गुरु भक्ति की कहानी- Guru Bhakti Story in Hindi

Moral Story in Hindi- गुरु भक्ति की कहानी/ Guru Bhakti Story in Hindi / Guru Shishya story in 350 words.

गुरु भक्ति की कहानी- Guru Bhakti Story in Hindi

ज्ञान की प्राप्ति गुरु के बिना असम्भव है। गुरु होता है-मार्ग दर्शन करने वाला, ज्ञान देने वाला। जिसकी शिक्षा को हम हृदय में धारण करते हैं और उसके प्रति पूर्ण विश्वास रखते हैं। उस गुरु के आशीर्वाद से हम अपने उद्देश्य में सफलता प्राप्त करते हैं।

भीलराज हिरण्याघनु या चुत्र एकलव्या घनुर्विद्या सीखने के लिए पाण्डवों के गुरु द्रोणाचार्य के पास गया। द्रोणाचार्य ने एकलव्य के भील का पुत्र होने के कारण धनुर्विद्या यह कहकर सिखाने से मना कर दिया कि वह राजकुमारों का ही गुरु है। एकलव्य इस बात को सुनकर बहुत उदास हुआ परन्तु उसके मन में धनुर्विद्या सीखने की दृढ़ लगन थी। वह जंगल में गया ओर वहां उसने कुटिया बनाई जिसमे उसने गुरु द्रोणाचार्य की मीठी की मूर्ति स्थापित की। एकलव्य प्रतिदिन मूर्ति को गुरु मानकर प्रणाम करता ओर अपने अभ्यास में लग जाता। अभ्यासकरने से वह धनुर्विद्या में खुशल हो गया।

एक बार एकलव्य अभ्यास कर रहा था कि एक कुते ने वहां आकर भौंकना शुरु कर दिया। इससे एकलव्य के अभ्यास में विध्न पड़ने लगा। उसने कुते को चुप कराने के लिए उसके मुंह में सात बाण मारे। वह पाण्डर का कुता था। पाण्डव जब कुते को देखते हैं तो आश्चर्य चकित हो जाते है। वे एकलव्य का पता लगाते हैं। पाण्डवों ने उससे उसके गुरु का नाम पूछा। एकलव्य ने बताया कि उसके गुरु का नाम द्रोणाचार्य है तो वे द्रोणाचार्य के पास गए और इस बारे में बातचीत की। द्रोणचार्य जंगल में एकलव्य की कुटी में गए और एकलव्य से पूछने लगे कि उसे धनुर्विद्या किसने सिखाई है। एकलव्य ने बताया कि उसने द्रोणचार्य की मूर्ति बनाकर, उसे गुरु मानकर कर धनुर्विद्या का प्रतिदिन अभ्यास किया।

गुरु द्रोणाचार्य ने गुरु दक्षिणा के रूप में एकलव्य के दहिने हाथ के अंगूठे की मांग की। एकलव्य ने सहर्ष अपने दाहिने हाथ का अंगूठा काट कर गुरु दोणाचार्य को गुरु दक्षिणा के रूप में भेंट कर दिया।

यद्यपि गुरु के रूप में द्रोणाचार्य का यह कर्म उचित नहीं कहा जा सकता है परन्तु एकलव्य की गुरु भक्ति तो सदैव ही प्रशंसनीय रहेगी।

शिक्षा :-गुरु के प्रति समर्पित भाव से श्रद्धा रखनी चाहिए।

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