अनन्त चतुर्दशी व्रत कथा, विधि- Anant Chaturdashi Vrat Katha in Hindi

इस पोस्ट में हम अपने दर्शकों को अनन्त चतुर्दशी व्रत की पूरी जानकारी दे रहे है जैसे की- अनन्त चतुर्दशी व्रत की कथा, विधि, नियम और लाभ। Providing information about Anant Chaturdashi Puja | Anant Chaturdashi Vrat Katha in Hindi , Vidhi, Rules and Benefits, How to do Anant Chaturdashi Vrat , Anant Chaturdashi Fast Vidhi in Hindi.

अनन्त चतुर्दशी व्रत कथा, विधि- Anant Chaturdashi Vrat Katha in Hindi

अनन्त चतुर्दशी भाद्र शुक्ल चतुर्दशी की शेष शय्या पर क्षीरसागर में सोने वाले विष्णु भगवान की पूजा की जाती है, और पूजा के अन्त में निम्न मन्त्र “अनन्त सर्व नागानामधिपः सर्वकामदः, सदा भूयात् प्रसन्नोमे भक्तानामभयंकरः” से प्रार्थना करनी चाहिए। यह विष्णु कृष्ण रूप हैं और शेषनाग काल रूप से विद्यमान रहते हैं अतः दोनों की सम्मिलित पूजा हो जाती है।

अनन्त चतुर्दशी विधि- Anant Chaturdashi Puja Vidhi

-प्रातः नित्य क्रिया तथा स्नानादि से निवृत होकर चौकी के ऊपर मन्डप बनाकर उसमें अक्षत सहित या कुशा के सात कणों से शेष भगवान की प्रतिमा स्थापित करें। उसके समीप १४ गाँठ लगाकर हल्दी से रंगे कच्चे डोरे को रखें और गन्ध, अक्षर, पुष्प, धूप, दीप नैवेध से पूजन करें। तत्पश्चात् अनन्त देव का ध्यान करके शुद्ध अनन्त को अपनी दाईं भुजा में धारण करना चाहिए। यह तागा अनन्त फल देने वाला है।

अनन्त चतुर्दशी व्रत कथा- Anant Chaturdashi Story

महाराज युद्धिष्ठर ने जब राजसूय यज्ञ किया उस समय मन्डप इतना मनोरम बनवाया कि जलस्थल की भिन्नता प्रतीत ही नहीं होती थी। कहीं से टहलते-टहलते दुर्योधन भी उस यज्ञ मण्डल पर आ गया और द्रौपदी ने यह देखकर उपहास करते हुए कहा कि अन्धों की सन्तान अन्धी ही होती है। यह बात उसके हृदय में बाण जैसे लगी तथा बदला लेने – की मन में ठान लिया। कुछ दिनों बाद ही उसने पाण्डवों को बुला कर द्यत क्रीड़ा में परास्त किया। हार होने पर उन्हें प्रतिज्ञानुसार १२ वर्ष का बनवास दिया। एक दिन भगवान कृष्ण जब मिलने गये तभी युधिष्ठर ने सब वृतान्त सुनाया और उसे दूर करने का उपाय पूछा। तब कृष्ण बोले की विधि पूर्वक अनन्त भगवान का व्रत करो। तुम्हारा खोया राज्य पुनः प्राप्त हो जायेगा।

इसके बाद श्री कृष्ण ने एक कथा सुनाई-प्राचीन काल में सुमन्त नामक ब्राह्मण के सुशीला नाम की एक कन्या थी। ब्राह्मण ने बड़ी होने पर उसका विवाह कौडिन्य ऋषि के साथ कर दिया। कौडिन्य ऋषि सुशीला को लेकर अपने आश्रम की ओर चले। रास्ते में ही सन्ध्या हो गई। ऋषि नदी के किनारे सन्ध्या करने लगे। सुशीला ने देखा वहीं पर बहुत सी स्त्रियां किसी देवता की पूजा कर रही हैं। तब उसने पास जाकर पूछा आप सब किसकी पूजा कर रही है। उन सभी ने सुशीला को अनन्त व्रत की महिमा बतायी। सुशीला ने वहीं उस व्रत का अनुष्ठान किया और चौदह गाँठों वाला डोरा हाथ में बांध कर ऋषि कौडिन्य के पास आयीं।

कौडिन्य ने सुशीला के हाथ में बंधे डोरे का रहस्य पूछा। सुशीला ने सब हाल कह सुनाया। कौडिन्य ने डोरा तोड़ कर अग्नि में डाल दिया इससे भगवान अनन्त का अत्यन्त अपमान हुआ। परिणाम यह हुआ कि ऋषि सुखी न रह सके और उनकी धन दौलत समाप्त हो गयी। तब उन्होंने सुशीला से इसका कारण पूछा तो सुशीला ने अनन्त डोरे की याद दिलाई। कौडिन्य पश्चाताप से उद्विग्न हो उस डोरे के लिये वन चले गये। वन में काफी दिन तक घूमते-घूमते वे एक दिन भूमि पर गिर पड़े। तब अनन्त भगवान ने उन्हें दर्शन दिया और बोले-हे कौडिन्य ! तुमने मेरा तिरस्कार किया था उसी से तुम्हें इतना कष्ट भोगना पड़ा। ज्ञान हो गया हो तो अब घर जाकर अनन्त का अनुष्ठान १४ वर्षों तक करो, इससे तुम्हारे दुःख दारिद्रय मिट जायेंगे तथा धन-धान्य से सम्पन्न हो जाओगे।

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