भी है। शिक्षित व्यक्ति दूसरे की प्रकृति, गुण, आदत तथा व्यक्तित्व को भली-भांति समझता है और अनुकूल व्यवहार उसके साथ करता है। इसी प्रकार सामाजिक संदर्भ में बदलती हुई परिस्थतियों के साथ वह। स्वयं को भी बदलता है। शिक्षा के आलोक से जीवन आलोकित होता है अतः अज्ञान अन्धकार दूर होता है। इसीलिए प्रार्थना की गई है।

“तमसो मा ज्योतिर्गमय

अर्थात् हे भगवान् मुझे अज्ञान रूप अन्धकार से दूर करके ज्ञान रूपी प्रकाश की ओर ले जाओ।

इससे यह प्रमाणित हुआ कि शिक्षा का उद्देश्य अज्ञान रूपी अन्धकार को दूर करके अपने भीतर ज्ञान रूप प्रकाश भरना है। शिक्षा का चलन कोई नई चीज नहीं बल्कि वैदिक युग में ही इसका प्रचलन है। संस्कृत में लिखा है-

“विद्याविहीनः पशुः समानः 

अर्थात् विद्या के बिना मनुष्य पशु तुल्य होता है।

सहशिक्षा का अर्थ और परम्परा- सहशिक्षा का अर्थ है बालक और बालिकाओं तथा युवक और युवतियों को एक साथ शिक्षा देना। एक साथ शिक्षा देने का तात्पर्य यह है। कि दोनो एक ही विद्यालय, कॉलेज आदि में कक्षाओं में साथ-साथ पढ़े। सभी गतिविधियों में जिनका संबंध विद्यालय से है में वे समान रूप से साथ-साथ भाग लें। इनमें सांस्कृतिक कार्यक्रम भाषण प्रतियोगिता वाद-विवाद प्रतियोगिता जैसी गतिविधियां भी हैं। |

हमारी प्राचीन संस्कृति और इतिहास इस बात का प्रमाण देता है कि प्राचीन भारत में शिक्षा का आरम्भ गुरुकुलों से हुआ है। गुरु के आश्रम में पढ़ कर ही विद्यार्थी विद्या प्राप्त करते थे। वैदिक युग में सभी को समान रूप से शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार था। बालक और बालिकाएं गुरु के आश्रम में रहकर ही शिक्षा ग्रहण करते थे। धीरे-धीरे युग बदलने के साथ-साथ सामाजिक परिस्थितियाँ भी बदलने लगी। इतिहास में आक्रमणकारियों का युग जब आया तब स्त्री के प्रति सुरक्षा की भावना बढ़ती गयी। दूसरी ओर नारी का सौंदर्य भी युद्धों का कारण बनने लगा। मुसलमान अब भारत पर राज्य करने लगे तब उनकी अनेक भिन्न-भिन्न प्रथाओं से भारतीय समाज प्रभावित हुआ और लड़कियों की शिक्षा पर ही प्रतिबंध लगने लगा। यह स्थिति इतनी बिगड़ी कि उसे शिक्षा के अधिकार से ही वंचित किया जाने लगा।

इससे मध्यकाल नारी के विकास में रुढ़िवादी बन गया। भक्ति की लहर जब हमारे देश जली तब भी नारी को समाज में अपमान सहन करना पड़ा। पाश्चात्य देशों में स्थिति भिन्न । अंग्रेज़ों के भारत पर राज्य करने के दौर में स्थिति बदलने लगी क्योंकि इस समय अनेक समाज-सुधार आन्दोलन चलाए जा रहे थे।

सहशिक्षा के पक्षधर और उनके विचार-सहशिक्षा के समर्थक प्राचीन पौराणिक युग का उदाहरण देते हुए मानते हैं कि उस समय मन्दोदरी जैसी नारी भी गुरुकुल में पढ़ती थी। महर्षि कण्व, बाल्मीकि के आश्रम में भी सहशिक्षा होती थी।

आधुनिक युग में पाश्चात्य विचारधारा मनोवैज्ञानिक आधार पर आधारित है। इस सन्दर्भ में रोज मौटेयू ने कहा था—सह-शिक्षा में विद्यार्थियों को एक व्यक्ति के रूप में विकसित होने का अवसर प्राप्त होता है, न कि केवल ज्ञान का विकास करने का। इससे स्पष्ट होता है कि साथ-साथ पढ़ने से परस्पर सहयोग की भावना उत्पन्न होती है। जीवन में नर और नारी पति-पत्नी के रूप में साथ चलते हैं। एक दूसरे के प्रति समझ की भावना, एक दूसरे की मानसिकता को पहचानने का अवसर इस समय ही प्राप्त होता है। एक दूसरे के निकट आने से झिझक दूर होती है। वे अपने विचार और भावों को नियंत्रित करते हैं। इससे चित्त वृत्तियों को अनुशासित करते हैं। अत: मनोवैज्ञानिक धरातल पर सह-शिक्षा उपयोगी है।

सह-शिक्षा से युवक और युवतियों में स्वस्थ प्रतिस्पर्धा होती है। अध्ययन के अतिरिक्त अन्य गतिविधियों में भी इस भावना का विकास होता है जिससे उनका व्यक्तित्व भी विकसित होता है।

लड़कियों के मन से लड़कों के प्रति अनेक अर्थहीन भावनाएं जन्म लेती हैं। माँ-बाप की रुढ़िवादी प्रवृत्तियों के कारण वे दुर्भावना भय, आशंका से पीड़ित होती हैं। लड़कों के मन में स्वाभाविक आकर्षण बनता है। वे वासनात्मक दृष्टिकोण अपनाने लगते हैं। लेकिन जब सह शिक्षा होती है तो उनके संस्कार बदलते हैं। वे अनावश्यक भय, लज्जा और वासना के कल्पनात्मक लोक से यथार्थ की धरती पर सत्य को समझने लगते हैं। इस प्रकार संस्कारों में सुधार होता है।

लड़के और लड़कियों में अन्तर न करने की प्रवृत्ति सहशिक्षा से ही विकसित होती है। इससे लड़कियों की शिक्षा का प्रतिशत भी बढ़ता है तथा उनका व्यक्तित्व अधिक उत्तरदायी बनता है। विकसित होता है। जहाँ केवल लड़कों के लिए स्कूल या कॉलेज होते हैं और लड़कियाँ शिक्षा से वंचित हो जाती है वहाँ लड़कियों को भी अवसर प्राप्त होते हैं।

सहशिक्षा के समर्थक मानते हैं कि इससे बहुत बड़ी संख्या में अलग-अलग संस्थाएँ खालने से धन का अपव्यय होता है। एक ही संस्था से यह स्थिति भी सुधरेगी। एक साथ पड़ने से युवक और युवतियों धर्म,सम्प्रदाय, जातिवाद जैसी बातों से परिचित होते हैं और उनके सत्य को समझते हैं। इससे भविष्य में अन्तर्जातीय विवाह भी होते हैं जिससे राष्ट्रीय भावना विकसित होती है साथ ही दहेज जैसे अभिशाप भी मिटते हैं। स्पष्ट है कि जीवन में एक दूसरे के प्रति सहयोग और समझ की भावना होने से वे भविष्य में अच्छे हैं। अत: सहशिक्षा का होना आवश्यक है।

सहशिक्षा के विरोधी और उनके विचार-सहशिक्षा के विरोधियों का सल तर्क यह है कि प्रकृति से ही नर और नारी की प्रवृत्ति भिन्न है। अत: उसका विकास भी रूप भिन्न रूप में होता है। जीवन क्षेत्र में भी उनकी कार्यप्रणाली भिन्न है। जीवन को सफल में चलाने के लिए पुरुष को पुरुष ही रहना होगा और नारी को नारी ही। अतः । उत्तरदायित्व और कर्तव्य भी भिन्न-भिन्न होंगे। उसकी शिक्षा में सहचारी और मातृत्व । गुणों का विकास आवश्यक है अत: उसकी शिक्षा-पद्धति एवं पाठ्यक्रम तथा संस्था अलग होनी चाहिए।

दूसरी ओर वे कहते हैं कि इस काल में युवक और युवतियों का शारीरिक विकास तीव्रगति से होता है। ऐसी अवस्था में भावात्मक स्थिरता का अभाव रहता है। कल्पनामय । जीवन और स्वप्नों का संसार बनता है। इससे वे असंयम से कभी-कभी गलत मार्ग भी ग्रहण करने लगते हैं। अनैतिक मार्ग अपनाने से जीवन में दु:खी रहते हैं और सामाजिक तथा नैतिक अपराध बोध की भावना से ग्रस्त होते हैं।

सह शिक्षा के विरोधी यह भी कहते हैं कि एक ही संस्था में आने से आज लड़कियों की मानसकिता बदल जाती है और उनमें उदण्डता, स्वेच्छाचारिता आदि दुर्गण विकसित होने लगते हैं। लड़कों में और लड़कियों में स्वयं सुन्दर दिखने और दिखाने, की भावना बढ़ती है इससे वे अध्ययन के मार्ग से तो भटकते ही हैं कई बार अनेक समस्याओं को भी जन्म देते हैं, इससे अपराध भी बढ़ते हैं। कॉलेज के वातावरण में भी तनाव व्याप्त रहता है।

समाधान-सह शिक्षा के पक्ष और विपक्ष में जो विचार दिए जाते हैं वे वास्तव में किसी सीमा तक उचित ही हैं। लेकिन इसका अर्थ यह भी नहीं है कि इन समस्याओं का कोई निराकरण नहीं किया जा सकता है। अगर विद्यार्थी जीवन अनुशासनयुक्त है, शिक्षा प्रणाली आदर्श है, शिक्षक संयमी हैं तो सहशिक्षा होने में कोई दोष नहीं। चरित्र कोई छुईमुई का पौधा नहीं जो हाथ लगाने से बिगड़ेगा। कालेज में लड़के लड़कियां अगर एक साथ घूमें तो उनके दिमाग में आकर्षण का विचार ही पैदा न हो। विचार ही अलग रहने से होता है। इस के समाधान के लिए प्राइमरी और मिडिल स्तर तक शिक्षा सहशिक्षा के रूप में हो । सकती है और 10+2 तक ही शिक्षा अलग-अलग संस्थाओं में होनी आवश्यक है। यही काल होता है जब भावात्मक फिसलन हो सकती है। जब युवक युवतियाँ उच्च शिक्षा के लिए जाते हैं तो उनमें समझदारी आ जाती है और वे नियंत्रित होते हैं। ऐसी स्थिति में कोई। भी अनैतिक कार्य करने से वे सतर्क होते हैं। अत: समस्या के समाधान के रूप में यही । पद्धति अपनाई जा सकती है। इसके अतिरिक्त विद्यालयों में, जितना अधिक आत्मिक अनुशासन होगा, कार्य प्रणाली साफ-सुथरी होगी, अध्यापक विद्वान एवं उच्च चरित्र एव चिंतन के होंगे यह समस्या उतनी जटिल नहीं रहेगी।

उपसंहार-यह नितांत सत्य है कि स्त्री और पुरुष से ही जीवन रूपी गाड़ी चला है जिसके कि वे दो पहिए हैं। दोनों की सफलता सहयोग की भावना पर निर्भर करती है। शिक्षा जीवन के लिए हमें तैयार करती है अत: सहशिक्षा को अनुशासित और नैतिक बनाकर ही यह लक्ष्य प्राप्त किया जा सकता है इससे स्वस्थ नागरिक राष्ट्र के निर्माण में सहायक होते हैं तथा पारिवारिक समस्या भी जटिल नहीं होती है अपितु सुख और शान्तिमय जीवन बीतता है।

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